Saturday, June 25, 2022

आभा बोहरा नागपुर महाराष्ट्र

 माँ”

माँ के लिए कुछ भी कहना

कहाँ सेशुरु करूँ

कहाँ पर ख़त्म करूँ

अनादि से शुरु हो कर

अनन्त तक चलने वाला

 “माँ “शब्द तो  किसी शब्दों की मोहताज नहीं

माँ तो ईश्वर का भेजा वह तोहफ़ा है

 

जो हमें हमारे वजूद की पहचान  देता है

जो हमें हमारे ख़ुद के होने का अहसास कराता है

 

 “माँ”

माँ के लिए कुछ भी कहना

कहाँ सेशुरु करूँ

कहाँ पर ख़त्म करूँ

अनादि से शुरु हो कर

अनन्त तक चलने वाला

 “माँ “शब्द तो  किसी शब्दों की मोहताज नहीं

माँ तो ईश्वर का भेजा वह तोहफ़ा है

जो हमें हमारे वजूद की पहचान  देता है

जो हमें हमारे ख़ुद के होने का अहसास कराता है

आभा बोहरा

अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन

शाखा - नागपुर 

आभा बोहरा

नागपुर

निधि भट्टड़ जलगांव महाराष्ट्र

 माँ  का  आँचल

माँ, तुम्हारा आँचल जैसे मेरे लिए मेरी खुशियो का बादल

नन्ही सी कली को अपनी तुमने इस मे ही सहेजा

मेरी हर किलकारी और खुशियों को इसमें ही समेटा

नन्हे नन्हे कदम तुम्हारे पीछे चल पड़े

ममता के आंचल को हौले से पकड़े

पसीने से तरबतर खेलकूद जब मैं आती

तुम्हारे ही आँचल को अपना तौलिया थी बनाती

मिट्टी से पैर जब कभी सन जाते

चढ़कर तुम्हारी गोद मे साफ हो जाते

कभी ढोल देती मैं  कुछ खाते खाते

बड़े प्यार से तुम आँचल अपना थमा देती हाथ मेरे

भरी दोपहरी तपती धूप हो कभी भी

तुम्हारा ही आँचल मेरी छांव होती

बाहर कभी जाते बारिश जो होती तुम्हारा वो आँचल मेरी छतरी होती

जो गुस्सा कभी हुई बुआ और चाची

आँचल के पीछे तुम्हारे ही छिपती

उसी आँचल को तरसती है अब भी

तुम्हारी सयानी सी ये बिटिया रानी

मुझे तुम बुला लो ,गले से लगा लो, ममता के आंचल में फिर से छिपा लो.....

छोड़ कर के अकेले जबसे तुम हो गई...

खाली खाली सी सारी दुनिया हो गई...

न आते है आंसू न आती है हिचकी....

तरसती है ये बेटी सिसकती है ये आंखे...…

 

निधि भट्टड़ 

स्वलिखित 

जलगांव शाखा

हेमा अग्रवाल तुमसर महाराष्ट्र

पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎

धरा के नीचे पानी है,💦

हमने सुनी कहानी है।

सच है ये, नहीं कोई कहानी,

वैज्ञानिकों की खोज पुरानी।👨🏼‍🔬🧑🏼‍🔬

कल तक जो हरी भरी थी पृथ्वी,🌱🌳

आज सूखकर हो गई बंजर।

मानव ने अपने ही हाथों,

घोंप दिया है इसमें खंजर।🔪🔪

दुर उपयोग किया प्रकृति का,

कभी ना इसका मान किया।

पर्यावरण को किया प्रदूषित,

हरदम ही अपमान किया।👿👿

आज नतीजा भुगत रहे हम,

हरियाली सब खो गई है।🌆🏙️

धरती मां भी हमसे जैसे,

रूठ के नींद में सो गई है।😓😓

धरती मां को यदि जगाना है,

सबको पेड़ लगाना है।🌱🌱

हरियाली फैलाना है,

हरियाली फैलाना है।🌿🌳

🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎

      हेमा अग्रवाल

      तुमसर (महाराष्ट्र)

Thursday, June 23, 2022

डौली अग्रवाल अनन्या शिलोंग मेघालय

 [9:11 am, 18/06/2022] Vandana Choudhry: बढ़े चलो


खुशी बाँटो हरे पत्तों की तरह,

आगे बढ़ो बहते पानी की तरह,

आसमान में उड़ो बादलों की तरह,

अडिग रहो ऊँचे पहाड़ों की तरह।।


पत्तों की सरसराहट,पानी की कलकलाहट,

बारिश की झनझनाहट,वीराने की सनसनाहट,

प्रकृति की है ये कैसी प्रकृति?

याद दिलाए हमें हमारी आकृति।।


निकलो बादलों से सूरज की तरह,

खिलो कलियों से फूलों की तरह,

निकलो पहाड़ों से रास्तों की तरह,

रहो पानी में कमल की तरह।।


प्रकृति ने दिए हमें इतने प्रकार,

जो याद दिलाए हमें हमारे विकार,

सीख लें, अनन्या कुछ प्रकृति से,

मिल जाए हमें हमारा आकार।।


              डौली अग्रवाल 'अनन्या'

[9:11 am, 18/06/2022] Vandana Choudhry: नारी


कण-कण में बसा तेरे जीवन,

मधुर  कथा श्रद्धा व मन,

प्राण प्रदान करते द्वि थन,

किलकारी भरते बाल सुमन।।


पंकज,पवन,पुरंदर,अनंत,

वसुधा,शैल,सलिल,मयंक,

प्रकृति प्रिये सलिल भर लोचन,

चमक उठी सृष्टि बन कुंदन।।


भानु सी आभा बिखेरती त्रण,

निर्मल शीतलता फैलाती क्षण,

अनन्या  सी ज्योत चमकती,

शक्ति की शिक्षा मिले हर कदम।।


प्रवीण वाणी की वेणी बन,

प्रधान प्रिया बनी अभिनंदन,

प्रसन्नता लिए वन उपवन,

प्रणति वंदन करें देवगण।।


                  

डौली  अग्रवाल अनन्या शिलोंग मेघालय 

सुरुचि चमरिया शिलोंग मेघालय

कहांँ लौट कर आता है दोबारा

वो आलय वो चौबारा

स्वप्निल बना वो आंँचल

स्वप्निल लगती अब हवा वो चंचल

वो पहचानी सी राहें अब भी

बुलाती है फैला अपनी बाहें

तुम्हारी वो स्नेहिल छाया

दामन छोड़ा तेरा

पर प्यार भरा वो रंग

गहरा ही पाया

तुम दूर तो हो पर उससे

कई ज्यादा पास तुम्हें पाया

कानों में लरजती आज भी

लाडो कह बुलाती वो आवाज़

मांँ क्यों ना करूं मैं 

कहो ना तुझ पर नाज

तेरी ही दूआओं का तो

सर पे पहना है ताज।


स्वर्गिक कल्पनाओं की निश्वास भरी सांँसे


धूल भरी तेज हवाओं से स्वयं को बचाती

निष्कपट निश्चल मन से आशाओं को सजाती

कठिनाइयों को झेलती स्वतंत्रता की अनछुई चाह

स्वयं की पहचान को तलाशती आंँखे

सरल भाव से मानवता  की अभिलाषा में

अपनी मर्यादाओं में रह खुद को बचाती

अनगिनत और असामान्य क्षमताओं के साथ

दृढ़ता से आचरण को सिद्ध करती

हर बाधाओं को टाल प्रेम को बांटती

असीमित भावनाओं को उकेरती

अनंत जिज्ञासाओं में भी धीमे से

अपनी सौम्यता से खुद में सिमटती

फिर भी सदा नारी ही क्यों बिखरती।


सुरुचि चमरिया शिलोंग मेघालय 

ऊषा जोशी माँ चामुंडा देवास मध्यप्रदेश

 एज्युकेशन का जमाना💐

एज्युकेशन का है ये जमाना

विद्या से नही दामन छुड़ाना

भारत देश के तुम ही भविष्य हो

सोच के कदम उठाना 

पढ़ा लिखा इंसान जगत में

एक दिन मंजिल पाए

अनपढ़ भटके डगर डगर पे

पग पग ठोकर खाए

पढ़ाई से जीवन बनाना है

एज्युकेशन का है जमाना

विद्या जीवन के अंधियारे में

लाती है उजियाला

राह दिखाती है ये सबको

देखे देखने वाला

न हाथों से मौका गवाना है

एज्युकेशन का है जमाना

कल के नेता तुम ही बनोगे

तुम ही बनोगे जवाहर

तुममे से कोई गांधी बनेगा

कोई लाल बहादुर

वतन को लहू से सजाना है 

एज्युकेशन का है ये जमाना

विद्या से नही दामन छुड़ाना

 

ऊषा जोशी

माँ चामुंडा    

देवास मध्यप्रदेश 

संध्या प्रकाश पेशकार देवास मध्यप्रदेश

 बहू---बहू----!!


बहू तुम लक्ष्मी बनकर आना बदले में सम्मान व प्यार है पाना। 

बहू तुम--- लक्ष्मी--- बनकर आना


अपनें से बड़ों को तुम देना सम्मान, 

छोटों को स्नेह व प्यार लुटाना। 

बहू तुम.... लक्ष्मी... बनकर आना...!

अपनी करूणा व प्यार से, घर को स्वर्ग बनाना, 

कभी तुम करूणा की देवी बन जाना । 

बहू तुम.... लक्ष्मी....बनकर आना .. ...

बदले में.. सम्मान है पाना


समय कभी विपरीत आ जाए 

तो कभी ना घबराना, 

यदि जरुरत पड़े तो तुम दुर्गा, काली भी बन जाना ।

बहू तुम.. लक्ष्मी.... बनकर आना


कहते हैं बेटी माँ जाई है, 

बहू पराये घर से आई है, बेटी को तो इक दिन है जाना, 

उसे दुनियाँ की रित है निभाना । 

बहू ही है अपनी, 

बेटी तो है पराई ... 

यह बात तुम्हें समझ क्यूँ न आई ।

बहू तुम..... लक्ष्मी---बनकर आना।


बेटे कहते हैं माता पिता मेरे है, 

मै करूँगा उनकी सेवा, 

मगर बेटे कहते ही रह जाते है, 

कर जाती है बहू मात पिता की सेवा । 

बहु तुम... लक्ष्मी... .बनकर आना ,

बदले में .. सम्मान.....  है पाना


बेटियाँ हमारा मान है तो बेटा बहू भी तो हमारा अभिमान है, 

जहाँ होती है बहु मुस्कुराती, वहीं सारी खुशियाँ दौड़ी चली आती ।

बहू तुम.... लक्ष्मी.. बनकर आना      

बहु तुम सदा मुस्कुराना, कभी ना रुठ जाना, 

यदि तुम रूठ गई तो, 

हम ना जी पाएंगे, 

तुम्हें हम प्यार के सिवा क्या दे पाएंगे । 

बहू तुम...... लक्ष्मी ..बनकर आना, 

बदले में.सम्मान.. ....है पाना


हम तुम्हारे है, तुम हमारी हो, यही सोच को है अपनाना .. 

कभी यह बात भूल न जाना बहु तुम... लक्ष्मी.  ...बनकर आना..


तुमसे ही है हमारा सपना, तुम उसे अपनाना, 

उसे पुरा कर जाना । 

बहू तुम.... लक्ष्मी....बनकर आना


तुम जो मुस्कुराओगी, 

बगियाँ सारी खिल जाएगी, घर में बहार आएगी, 

इन बहारों में तुम घुलमिल जाना, 

अपनें रंगों को बिखराना ।।


बहू तुम लक्ष्मी बनकर आना, बदले में सम्मान व प्यार है पाना ,

बहू तुम घर को स्वर्ग है बनाना ।


(मेरी ओर से सभी बहूओं और बेटियों को समर्पित )


संध्या प्रकाश पेशकार

देवास

मनीषा लाठी सोनकच्छ मध्यप्रदेश

 आज पितृ दिवस के अवसर पर सभी बहनें अपनी स्वरचित रचनाएं पढ़ रही हैं, लेकिन मेरे मन की व्यथा कुछ अलग है। आज से 20 वर्ष पूर्व मैंने अपने डैडी को एक कार एक्सीडेंट में खो दिया था । मेरी रचना उनके अभाव में मेरे जीवन में जो रिक्तता आई है, उस पर आधारित है ।


आपकी कमी खलती है मुझे,

 यह खालीपन बहुत सताता है ।

बस यूं ही  आपकी यादें दिल में समेटे,

 यह वक्त गुजरता जाता है।।




समझ में आता है क्या फर्ज है ??

 और क्या जिम्मेदारी है??

 खुद से ज्यादा आप अपने,

 परिवार की खुशियां प्यारी है।


 दौड़ रहे हैं हम सब यहां,

 पकड़ने को जिंदगी की रफ्तार ।

अपना आज हम जी नहीं पाते ,

और करते कल की तैयारी हैं। 


आपके दूर जाने का मुझे,

 हर पल एहसास होता है।

 आपको खो दिया है, 

नहीं विश्वास होता है ।


हर बात में आपका साथ,

 अब याद बहुत आता है।

 हर बीता लम्हा अब तो बस,

 आंखों में आंसू लाता है।।


आपकी सीख और समझाईश का मूल मंत्र ,

जीने का सहारा देता जाता है ।

आपके बिना जीना भी क्या जीना है??

 बस यह वक्त गुजरता जाता है ।

बस यह वक्त गुजरता जाता है।।


 मनीषा लाठी 

 सोनकच्छ 

मध्यप्रदेश

ममता गिनोङिया सजग

समय (मौलिक)

समय 

स-वह और

मय-तल्लीन होना

समय बहता जा रहा है

उम्र निकल गई मेरी

ईश्वर में तल्लीन 

कहां हो पायी?।


 समय को खाती रही

कीमत करना भुल गयी

समय कहता है 

तेरे साथ ही तो हूं

बुढ़ापा आया

मोह माया न छोड़ा

प्रेम की गली 

घुमती फिरु

'स'को पहचाना नहीं।


समय नहीं है

मत कहना कभी

अंधेरा आता (अंधड़)

धूल का अंबार 

वर्षा आती

प्रेम की वर्षा हुई

अज्ञात साथी 

प्यार करता है

ऊपर बैठा 

मैं न कर पायी

वह सबके साथ है।


परिणाम मेरा

आंखें हैं मेरी

दिखता नहीं हैं

खुलती नहीं

होती अगर

दिव्य चक्षु

कहलाती।


बात चली समय की

इसकी बात

उसकी बातें

चर्चा होती तेरी मेरी

समय कब आएगा?

खुद की कब 

पहचान होगी


समय से फेंका

बीज अंकुरित होता

तरस नहीं है मुझ में

स-मय हो जाऊं

प्रभु के संग में

मेरे दिन जा रहा है

समय जा रहा है 

उम्र निकलती 

जा रही है

समय जा कहां रहा है?

देख न पायी कभी।।


अतुकान्त


भीतर का रस

अनुभूति देता है

रस ब्रह्म है

हैं यह अनोखा

रस से परिपूर्ण

रसीला है 

प्रकृति के

 कण-कण में

रस का ढेला है

फल , फूल

अनाज निहित

होता है।


रसहीन बनकर

सूखे पत्ते से 

न बन मानव तू

प्रेम रस की भक्ति

तरावट लाती

रस की सरिता

बहा दे मानव

रसीला बन जा तू।


जग सारा है रसमय

रस का श्रोत बहता है

रस के सागर

डूबकी लगाओ 

रसीला बन जा

पत्ते पत्ते में रस

टपकता रहता है

सृष्टि के कण-कण में

रस ही रस है

तुझ में ,मुझ में

रस ही रस है।।


बदल गया इंसान

क्षणिका....

इंसान जब जब

स्वंय को जानने

की कोशिश करता

कहते इंसान बदल गया

क्यों !आखिर क्यों?

----ममता गिनोङिया सजग मुग्धा 

राज खंडेलवाल मथुरा शाखा उतर प्रदेश

आज की नारी

 आज नारी को आसरा नहीं,साथ चाहिए

खामोशी नहीं,सुलक्षी सी एक बात चाहिए

अब वो पर्दे के पीछे की आन नहीं,घर की शान है

निकली है वो सपनों को पाने के लिए,लक्ष्य तक ले जाने वाला एक साथ चाहिए

आज नारी को आसरा नहीं एकसाथ चाहिए

अपनी व्यथा न कहकर, छुप छुप कर रोने के दिन बीत गये,

सबके दिलों को चीर कर रखने वाली  बुलन्द आवाज चाहिए

आज नारी को आसरा नहीं,साथ चाहिए

अब बिना पंखों के हीं सही,न रुकने वाली उड़ान चाहिए

देवी नहीं बनना चाहती वो

बस उसे तो अपनी पहचान चाहिए।

आज नारी को आसरा नहीं साथ चाहिए।


राज खंडेलवाल

मथुरा शाखा

मनीषा अग्रवाल सिवनी मालवा नर्मदा पुरम मध्य प्रदेश

बहुत कुछ बदल रहा है

बहुत कुछ बदलना

अभी बाकी है।

उड़ना तो हमने सीख लिया

पर आसमाॉ छूना

अभी बाकी है।

रंग, जो फीके पड़ गए थे

जिंदगी के

उन्हें चमकाना

अभी बाकी है।

हसरतें, जो मन की रह गई थी अधूरी

उन्हें पूरी करना

अभी बाकी है।

सबको खुश रखना तो सीख लिया

खुद को खुश करना

अभी बाकी है।

बहुत कुछ सुन लिया

अब थोड़ा कहना

अभी बाकी है।

आधी जिंदगी तो गुजर गई

पर खुल कर जीना

अभी बाकी है।

मां ,पत्नी ,बहन ,बेटी

तो बन गई

पर खुद की पहचान

अभी बाकी है।।


मनीषा अग्रवाल

सिवनी मालवा

नर्मदा पुरम मध्य प्रदेश

ममता माहेश्वरी, गुना शाखा, मध्य प्रदेश

 जबसे मैंने आँखें खोली माँ तूने ही मुझे सवारा सजाया 

तेरे स्नेह  के आँचल ने हर ख़तरे से मुझे बचाया 

जीवन के हर ज़हर को पल्लू से छानकर अमृत बनाया 

कहने को तो माँ हो मेरी लेकिन पहला दोस्त तुम्हें बनाया 

रिश्तों की हर गठरी  को सहेजना तुमने सिखलाया 

सही है ये, ग़लत क्या है ? भेद तुमने बतलाया 

पढ़ाई में बनी मेरी टीचर कभी पापा का कुर्ता पहन डराया 

जब भी उदास हो गयी मैं तुमने ही मुझे बहलाया 

2 क़दम पीछे रहकर मेरे कंधों को ढाढ़स बँधाया 

संबल बनी ढाल बनी जब जब मैंने ख़ुद को अकेला पाया 

खेल खेल में जीवन का हर पाठ मुझे पढ़ाया 

हिम्मत से लड़ सकूँ दुनियाँ से इस क़ाबिल मुझे बनाया


ममता माहेश्वरी 

गुना शाखा मध्य प्रदेश

रुचिका हरभजनका, महानंदा नगर, मध्यप्रदेश

 "हिंदी का गौरव"

हिंदुस्तानी होकर हिंदी भाषा को नमन करते हुए मेरे कथन....

जब हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को दिल की आवाज बनाता है ,

माँ सरस्वती का वास उसकी वाणी में हो जाता है ,

उसका हर कथन "तथास्तु"बनकर शंखनाद करता है ,

तब उसका हर शब्द एक कवच बन जाता है ,

जब हिंदी को 'भाषा साम्रागी 'का ताज मिल जाता है  ,

तब गौरवान्वित होकर मेरा हर कथन मेरी मातृभाषा को शीश झुकाता है ।

भारत माँ की जय का नारा हो या लहराये जब तिरंगा प्यारा ,

 जो शब्द जहन में गूंजे वो जयकार हमारी मातृभाषा है ,

जब सरहद पर सिपाही देशभक्ति का गीत गुनगुनाएं और वतन के लिए गोली तक झेल जाए ,

उस गोली को पार करता जयहिंद शब्द हिंदी का गौरव बन जब इठलाता है , 

तब मेरा हर कथन मेरी मातृभाषा को शीश झुकाता है ,

अपने गीतों से गीतकार जब प्यार के दिये जलाता है , 

कवि अपनी कलम से देखो कैसे तीर चलाता है ,

जब लेखक अपनी लेखनी से वतन की तस्वीर बदल देता है ,

 हिंदी भाषा में लिखे वक्तव्य " जियो और जीने दो "जब मुस्कुराते हैं ,

तब फिर से मेरे कथन अपनी मातृभाषा को शीश झुकाते हैं ।

जब जश्न कोई हम मनाते हैं ,

वतन से आतंकवाद को हटाते हैं ,

भ्रष्टाचारी का दानव जब दम तोड़ता है ,

भारत का अभिमन्यु जब घर लौटता है ,

काश्मीर फिर हमारा गहना बन जाता है , 

तब वंदेमातरम का 'जयनाद' हिंदी में गुनगुनाता है ,

और फिर से मेरा हर शब्द अपनी मातृभाषा को शीश झुकाता है ,

चाँद पर जीवन की खोज करते चंद्रयान को चाँद जब गले लगाता है ,

तब भी हिंदुस्तान "कोशिश करने वालों की हार नही होती" शब्दों के साथ मुस्कुराता है ,

विभिन्न भाषी जनमानस के मुख से भारतवर्ष महान का नारा देखो कैसे गूंज जाता है ,

तब फिर से मेरा हर कथन अपनी मातृभाषा के सम्मान में सर झुकाता है । 

    

रुचिका  हरभजनका

महानंदा नगर  मध्यप्रदेश

चंदा दाधीच पश्चिम इंदौर शाखा मध्यप्रदेश

          बाप


घोडो बण्यो गडोल्यां चाल्यो,

ले बेटा नें मोरां पर।


गोडा घिस घिस घणों कमायो,

खरच कर दियो छोरां पर।


खुदरे तो फाटी अंगरखी,

सूट दिराया बेटा नें।


खुद चपलां सुं काम चलायो,

बूंट दिराया बेटा नें।


घणों लडायो घणों पढायो,

पछै चढायो घोडी पर।


पांच पांच सौ रा नोट ओवारया,

बेटा बहू री जोडी पर।


थोडा दिन तो स्याणां रिया,

पछै शुरू खटपट होगी।


सास बऊ में अणबणं होगी,

किचकिच अर झिकझिक होगी।


टूट गयो विश्वास बाप रो,

बेटो रण में कूद गयो।


कात्यो सूत कपूत निवडग्यो,

मूल गियो अर सूद गयो।


छाती रे चेपर राख्या बे,

मूंग दले है छाती पर।


तूं तूं पर उतर आया अर,

केवणं लाग्या पांती कर।


बेटी गई पराया घर में,

बेटो भी न्यारो होग्यो।


बुढापे आंख्यां सुं ओझल,

आंख्यां रो तारो होग्यो।


झर झर आंसूं मां रोवे है,

बाप रोवे है घुटघुट कर।


सेवा रा सपना टूट्या अर,

सुख री आशा गई बिखर।


खुदरो घर खावणं नें दौडे,

सन्नाटो सो गयो पसर।


कुणं समझे उणं मां रा दुख नें,

बांझ रिवी बेटा जणकर।


दो पाटां बिच बाप पिसीजे,

छाती ने करडी कर कर।


आंसूं पी पी दिन काटे है,

कियां कटैली आ ऊमर।


खुदरो खून परायो होग्यो,

खुदरी पीड सुणावे किणनें।


मांय रोवे अर मुंडे मुलके,

खुदरो दरद बतावे किणंनें।


 ढलती ऊमर में

कमर झुकी,

 अर गोडा थाक्या।


ऐडा दिन देखणं री खातर,

राम जींवता क्यांनें राख्या।


बाप बण्या जद घणां फूलीज्या,

थाली बाजी ढोल घुराया।


मांचा में मा बाप पड्या जद,

बेटा देखण नें नहीं आया।            

🙏 🙏🙏🙏

चंदा दाधीच

पश्चिम इंदौर शाखा

सुधा गुप्ता, लखनऊ, उतरप्रदेश

 छूट गया 

जो छूट गया सो छूट गया

कच्चे धागे थे टूट गऐ

फिर जीवन पथ पर मुड़ना क्या

तू जिसकी याद मैं रोया है

उसने भी तुझे क्या खोया है

फिर नीले आसमान मैं

 बनजारों सा उड़ना क्या

जीवन पथ पर यू मुड़ना क्या

अंत हुआ फिर जुड़ना क्या..


सुधा गुप्ता

 लखनऊ

चंदन खेमका, बनारस, उतरप्रदेश

 दूसरों के अस्तित्व में स्वंय के अस्तित्व को 

तिरोहित कर देना ही हमारी नियती थी, 

परंतु आज मैं स्वयं  में स्वंय को तलाश रही हूँ, 

मेरा स्वंय  कहीं खो गया है। 

मेरा वजूद पैदा होते सिर्फ मैं नही था , 

तब मैं अपने माता पिता की अनचाही ही सही 

परन्तु पिता के नाम से जानी जानें वाली पुत्री थी, 

माँ के स्नेह आँचल से बँधी बेटी थी, 

बडे बहन भाइयों की छोटी बहन थी, 

तब भी मैं कहाँ थी। 

अपने लिए जीना और अपने अस्तित्व की पहचान का कभी प्रयास ही नहीं किया, 

अपनी इच्छाऐं भावनाएँ जाग्रत ही नहीं हुईं ।

विवाहोपरांत लगा किअब शायद मेरा 

अन्तस मेरी स्वंय की तलाश कर लेगा, 

परंतु पहले जो बन्धन भावनाओं से बंधे थे 

अब वे सामाजिक बन्धन के स्वरुप में और कठोर हो गए । 

माँ बनकर मातृत्व की प्राप्ति से नारी जीवन सार्थक हुआ,

परन्तु आज भी मैं स्वयं को ढूंढ ही रही हूँ और मेरा 

ये अन्तहीन सफर कब खत्म होगा मुझे भी नहीं पता ?

चंदन खेमका,

बनारस उतरप्रदेश  

नेहा अविनाश अग्रवाल, चांपा, छत्तीसगढ

 आओ सखियों मिलकर 

एकजुट हो हम बढ़ाए कदम, कुछ अच्छा कार्य करे क्योंकि मिला हैं हमें मानव जन्म।

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जबसे जन्म हुआ तबसे ही, हम खेल रहे प्रकृति की गोद में 🧚 अब जब बारी आई इसके देखभाल की तो, सब पड़ गए किस सोंच में।

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जब नींद लगी तो ममतामयी 🌿🌿

धरती मां ने अपने हरे भरे गोद में सुला लिया, भूख लगी तो धरा से उगे अन्न और फल से तृप्ति पा लिया।

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जब ठंड लगी तो सूरज🌄🌤️ 

की किरणों से गर्मी हमने पाई, गर्मी में पसीने की बूंद हटाने फिर पेड़ों ने शीतल हवा चलाई।

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जब प्यास लगी तो 💧💧

गंगा सी कलकल बहती नदियों ने प्यास बुझाई, हुआ झूम कर नाचने का मन तो कोयल ने कुहू कुहू आवाज लगाई।

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क्या कुछ नही देती यह💚💚💚💚 

धरती मां,क्या कभी क्षण भर के लिए भी सोंचा हमने। हम तो बस इसी हिसाब ने लगे हुए की आज कितनी कमाई की हमने।

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फिर कल कहां घूमने और पिकनिक मनाने है जाना, कौन सी मूवी देखनी हैं और किस रेस्टोरेंट में जाकर है खाना , खाना।

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कभी क्षण भर रुक कर सोंचिए, कि क्या हो, प्रकृति भी बन जाए अगर स्वार्थी, अरे भाई साहब! यही प्रकृति ही तो साथ देती है, जब आए तब पालना बनकर और जाते वक्त बनती है अर्थी।

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क्या नही हमारा कोई कर्तव्य, कि करें हम इसकी देखभाल, यह तो निःस्वार्थ देते आई हैं सदियों से, और देती रहेगी सालो साल।

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लेने वाले से देने वाला कहलाता है हरदम महान, फिर अगर आपने नही चुकाया प्रकृति का कर्ज, तो बेकार है आपकी ये, धन दौलत और झूठी शान।

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✏️नेहा अविनाश अग्रवाल, चांपा, छत्तीसगढ 🙏

संतोष अग्रवाल छत्तीसगढ

 मुझे याद रखने के लिए 

🙏मेरी आँखे उस आदमी को दे देना जिस ने कभी उगता हुआ सुरज न देखा हो 

और न ही किसी बच्चो का चेहरा,य फिर नारी की ऑखो में अगाध प्रेम। 

मेरा दिल उसे देना जिस के दिल ने उस को सिवाय पीड़ा के और कुछ न दिया हो। 

मेरा खुन उस नौजवान को देना जिसे जख्मी हालत में उस की गाड़ी के मलबे में से 

निकाला गया हो,ताकि उम्र पाकर वह अपने पोते पत्तियों को खेलता देख सके।

मेरे गुर्दे उसे देना जो हफ्ते दर  हफ्ते मशीन के आधार पर ही जिन्दा रह रहा हो 

मेरा मांस मेरे शरीर की हर हड्डी,हर रेशा,हर नाड़ी निकाल लो 

लेकिन ऐसा तरीका खोज निकालो जिससे एक अपाहिज बच्चा चल पड़े 

मेरे दिमाग का हर कोना खोज,लो जरूरत पड़े तो मेरी कोशिकाएं भी ले लो

और उन्हें पनपने दो ताकि किसी दिन कोई गूँगा बच्चा पक्षी की आवाज सुनकर 

खुशी से चिल्ला उठे और कोई  बच्ची सुन न पाती हो बच्ची खिड़की पर टपकती बर्षा की 

बुॅदो की टप-टप सुन सके ।

मेरे बचे-खुचे शरीर को जला कर उस की राख हवा में बिखेर देना 

ताकि उस राख से फूल खिल सके। 

अगर तुम्हें दफनाना ही है तो दफना देना मेरी कमियाॅ मेरी कमजोरियां 

और दुसरों के लिए मेरे दिल में बसी तमाम रंजिशें। 

अगर कभी मुझे याद करना चाहो तो किसी जरूरतमंद को 

अपने दो मीठे बोलों और मदद का सहारा दे देना ।


🌺मैने पुस्तक पढ़ा पड़ते समय शब्द होनहार थे बहुत कुछ सीखने को मिला

 पुस्तक का नाम 🙏प्रभात का प्रकाश


बेटी को दे संस्कारो की पोटली

मां बेटी एक दूसरे की दुनिया होती है  

मां एक निर्माता होती है 

मां  का आंगन पार करने पर मां दो शिक्षा जरूर दे बेटी को बेटी के गुण मत सीखाए 

बेटी को बहु के गुण सीखाए धैर्य व धीरज न भुलना सीखाए।

रिशतो को समझदारी व गहराईयो से निभाना सीखाए

बेटी को सीखाए सास अच्छी सलाहकार व अच्छी दोस्त होती है। 



बेटी फुल की तरह नाजुक होती है 

बेटी जब एक दूसरी 

दुनिया मे प्रवेश करती है

 उस के जीवन मे नए लोग जैसे सास ससुर ननंद देवर पति और रिशते 

इन नए रिशतो को प्यार से सींचने के लिए बेटी को काफी कंपरोमाइज करने होते है। 

क्योकि रिशतो का पौधा मजबूत बन सके ।

बेटी जब ससुराल चली जाए मां को बाद मे उस पर छोड़ देना चाहिए ।

बेटी को अपनी जिन्दगी अपनी तरह जीने की सलाह दे 

मां बेटी को ससुराल के बीच अपनी भूमिकाए न निभाए बेटी को 

प्रेम की बोली स्वतंत्र निर्णय परिस्थितियो को समझे  यही सीख दे 

लडकी का ससुराल उस का अपना घर बन जाता है 

नए रिशते ज्यादा करीब हो जाते है ससुराल का मान-सम्मान उस का अपना हो जाता है 

लड़की वाले फोन समय देख कर  अंदाजा लगा कर करे जरूरत पर लगाये 

सास का समय   पति का समय ध्यान पर रखते हुए करे ।

हमेशा यह याद रखना चाहिए लड़की के परिवार वालो को 

कि लड़की का घर शिशे की तरह होता है छोटा स कंण दरारे डाल देती है यही दरारे 

मुश्किले पैदा कर देती है इस लिए रिशते की डोर को मजबूत बनाने का प्रयास करे 

एक बार रिशता मजबूती से जुड़जाए तो उसे कोई तोड नही सकता 

रिशते पारदर्शी होने चाहिए 

पहले जो हमारे पूर्वजो की परंपरा थी 

काफी सुन्दर गरिमामय उच्च विचार सहनशील मान-सम्मान नरम गरम 

इसलिए ही घर परिवार सुसज्जित ढंग से चलता था


संतोष अग्रवाल छत्तीसगढ 🙏

किरन अग्रवाल, प्रतापगढ़, यूपी

  नश्वर काया

जीवन का सत्य यही है बस।

 इसको तो एक दिन जाना है।

काफी तेजी से बीत गया।

जो बचा हुआ है अब उसको।

प्रभु भक्ति में ही लगाना है।

चाहें अनचाहे रिश्तों को, अब।

प्रेम से हमें निभाना है।

जो बीत गया वो अच्छा था।

जो बीत रहा वो भी अच्छा।

आगे कैसे बीतेगा यह।

इसकी हम सब को खबर कहां।

जाना है एक दिन हम सब को,

प्रभु के पावन चरणों में ही।

यह सत्य नहीं बदलेगा कभी।

एक दिन हम सब की बारी है।

कुछ ऐसा करके  गुजरना हैं।

यादों में जिंदा रह जाये।

इस माटी के पुतले को तो।

एक दिन माटी में मिलना है।

अब जाग मुसाफिर भोर हुई।

प्रभु भक्ति में खो जाना है।

वो पार लगा देगा सबको।

चरणों में समर्पित होना है।

क्षण भंगुर सारे रिश्ते हैं।

हमें समय का मोल चुकाना है।

जब तक ये शाशें बचीं हुईं।

जीवन का कर्ज चुकाना है।

हे राम,हे राम, हे राम


किरन अग्रवाल, प्रतापगढ़,  यूपी

Saturday, June 18, 2022

मीनू शर्मा शिलांग, मेघालय

 "पापा तेरा घर

पापा तेरा घर अच्छा बहुत लगता है मुझे

बंधन यह प्यार का बांध के रखता है मुझे

मन करता है इस घर के किसी कोने में छुप जाऊं मैं 

पर मन की कौन सुनता है।

पापा तेरा घर अच्छा बहुत लगता है मुझे

याद आती है हर उस पल की जो पूरे दिल से जिया है 

मैंने यहां मन करता है रुक जाऊं कुछ और पल को

पर मन की कौन सुनता है।

पापा तेरा घर अच्छा बहुत लगता है मुझे

बच्ची हूं मैं भी यह तो बस तेरे आंगन में ही पता चलता है

वरना तो अब जिंदगी में बस जिम्मेदारियों का बोझ ही साथ चलता है।

पापा तेरा घर अच्छा बहुत लगता है मुझे

आंख नम है पर चलना तो पड़ता है

सफर लंबा है पर पहुंचना तो पड़ता है

जाने का मन नहीं है तेरे आंगन से पर 

वह एक और आंगन इंतजार भी तो करता है

मन की कौन सुनता है

पापा तेरा घर अच्छा बहुत लगता है मुझे।🙏🙏 

मीनू शर्मा

शिलांग, मेघालय

लता लोधा चाकुलिया झारखण्ड

माँ की महिमा 

माँ की महिमा सबसे न्यारी 

दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती बनकर घर मे प्रकाश फैलाये 

माँ की शक्ति बड़ी निराली हर आंगन महकाये

माँ बहन पत्नी बनकर, घर मे अपने प्यार बरसाये । सबका ध्यान रखे तनमन से घर आंगन को महकाये।

नारी शक्ति बनके जनजन मे जाग्रति फेलाये ।हर जुग हर क्षेत्र मे नारी ऐसा काम करे 


इसलिए मा आदि शक्ति कहलाये , प्यार भरा घर संसार बनाये 

माॅ की गरिमा सबसे न्यारी 

माॅ की महिमा सबसे प्यारी ।


लता लोधा चाकुलिया झारखण्ड

सुधा केजरीवाल, तिनसुकिया शाखा, असम

हिंदुस्ता हमारा है


गर्व से अति महान

जगमग करता ये जहान

पवित्र पुनीत प्यारा धाम

हिंदुस्ता हमारा है।

कल कल करती ये नदियां

परमधाम को जाती है

लहराते ये खेत जिनमें

मोती अनगित उगते है।


ऊंची ऊँची पर्वत श्रेणी

प्रहरी बनकर आती है

रक्षा करती सीना ताने

दुश्मन को मार भगाती है।


लहराता तिरंगा झण्डा

त्याग शक्ति का प्रतीक है

सदा हरियली वर्षा ने 

कर्म संदेसा सुनाया है


पवित्र पुनित प्यारा धाम                                              

हिंदुस्ता हमारा है ।



जन्मदिन

हर फू ल आपको एक नया अरमान दे .

सूरज की हर किरण आपको सलाम दे

निकले कभी भी एक आँसू तो खुदा

आपको उससे दुगनी मुस्कान दे ।


खुधारी की महक दे .

होसले की मिठास दे

नियत में सच्चाई का स्वाद दे जिंदगी ऐसी दे 

जैसे महकता हुआ गुलाब


मजिले बहुत है अफसाने भी बहुत है

जिंदगी की राह में इम्तिहान भी बहुत है

मत करो दुःख उनका जो कभी मिला नहीं

दुनिया में खुश रहने के बहाने भी बहुत है।


सुधा केजरीवाल

तिनसुकिया शाखा 


प्रियंका चौधरी, कतरास गढ़, झारखण्ड

अपगंता

मैं अपंग हूं

मेरी अपंगता पर मैं विवश हूं

पर मैं उड़ना चाहती 

चलना दौड़ना चाहती हूं।

पर मैं अपने पैरों से विवश हूं

समाज भी मुझे

अपाहिजता का बोध करातीहैं

मैं आगे बढ़ना चाहती हूं 

पर दुनिया मुझे नकारा समझ कर

अंधकार में धकेलना चाहती

मैं इस अंधकार से निकल कर 

स्वतंत्र जीवन जीना चाहती हूं

मुझे भीख नहीं

आगे बढ़ने की राह दिखाओ

मुझे सहारा नहीं

मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाओ

मैं स्वतंत्र होकर

दुनिया में घूमना चाहती हूं

मेरी अपंगता पर मुझे

विवशता का एहसास मत कराओ।।


औरत

इस युग में कृष्ण का

इन्तजार मत कर द्रौपदी

घोर कलयुग की है 21वीं सदी

आसुं से नहीं अंगारों से

अपनी आंखें भरनी है ।

कृष्ण के भेष में

दुस्शासन घात लगाएं हैं

जिनसे आशा है हमको

वह ईमान बेच कर बैठे हैं।

शस्त्र उठालो द्रौपदी

नहीं और कुछ कर सकती

मेहंदी से नहीं

तलवारो से श्रृंगार करो

तुमको ही देने होगे

अपराधियो को सजा

इस युग में जीना हैं

तो स्वालम्बी बनो ।


प्रियंका चौधरी 

कतरास गढ़

 झारखण्ड 

९५९८१६९३५५ 

पुष्पा रूंगटा चाकुलिया शाखा झारखण्ड प्रान्त


सुंदर सोच सुंदर शब्द


रखोगे सोच सुंदर तो, 

शब्द निकलेंगे सुंदर ही। 

प्यार होगा सोच में तो, 

नफरत के शब्द निकलेंगे क्योंॽ


शब्दों में ताकत है कितनी,

हम समझेंगे इनके प्रयोग से।

उचित शब्दों का करें प्रयोग,

शब्दों का करें उचित प्रयोग।


शब्द ही मिठास लाते रिश्तों में,

शब्द ही छलनी कर देते दिल में ।


शब्द हैं प्रतिबिंब सोच के ,

शब्द ही है आधार सोच के ।


गंदी सोच कभी रखना नहीं, 

शब्दों को गर रखना है सही। 

सुंदर शब्द संवारेंगे जीवन,

सुंदर शब्द ही संवारेंगे अमन ।



ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश ""कल"" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


- स्वरचित

पुष्पा रूंगटा चाकुलिया शाखा झारखण्ड प्रान्त 9304610371

मनीषा राठी उज्जैन पश्चिमांचल मध्यप्रदेश

पर्यावरण 

पर्यावरण पिता तुल्य तो 

प्रकृति हमारी माँ 

आशीषो से जिनके 

फलते फूलते हम सदा।

प्रकृति माँ बन हमें दुलारती 

सिर पर छत नीले आकाश की 

पैरों के नीचे हरियाली की चादर बिछाती।

व्योम में अठखेलियाँ करते बादल 

कभी इंद्रधनुष की छँटा बिखरती 

चिड़ियों की चहचहाहट मन को मोह लेती।

नदियों का मधुर स्वर कल कल है करता

झरनों से स्वच्छ जल पर्वत शिखर से गिरता 

अनुपम छबि प्रकृति की मदहोश कर देती ।

प्रकृति से ही जीवन है, सहेजना है नियति ।

प्रदूषण से पर्यावरण की आत्मा हो रही छलनी 

हे मानव तेरी मनमानी अब नही है चलनी।


माँ की तरह हो पर्यावरण का सम्मान 

वृक्षों का पहनाओ नवीन परिधान 

नदियों में मत फैलाओ गंदगी 

ऐसे होगी प्रकृति की बंदगी ।


जीवन प्रकृति से है ये बात लो जान 

इस धरा पर हम सब है बस मेहमान 

वन पर्वत सागर हैं प्रकृति की गरिमा 

मत इनको पहुँचाओ नुक़सान ।


जिस क्षण तनी भ्रकुटी प्रकृति की 

मानव का नामोनिशान मिट जायगा 

संभल जा ए इंसान अब भी वक़्त है 

क्यूँकि प्रकृति अब तेरे ख़िलाफ़ सख़्त है ।


 राष्ट्र चेतना

विषय -पर्यावरण 

राष्ट्र हमारा गौरवशाली

वंदन इसको हम करते हैं


पर्यावरण पिता तुल्य तो 

प्रकृति हमारी माँ 

आशीषो से जिनके 

फलते फूलते हम सदा।


प्रकृति माँ बन हमें दुलारती 

सिर पर छत नीले आकाश की 

पैरों के नीचे हरियाली की चादर बिछाती।


मनीषा राठी

अध्यक्ष 

उज्जैन पश्चिमांचल शाखा 

उज्जैन मप्र.

Mob-9165878600"

Saturday, May 28, 2022

आसाम, गुवाहाटी, नीलम चौधरी

 बेटियां करे पुकार..


कुहू- कुहू ! यह किस कोयल की रागिनी है?

जिसने पूरे वातावरण को संगीतमय बनाया है,

यह तो मेरी बेटी का कृंदन है,

जिसने मेरे घर में जन्म लिया है।।


मधुर रस मेरे कानों में वह घोल रही है,

आकर्षण कुछ ऐसा उसमें,

पूरी कायनात को वह मोह रही है।।


गोद में उसे उठाया मैंने,

अंदर तक आत्मा प्रफुल्लित हो गई।

लिपट गई मुझसे वह ऐसे,

जैसे जहां की खुशियां उसे मिल गई।


उसके तन मन की सुंदरता, कुशाग्रबुद्धि ने,

मेरी छाती गर्व से चौड़ी कर दी,

प्रेम और संस्कारों का धन उसके पास,

सीप की चमक उसने चहुं और फैला दी।।

 

एक समय ऐसा भी आया,

बाबुल के घर से उसे विदा होना पड़ा।।

जान से प्यारी बिटिया को,

डोली में बैठाना पड़ा।।


पर ससुराल में भी उस नव परिणीता ने,

स्वयं को सदा अकेला पाया है।    

 दहेज की आग में जलती उसकी लाज,

सब ने उसके आत्मसम्मान को तिल - तिल जलाया  है।।


उफ़ ना  कभी की बेटी ने,

हमेशा मुस्कान के पीछे दर्द छुपाया है।

दुख ने जो भरे उसकी नैनों में आंसू,

कभी मां-बाप के सामने नहीं  छलकाया है।।


अपनों के व्यंग्य बाण से ,

हुआ उसका मन आहत,

जख्मों से भरा शरीर उसका ,

पर डोलने ना दी अपनी हिम्मत।।


पर यह क्या!....


बढ गई लोभियो की हिम्मत,

कर दिया उसे आग के हवाले,

चिल्ला रही वह, पुकार रही वह,

आजा बाबुल ,मुझे बचा ले।


एक डरावना सपने से भी डरावना वह पल,

उन पापियों के सामने ना टल सकता था ,न टला वह पल।।


या खुदा...


क्यों होते देख रहा बेटियों पर 

इतना अत्याचार,

या तो बेटी पैदा करना बंद कर दे,

या दें उसे उसका पूरा अधिकार।।


               

आसाम, गुवाहाटी, नीलम चौधुरी

             

बिहार, जोगबनी, मीना गोयल

 पता है मुझे...

तेरे बिन मैं कुछ नही हूँ

पर मैं सबकुछ होना चाहती  हूँ।।

मैं बिना वजह  हंसती हूं... मैं बिना  समझे बोलती हूं...

इसलिए कि  मैं खुश रहना चाहती  हूँ  ।।

बच्चों सी मासूमियत... मुस्कुराहट.. अपने खोए  बचपन को बचाकर रखना चाहती हूँ ।।

पता है मुझे  ....

मैं अच्छा  नृत्य नही करती हूँ

पर मैं आनंदित हूँ 

बिना ताल  मटकना चाहती हूँ।।

पता है मुझे...मैं सुंदर भी  नही हूँ।

लेकिन फिर भी मैं खुद को 

 संवारना चाहती हूँ।।

पता है अभी... मैं अच्छा नही लिखती  पर मेरा भी मन है... सबकुछ बताना चाहती हूँ।।

मेरे न रहने पर भी जो बाते जिंदा रहे..वो सब भी मैं  लिखना चाहती हूँ।।

किसी वजह से तो सब हंसते हैं...

पर मै बिना वजह  मुस्कुराना चाहती हूँ।।

*मैं कुछ नही हूँ पर सबकुछ होना चाहती हूँ*।।

स्वरचित 

बिहार, जोगबनी, मीना गोयल 

बिहार, बेगुसराय, रेखा खेमका

 *मानवता*


धर्म के नाम पर जान लेने को है तैयार, 

यह भगवान और खुदा से है कैसा प्यार?

मानव बड़ा ही बेशर्म हो गया है,

मानवता से बड़ा अब धर्म हो गया है।


धर्म ही मानव को मानवता का पाठ पढ़ाता है,

स्वार्थ, लालच और विचार हमसे गलत करता है।

धर्म को जाने, कर्म को जाने,

ईश्वर कण कण में हैं पहचाने।

मानवता ही बड़ा धर्म है, आओ मानवता को पहचाने।


मानवता से होगा जग उज्ज्वल,

मानवता में विश्वास रखो।

निर्माण करें हम प्रेम फूलो का,

मानवता को मानव से जोड़ें

मानवता ही बड़ा धर्म है,

आओ दिल से दिल जोड़ें।।


बिहार, बेगुसराय, रेखा खेमका 

उड़ीसा, ब्रह्म पूर, शांति मुदरा

 संस्कार और संस्कृति

आजकल की बहु बेटीया भी गजब ढा रही है , जिस घर में जाकर देखो सब जॉब पर जा रही है .।


सुबह नौ बजते ही वो काम पर निकल जाती है , अपने परिवार लिए भी खाना कहा बना पाती है ।


बच्चे कब स्कुल को जाते है, कब लौंटकर घर को आते है पता तक ना होता है इस बात का ।

बस पैसा कमाना ही उनका मकसद है, परवाह न रहती दिन और रात का  ।


अभी बच्चे तो पल रहे है आया के भरोसे, फिर बड़े होकर चले जाएगे कमाने प्रदेश ।

जिन बच्चो को माँ _बाप का प्यार ही नशीब  नही उन बच्चो को क्या पता होगा, 


संस्कारो और संस्कृति के बारे में विशेष ।

कि, कौन है दादा कौन है दादी कौन है नाना नानी ।

आने वाली हमारी नयी पिढी तो किताबो में ही पढा करेगी संस्कार और संस्कृति की कहानी।


माना कि पैसा जीवन की जरुरत है,पर संस्कार है जीवन का आधार।

अपने बच्चो को संस्कारी बनाओ देकर के परिवार का प्यार ।


उड़ीसा, ब्रह्म पूर, शांति मुदरा 

आसाम, देरगांव शाखा, मनोरमा जैन

रक्त दान


मानव हो, मानवता का चरम रूप धर ।

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


रक्तदान से बड़ा, ना कोई दान है 

रक्तदाता से बड़ा, ना कोई महान है

अपने लहु से बचाता जो औरों की जान है

पुण्यात्मा और पूज्य वह इन्सान है ।

इन्सान हो, इंसानियत का चढ़ जा शिखर 

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


रक्त्दानीयो के जब चलेंगे काफिले

रक्त अल्पता मरीजों की थमेगी मुश्किलें 

दुर्घटना ग्रस्त हज़ारों नव जीवन पाएंगे

तेरा रक्त पा कर फिर से जी जाएंगे ।

मरते हुए में रक्त से फिर से जान भर

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


गरीब या अमीर हो सभी यहाँ समान ।

ज़रुरतमंद कोई हो अपना या पराया

रक्तदानीयों के लिए अपना सारा जहां

रक्तदान से नहीं कोई भी नुक्सान

आगे बढ़ संशय ना कर बना रहे निडर

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


कुछ सरफिरें देखो ले रहें निर्दोषों की जान

रक्तदान ललकार तेरी बचालो घायलों के प्राण 

सीमा पर लड़ते प्रहरी देश के खातिर जो क़ुर्बान  

वहां भी रक्तदान यज्ञ से बचेंगे वीरों के प्राण ।

जीवन में कई दान किए अब ये महादान कर

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर ।


आसाम, देरगांव शाखा, मनोरमा जैन

उत्तरप्रदेश, प्रतापगढ़, संगीता खंडेलवाल

 मैं ख़ुशी कहाँ मिलती!!


एक दिन स्वपन में आई खुशी!!

बोली मैं महलों में नहीं

मंदिर-में नहीं

रामायण, गीता मैं नहीं

महंगे कपड़ो , मोटर-गाड़ी सब लगते मुझे सजावटी

मैं खुशी!!

हर दिल में मैं मिलती

बस मुझे चाहने के लिए बनों सरल व संतोषी

फिर देखो

मैं तो दिन-रात पास में ही रहती

मैं हूं थककर आते पति की चाय की चुस्की

मैं खुशी

बच्चों की मुस्कुराहट में मैं मिलती

अतिथियो के सत्कार से मैं मिलती

बड़ों का आदर,छोटों को प्यार से मैं मिलती

पडोसियों के सुख-दुख में शामिल होने से मिलती..

मैं खुशी

दया, धर्म, मान सम्मान 

मीठे बोल से मैं चहकती

मैं सच्चे दोस्तों मैं महकती 

स्वच्छ व स्वस्थ वातावरण को मैंलुभाती

हरियाली देख नाचती बन मोरनी..

जो अपने दायित्वों में दिखाते ईमानदारी

मैं रहती वहींं जो है मेहनती, सरल, सहज 

‘मैं खुशी बाल मन मैं मिलती !!!!


उत्तरप्रदेश, प्रतापगढ़, संगीता खंडेलवाल


उड़ीसा, बडबिल, डा. रजनीश शर्मा

  पर्यावरण                                                                    

पर्यावरण का अदभुत संगम।                                              

रो-रो  क़र अब कहता है।                                                        

निकल मेरे अतीत पर अब।                                             

जब पादप ,तटनीऔर महीधर                                              

दूध सा झरना बहे अकड़ कर।                                          

लहरें जब इठलाये ,विमल सरिता शरमाए।                        

सघन प्रतिबिम्ब क़ी चादर ओढ़े, वसुन्धरा भी  हरषाये                

नीम का कड़वा दातुन भी तब अपनी धाक जमा जाए।       

बरगद,पीपल और आँवला जन जन-जन में पूजे जाय।                                    

चमकते सूर्य क़ी रश्मि दीप अविरल बन जाए                      

फिर इस आपाधापी में , तकनीकी की आँधी में।                  

ठूँठ हो गये वृक्ष घनेरे, मौन हो गईं धरा ये सारी।                                                                                                                                                 

हे नर शपथ ये दोहराओ,धरा फिर से मह्काओ                                                         

वृक्षों को  बचाते जाओ, नये वृक्ष सजाते जाओ


-उड़ीसा, बडबिल, डा. रजनीश शर्मा  

आसाम, देर गावं, निशा काबरा

हिंदी हैं हम


हिंदी को नई  पहचान दिलाई 

मोदी जी ने,

हिंदी को ऊंचा मुकाम दिलाया

मोदी जी ने,

हिंदी को जन जन तक पहुंचाया

मोदी जी ने,

विश्व में हिंदी का झंडा फहराया 

मोदी जी ने,

भारतवासियों को हिंदी का महत्व समझाया

मोदी जी ने,

हिंदी को राष्ट्र संघ में स्थान दिलाया

मोदी जी ने।


हम भी हिंद के वासी हैं,

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है,

हिंदी को हमसे बहुत आशा हैं,

हिंदी को बढ़ावा देना होगा,

बच्चों को हिंदी सीखना होगा,

हिंदी का आत्मविश्वास जगाना होगा,

हिंदी को निरंतर प्रयोग में लाना होगा,

हिंदी को दिल से अपनाना होगा,

हिंदी की मशाल को जलाना होगा।


हिंदी की मशाल को जलाना होगा।।


 गौ सेवा मातृभूमि की पुकार* 


गौ सेवा है पुण्य महान

गौ सेवा को उत्तम जान,

गौ सेवा भारत की शान

गौ सेवा से सृष्टि जहान।



गौ सेवा मातृभूमि की पुकार,

गौ माता का ना कर अपकार,

गौ माता हैं सृष्टि का आधार,

गौ सेवा से रखो सरोकार।


गौ माता की सेवा करना,

गौ माता की रक्षा करना,

गौ माता की हत्या रोकना,

गौ माता को अपना कहना,

अपने जीवन को पुण्य बनाना।


गौ मूत्र,गोबर से कटते हैं रोग,

गौ सेवा से शरीर रहे निरोग,

गौ सेवा से सुधरेगा परलोक,

गौ सेवा हैं सबसे शुभ संयोग।


गौशाला में हर दिन जाना,

गौ माता के दर्शन करना,

गायों को चारा खिलाना,

गायों के लिए तन धन लुटाना,

अपने कुल का मान बढ़ाना।


 आसाम, देर गावं, निशा काबरा 

महाराष्ट्र, नागपुर, माया शर्मा

 🌹🙏 **माँ** 🙏🌹


जिसके एक नयन में ममता,

एक नयन में करुणा है, 

जिसका हृदय प्यार का सागर ,

प्रभु की वह रचना मां है। 

 

कन  कन में ईश्वर रहता है, 

ये तो हर कोई कहता है।

लेकिन ना किसी ने देखा है,

इसलिए एक अंदेशा है           

 है सर्वत्र व्याप्त ईश्वर,

हर शास्त्र यही तो कहता है।

शायद मां के रूप में ईश्वर हर घर घर में रहता है। 


माता  के तन से ही हमको इस  मानव  तन का दान मिला।

वो देवी है मां जिससे मानव जीवन का वरदान मिला।

मां से सब है,

मां ही रब है,

राग रंग सबमें मां है।

इस नीरस जग में माता,

सरस सलोना झरना है।


 रग रग  मां के वात्सल्य से     सदा प्रफल्लित रहता है, 

शिरा शिरा में प्रेम उसी का रक्त रूप में बहता है। 

मां का त्याग अनोखा है,

मां का हर रूप अनूठा  है।

इस रिश्ते के सच के आगे,

हर रिश्ता लगता बोना है।


इस स्वप्निल संसार में,

मां ही सबसे सुंदर सपना है।

ईश्वर की रचनाओं में 

मां सबसे सुंदर रचना है।


सरस,शहद झरना है

और मां का हर त्याग अनोखा है ,

मां का हर रूप सलौना है।

 संसार कल्पना ईश्वर की, 

मां सबसे श्रेष्ठ कल्पना है।

मां के उपकार अनगिनत है,

 मां जैसा ना कोई दूजा।


मां की सेवा प्रभु की सेवा 

मां की पूजा प्रभु की पूजा।

मां के जैसी बस मां ही है,

मां का सा ना कोई दूजा। 


एहसान चुकाना कब  संभव ? एहसानों को स्वीकार करे।

इस प्रीत  प्रसविनी जननी की सच्चे मन से जयकार करें।



महाराष्ट्र, नागपुर, माया शर्मा

सरिता पालीवाल बाकि मोगरा, छतीसगढ़,

 मां... 

मैं कभी डरी नहीं, 

क्योंकि आप हमेशा साथ हो , 

मेरे इस पंछी मन का , 

आप ही सारा आकाश हो|

जीवन की तपती राहों में , 

आप ठंडी ठंडी छांव हो, 

 दिल ने जिसे मांगा है हर पल, 

 आप मेरी वह चाह हो|

आंचल तेरे दामन का, 

 मेरे सर पर हमेशा बना रहे, 

 तू हमेशा संग मेरे रहना मां, 

साथ भले कोई रहे ना रहे|



 मां तो मां होती है ... 


मां की कोई उपमा नहीं होती .. 

चाहे मेरी मां हो.. 

 या मेरी सासु मां|

*ओर एक छोटे से लम्हें को उठाने के लिए झुकने का मन उनका भी नहीं हुआ....*

*हम दोनों ने सोचा इतनी बड़ी जिंदगी में एक लम्हें के गिरने का क्या वज़ूद....*

*पर धीरे धीरे वो लम्हा फैलने लगा....*

*अपने आगोश में और भी कीमती क्षणों को समेटने लगा....*

*फिर हम दोनों ने खूब कोशिश की उस गिरे हुए एक लम्हें को समेटने की....*

*पर ये क्या उस इकलौते लम्हें ने तो कई छोटे छोटे लम्हों को जोड़कर अपना अलग वज़ूद बना लिया था....*

*जमीन पर गिरकर गहराइयों में अपनी जड़े फैला लिया था....*

*अब वो लम्हा लम्हा नहीं रह था खुद को एक किस्सा बना लिया था....*

*हम दोनों ने फिर लाख कोशिश पर उस लम्हें को समेट नही पाए....*

*फिर से हमारी जिंदगी में उस एक लम्हें को जोड़ नही पाए....*

*रहने को तो अब भी हम दोनों साथ है....*

*पर उस एक लम्हें के गिर जाने का हर पल हमें एहसाह है....*

*तो अपनीजिंदगी में कभी भी किसी लम्हें को छोटा मत समझना*

*गिरे हुए लमहों को समेटने के लिये उठना पड़े या फिर झुकना पड़े देर मत करना....*

*वरना होगा तो कुछ नहीं..... बस दो लोगों के बीच वो गिरा हुआ पल अपना वजूद बना जाएगा....*

*और क्या होता है जिंदगी से किसी एक क्षण का भी बिछड़ना आप को सीखा जाएगा....*



छतीसगढ़, बाकि मोगरा, सरिता पालीवाल 

छत्तीसगढ प्रदेश, बांकी मोगरा, संतोष अग्रवाल

 🌺माॅ अकेली ही काफी है


हजारो फूल चाहिए एक माला  पिरोने के लिए 

हजारो दिपक चाहिए एक 

थाली सजाने के लिए 

मां अकेली ही काफी है बच्चो की जिन्दगी को सुरक्षित बनाने के लिए।

हम भूल जाते है हमारी सारी जिन्दगी की परेशानियां 

जब हमारी मां अपने आंचल मे हमारा सर रख लेती है।

चलती फिरती आखों से हमे देखती है पहाड़ो जैसी कठिनाईया झेलती है 

सख्त राहों मे भी आसान सफर बनाती है। 

कभी खिलौने से खिलाया है

कभी आंचल मे छुपाया है 

मां मुझे अंगुली पकड़कर लिखना सिखलाया है  

मुझे आगे  बढना सिखलाया है 

अपनी प्यार भरी आखों से सहलाया है 

गलतियां करने पर भी मां ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है। 

लेकिन मां मेरी मुझ को हमेशा अपने सीने से लगाया है। 

मुझ में तेरी ही आंचल की खुशबू है माॅ 

ममता के आंचल मे बढा पला 

कामों की गढरी कंधो पर लादे 

कभी नही उफ्फ करती है माॅ 

मां बच्चो की चिन्ताओं का साझेदारी है मां ही सब है 

मां ओ मां अपने आंचल मे रखना मां

मां अकेली ही काफी है

मां अकेली ही काफी है



पर्यावरण से है जीवन इसे अपना हम सफर बनाना है

🌴मेरा मन भी घबराता है, दर्द मुझे भी होता है।

अब थोड़ी मुझ पर दया कर, बहुत कम बचे वृक्ष धरा पर।

🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे। 


🌴हरे है वन-उपवन जब तक, सुरक्षित है जीवन तब तक |

बड़ रहा ताप धरा का, पिघल रही हिमनद ये सारी | 

मै बादल को खींच लाता, अच्छी लगती बरसात मुझे |

🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे। 


🌴वृक्ष बिना जीवन सूना, सूना है घर आंगन 

देता हूं छाया अपनी, फल फूल से भरता हूं दामन

🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे। 

पर्यावरण से है जीवन इसे अपना हम सफर बनाना है। 


छत्तीसगढ प्रदेश, बांकी मोगरा, संतोष अग्रवाल

झारखंड, गिरिडीह, तुलिका सरावगी

 मातृ दिवस पर विशेष 

बच्चो के मुख से

आज मेरा 6 साल का पोता अद्वित मेरे पास खेल रहा था, 

खेल खेल में मैने उसे पुछा, बेटा बडे होकर तुम क्या बनोगे!!!!

उसने बडे मासूमियत से हाजिर जवाब दिया

 '''''कुछ नहीं बनूँगा, मै बडे होकर आराम करूँगा। 

मैने बहुत विस्मित होकर पुछा ''

''क्यूँ ?

तो उसने पुन: जवाब दिया: क्यूँकि अभी तो मुझे आराम करने का वक्त ही नहीं मिलता,

सुबह से मेरी मम्मा मुझे स्कूल फिर ट्यूसण,

डांस टीचर ड्रॉइंग टीचर आ जाते हैं और मै थक जाता हूँ,

एक मिनट भी आराम करने का वक्त ही नहीं मिलता।

बाल सुलभ मुख से सहज भाव से बोली बाते मेरे हृदय को छू गई।


 झारखंड, गिरिडीह, तुलिका सरावगी 

8th May 2022

झारखंड, चाकुलिया, लता लोधा

माँ की महिमा 

माँ की महिमा सबसे न्यारी 

दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती बनकर घर मे प्रकाश फैलाये 

माँ की शक्ति बड़ी निराली हर आंगन महकाये

माँ बहन पत्नी बनकर, घर मे अपने प्यार बरसाये । 


सबका ध्यान रखे तनमन से घर आंगन को महकाये।

नारी शक्ति बनके  जनजन मे जाग्रति फेलाये ।

हर जुग हर क्षेत्र मे नारी ऐसा काम करे 


इसलिए माॅ आदि शक्ति कहलाये, 

प्यार भरा घर संसार बनाये 

माॅ की गरिमा सबसे न्यारी 

माॅ की महिमा सबसे प्यारी ।


झारखंड, चाकुलिया, लता लोधा 

झारखंड, जमशेदपुर, पुष्पा संगी

 किताब

 

गुरुओं की गुरु है यह,

आचार्यों की है आचार्य।

हर एक को दिया है ज्ञान,

चाहे आर्य हो या अनार्य।


जीवन मार्ग करती है प्रशस्त

टूटता मनोबल करती है सशक्त,

अज्ञान के तम में दिया है,

भ्रांति को यथार्थ सेजिया है।


रूढ़िवादी दासता से दिलाती है मुक्ति,

कैसी भी हो उलझन, देती है युक्ति।


फूलों सी कोमल ता, इत्र सा पसराव।

बूझो तो कौन???


जीवन की सच्ची साथी किताब मैं किताब।


झारखंड, जमशेदपुर, पुष्पा संगी

झारखंड, जमशेदपुर, ऋतू नागेलिया

 ✏️ मां

आज सपने में मां आई थी

बोली कुछ नहीं बस मुस्कुराई थी

सोचा अपनी आपबीती सुनाऊं

जीवन की उथल पुथल बतलाऊं


जब तुम पास थी मेरे , मैं तुम्हें समझ नही पाई

आज जब खुद मां बनी ,तब तुम्हारी याद आई


कैसे करती थी तुम मुझे भी सिखाना

खुद को भुला कर जिंदगी बिताना

बच्चों की परवरिश मां का फर्ज होता है

आज समझी कि वो एक कर्ज होता है


अब मुझे भी ये कर्ज चुकाना है

अपने बच्चों के सुखद भविष्य का आधार बनाना है


जानती हूं कभी तुम अब वापस नही आओगी

मुझसे तो बस अब सपनों में ही मिल पाओगी

पर वो मां है सब जान गई

बेटी का दर्द पहचान गई


फिर माँ ने मुझको गले लगाया

तो इस बात पे यकिं आया 

कि दुनिया में इतना सुकून कहीं नहीं है

अगर स्वर्ग है कहीं तो बस यहीं है यहीं है 💔😞🤱


झारखंड, जमशेदपुर, ऋतू नागेलिया 

महाराष्ट्र , अकोला, सोनिया चेतन

 माँ की दहलीज



आज भी छोड़ते वक़्त दहलीज माँ की, धड़कने बढ़ जाती है।

वो पहली विदाई हुई थी , हर बार याद आ जाती  है।

वो आँचल की छाँव, फिर से धूप बन जाती है।

वो अल्हड़ सी बचकानिया, जो वहाँ छुपा कर रखती हूं।

वो छूकर तेरे आँगन को,फिर से जिंदा हो जाती है।


बस तू ही समझती है कि, मुझमें बचपना अभी भी बाकी है

वरना उस दहलीज़ पर जाकर तो, ये बच्ची बड़ी हो जाती है।


हर फरमाइश खुल जाती है, इस जुबान पे जो जो अटकी है।

जाने कैसा नाता है, बिन कहे तू समझ जाती है


महाराष्ट्र  , अकोला, सोनिया चेतन


झारखंड, जमशेदपुर, बबिता भावसिंहका

 मेरी सहेलियां 


कितनी प्यारी होती है सहेलियां, कितनी अनोखी होती है सहेलियां । 

हर रोज सहेलियों से मिलने का बहाना ढूंढा करते थे,

कहा गए वो दिन ...आज भी हम अपनी सहेलियों को ढूंढा करते है। 


मां बहन दादी चाची से जो बात बताने में कतराते थे। 

कितनी आसानी से यह बात अपनी सहेलियों से कह पाते थे। 

बचपन के सहेलियां आज भी याद आती है...

जब कभी आंखें बंद करूं तो वही बातें याद आती है।   

कब एक एक करके बिछड़ते चले गए,

पत्नी भाभी चाची आंटी न जाने क्या क्या कहलाने लग गए।


बचपन कब बीत गया सहेलियों वाला शब्द भूलते चले गए । 

आज भी सहेलियों के लिए दिल का एक कोना खाली है... 

कितनी याद आती है जब एक साथ हम खेला करते थे। 

कहा गया वो बचपन जो हर वक्त सहेलियों को ढूंढा करते थे।


कितनी प्यारी होती है सहेलियां , कितनी अच्छी होती है यह सहेलियां।।।

सारी सहेलियों को समर्पित।



झारखंड, जमशेदपुर, बबिता भावसिंहका 

झारखंड, जमशेदपुर, मीना अग्रवाल

 "" जिंदगी ""


जिंदगी से बड़ी, कोई सजा ही नहीं,

और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं।

इतने हिस्सों में ,बट गई हूं मैं ,

मेरे हिस्से में तो , कुछ बचा ही नहीं ।

जिंदगी से बड़ी  ,कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं ।

चाहे सोने के फ्रेम में , जड़ दो ,

"आईना" झूठ , बोलता ही नहीं ।

जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं ।

धन के हाथों , बिक गए हैं सभी ,

अब किसी जुल्म की , कोई सजा ही नहीं ।

जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है , कुछ पता ही नहीं ।

सच घटे या बड़े, तो सच-सच ना रहे ,

"यारो" - झूठ की तो कोई ," इंतेहा " ही नहीं, इंतेहा ही नहीं 

जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है ,कुछ पता ही नहीं ।। 


झारखंड, जमशेदपुर, मीना अग्रवाल 

झारखंड, जमशेदपुर,संगीता मित्तल

 *किरदार*


*मेरी निष्ठा,मेरे समर्पण के इजहार से खुशबू आये।*

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।*


 बातें करती हूँ सबसे मुस्कुरा के मगर।

दिल से किसी की बात को लगाया नहीं मैनें !।


चल रही हूं मैं दुनिया के उसूलों पर मगर ।

 ईमान कभी अपना डिगाया नहीं मैनें।।


गलतियाँ भी हुई है मुझ से बहुत सी मगर।

 किसी और को ज़िम्मेदार कभी ठहराया नहीं मैनें!।


खुशियॉं चुराकर किसी और के दामन से।

क़िस्मत को कभी अपनीं  सजाया नहीं मैनें !।


किसी का साथ मिले ना मिले ।

पर ख़ुद को सफर में थकाया नहीं मैनें !।


  दोस्त बहुत से हैं मेरे इस ज़माने में।

 दोस्ती का रिश्ता दिल से निभाया है मैनें!।


दिल में कुछ और जुबॉं पे कुछ और।

जीने का ये सलीक़ा कभी अपनाया नहीं मैनें !।


भले ही ना दी हो खुशियॉं  किसी के लबों को।

पर किसी की आँखों को  भिगोया नहीं मैनें!।


सुख, दुख के पल हों ,या उदासी के भंवर।

ख़ुद पर से विश्वास कभी हटाया नहीं मैनें !।



*दिल से लिखे इस हर एक अशआर से खुशबू आये*।

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।।*


"*किरदार*


*मेरी निष्ठा,मेरे समर्पण के इजहार से खुशबू आये।*

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।*


बातें करती हूँ सबसे मुस्कुरा के मगर।

दिल से किसी की बात को लगाया नहीं मैनें !।


चल रही हूं मैं दुनिया के उसूलों पर मगर ।

ईमान कभी अपना डिगाया नहीं मैनें।।


गलतियाँ भी हुई है मुझ से बहुत सी मगर।

किसी और को ज़िम्मेदार कभी ठहराया नहीं मैनें!।


खुशियॉं चुराकर किसी और के दामन से।

क़िस्मत को कभी अपनीं सजाया नहीं मैनें !।


किसी का साथ मिले ना मिले ।

पर ख़ुद को सफर में थकाया नहीं मैनें !।


दोस्त बहुत से हैं मेरे इस ज़माने में।

दोस्ती का रिश्ता दिल से निभाया है मैनें!।


दिल में कुछ और जुबॉं पे कुछ और।

जीने का ये सलीक़ा कभी अपनाया नहीं मैनें !।


भले ही ना दी हो खुशियॉं किसी के लबों को।

पर किसी की आँखों को भिगोया नहीं मैनें!।


सुख, दुख के पल हों ,या उदासी के भंवर।

ख़ुद पर से विश्वास कभी हटाया नहीं मैनें !।


*दिल से लिखे इस हर एक अशआर से खुशबू आये*।

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।।*



झारखंड, जमशेदपुर, संगीता मित्तल

झारखंड, साहिबगंज, रेनू तमाखुवाला

संस्कार


 इंसान अपने जीवन में पैसे के महत्व को इतना बढ़ा लिया है कि बाकी चीजे उसके लिये महत्वहीन हो चुकी हैं. अच्छे संस्कार से बच्चे का चरित्र निर्माण होता है. इससे बच्चा जीवन में सफलता पाता है. बुढ़ापे में माता-पिता की सेवा करता है. दान-पूण्य, जरूरत मंदों की मदत करता है. संस्कार अच्छे होने से मनुष्य के विचार सकारात्मक होते है. जीवन में हार, दुःख, कठिनाई होने के बावजूद भी आप निराश नही होते है. आप वही आचरण करें, जैसा आप अपने बच्चे से चाहते है.


सन्तान न हो तो पूरे जीवन में सिर्फ एक दुःख होता है,

संतान संस्कारविहीन हो तो पूरा जीवन ही दुःख होता है.


जिनके संस्कार अच्छे होते है,

वो किसी का दिल नही दुखाते है,

चाहे प्यार में हो या मजाक में हो.


जो बच्चों को सिर्फ पैसा कमाना सिखाते है,

वही माँ-बाप बुढ़ापा अकेलेपन में बिताते है. 


झारखंड, साहिबगंज, रेनू तमाखुवाला 

झारखंड, जमशेदपुर, किरण देबुका

 माँ

माँ सबसे अटूट रिश्ता !! 

एक रिश्ता जिसमें माँ को कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं 

बस वो आँखें पढ लेती है !! 

ज़िंदगी के हर मोड़ पर माँ ने मुझे आगे बडना सीखाया !! 

हर लड़ाई को positive mind के साथ लड़ना सीखाया !! 

हिम्मत ना हारना बस बेटा तू मेहनत कर !! 

गलती पर डाँटना!! घर को संवारना !! 

हर एक activity में मुझे involve करना सीखया!! 

Love, concern n affection की तो वो एक मूरत थी!! 

माँ तू आज नहीं है!! पर तेरी परवरिश मेरे साथ हमेशा रहेगी!! 

I love you maa!! We all miss u a lot maa!!  MAA 🙏❤️ 


झारखंड, जमशेदपुर, किरण देबुका 

झारखंड, हजारीबाग, श्वेता सेठी

 *नारी*

*नारी हूं मैं नारी हूं*, सबकी मैं आभारी हूं।

घर सम्भालू तो  संसारी हूं, जो व्यापार संभालू तो व्यापारी हूं।

कुदरत की सर्वश्रेष्ठ कलाकारी हूं, हर बात की रखती जानकारी हूं।

मैं हर घर में खुशियों की किलकारी हूं।

*नारी मैं हूं मैं नारी हूं* ।

       हर गम को भुला दूं मैं हँसती  हँसती, मुझसे ही घर में खुशियां बस्ती।

कभी अबला तो कभी आदिशक्ति, ऐसी है हमारी कुछ अभिव्यक्ति। 

*नारी हूं मैं नारी हूं*, सबकी मैं आभारी हूं।

*धन्यवाद*


झारखंड, हजारीबाग, श्वेता सेठी

झारखंड, रांची, सरोज गर्ग रत्नप्रभा

 तू जननी है

स्वयं को आंकती क्यों कम है?

यूं दीन हीन लाचार बनकर

थर-थर कांपती क्यों है?


बन रणचंडी तांडव मचा

कर मर्दन शत्रु  (बलात्कारी)का

रूप धर काली का

ले खड्ग हाथ में

अंत कर दुराचारी का...


बन दामिनी टूट शत्रु पर

इतिहास तभी रच पाओगी

*_बन  स्वयंसिद्धा_*

 फिर अनगिनत बालाओं की

प्रेरणा तुम बन जाओगी...


दिन बहुरेंगे तेरे भी फिर

आसमान से सूरज- चांद- तारे भी

नई रोशनी बरसाएंगे;

कलरव करते पंछी भी फिर

गीत नया गुनगुनाएंगे,

देखना फिर मुरली वाले मोहन भी

आसमान में मुस्काएंगे...!!!



झारखंड, रांची, सरोज गर्ग रत्नप्रभा

 

कृष्णा सुल्तानिया, सरीइंदेला, झारखंड

 आज की शाम 


आज फिर से  जवानी   दिवानी हुई

देख कर ज़ाम महफ़िल रुमानी  हुई


चाहता था जिसे आज याद आ गई

दिल में हलचल मचा तो सुनामी हुई


शाम होती गई दिन ढला जब सनम

ज़ाम   हाथों  चढ़ा  बे  जुबानी  हुई 


आशिकी  में हमारे  कहीं  थी  कमी

चाह  कर  भी नहीं  ये  सुहानी  हुई


सुन सहज अब नहीं है कहीं आसरा

तार  दिल  की  बहुत ही  पुरानी हुई..


"आज की शाम 

आज फिर से जवानी दिवानी हुई

देख कर ज़ाम महफ़िल रुमानी हुई


चाहता था जिसे आज याद आ गई

दिल में हलचल मचा तो सुनामी हुई


शाम होती गई दिन ढला जब सनम

ज़ाम हाथों चढ़ा बे जुबानी हुई 


आशिकी में हमारे कहीं थी कमी

चाह कर भी नहीं ये सुहानी हुई


सुन सहज अब नहीं है कहीं आसरा

तार दिल की बहुत ही पुरानी हुई"


कृष्णा सुल्तानिया  

सरीइंदेला,  झारखंड

 

पश्चिम बंगाल, मिड डटाउन, सीमा अग्रवाल

 *धारावी*


महाराष्ट्र के मुंबई में एक जगह है धारावी,

बाशिंदों पर बेबसी ,भ्रष्टाचारी गरीबी है हावी,

आते हैं विदेशी उठाते हैं लुप्त लाचारी का,

रुपए देकर करते हैं भ्रमण गली गलियारों का,

दस बाय दस के कमरों में रहते हैं लोग दस दस,

दरिद्रता और दयनिता 

की मिसाल है वे लोग बस,

ड्राइंग रूम डायनिंग रूम और बाथरूम का देखते वो सपना,

दो जून की रोटी मिल जाए, भरे पेट परिवार और अपना,

धंधा करते हैं कभी ड्रग्स, गांजा और अफीम का,

चोरी करते हैं कभी कार ,बस और लोरी का,

उन्हीं मे पैदा होते हैं कुछ इमानदार कुछ दो नंबरी,

नहीं रुकती सुबह_ शाम ,दिन_ रात मुंबई मायानगरी,

दुनिया की सबसे बड़ी बस्ती, है दस लाख की आबादी,

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई है सभी को आजादी,

स्लमडॉग, गली बॉय बना कर पूरा करते मकसद,

कभी फिल्मफेयर कभी ऑस्कर कमाते करोड़ों नकद।


– पश्चिम बंगाल, मिड डटाउन,

सीमा अग्रवाल

झारखंड, खाटरस गढ़, प्रियंका चौधरी

औरत

इस युग में कृष्ण का

    इन्तजार मत कर द्रौपदी

घोर कलयुग की है 21वीं सदी

    आसुं से नहीं अंगारों से

   अपनी आंखें  भरनी है ।

कृष्ण के भेष में

     दुस्शासन घात लगाएं हैं

जिनसे आशा है हमको

     वह ईमान बेच कर बैठे हैं।

शस्त्र उठालो द्रौपदी

     नहीं और कुछ कर सकती

मेहंदी से नहीं

    तलवारो से  श्रृंगार करो

तुमको ही देने होगे

     अपराधियो को सजा

इस युग में जीना हैं

    तो स्वालम्बी बनो ।


झारखंड, खाटरस गढ़, प्रियंका चौधरी  

उड़ीसा, बरगढ, सरोज अग्रवाल

 *आखिर जीत गई मां की ममता*

 

हर बार मुश्किल है, पहाड़ बनकर सामने आई।

हर बार लगा मानो, हर सांस मेरी आखरी सांस है आई।

लेकिन हर बार, मां की ममता ही जीत पाई।


कभी बच्चों ने हैं, आंसू को छिपा मुझे खूब हंसाया।

तू कभी मैंने आंसू के हर घूंट पीकर साहस दिखाया।

लेकिन हर बार मां की ममता ही जीत पाई।


बच्चों के लिए ,जिंदगी से कुछ सांसे उधार मांगी।

हर सांस ,हर पल को अनमोल बनाया।

आखिर मौत को भी मात दे, मां की ममता ही जीत पाई।


*संघर्ष को विराम दे, वात्सल्य ने विजय पाई* 


उड़ीसा, बरगढ, सरोज अग्रवाल  

झारखंड, चाकुलिया, रीना केडिया

 एक भारत श्रेष्ठ भारत


क्या झारखण्ड, क्या बंगाल, क्या उत्तराखंड |

जब खड़ा हर एक भारतवासी अखंड |


नेताओं, बस करो! अब न फैलाओ सांप्रदायिक दंगे, 

याद रखो! हम सब हैं एक ही मालिक के बन्दे |


यूँ न फैलाओ चहुँ और वैचारिक लड़ाई, 

आखिर यह तो है भारत के लिए दुखदायी |


कुछ तो सबक लो- देख लो रूस और यूक्रेन की जंग, 

हर तरफ आज हो रहा बस दमन ही दमन |


याद करो इतिहास को- जब रफ़ी चाचा भी दिवाली मानते थे, 

राधा भी ईद की सेवइयां खाती थी | 

हमारी भारत माँ सोने की चिड़िया कहलाती थी |

..... सोने की चिड़िया कहलाती थी ||


एक भारत श्रेष्ठ भारत


क्या झारखण्ड, क्या बंगाल, क्या उत्तराखंड |

जब खड़ा हर एक भारतवासी अखंड |


नेताओं, बस करो! अब न फैलाओ सांप्रदायिक दंगे, 

याद रखो! हम सब हैं एक ही मालिक के बन्दे |


यूँ न फैलाओ चहुँ और वैचारिक लड़ाई, 

आखिर यह तो है भारत के लिए दुखदायी |


कुछ तो सबक लो- देख लो रूस और यूक्रेन की जंग, 

हर तरफ आज हो रहा बस दमन ही दमन |


याद करो इतिहास को- जब रफ़ी चाचा भी दिवाली मानते थे, 

राधा भी ईद की सेवइयां खाती थी | 

हमारी भारत माँ सोने की चिड़िया कहलाती थी |

..... सोने की चिड़िया कहलाती थी || 


झारखंड, चाकुलिया,  रीना केडिया

झारखंड, सरायकेला, रेखा सेकसरिया

 स्वच्छ पर्यावरण

आओ हम सब मिलकर पेड़ लगाएं

 सड़क किनारे छायादार बनाएं

खाली स्थानों पर पौधे लगाकर

पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं

नदियों में कचरा ना डालें

पानी स्वच्छ बनाएं

ऑटो रिक्शा एवं कार की जगह

साइकिल प्रयोग में लाएं

आओ हम सब मिलकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं

डिस्पोजल एवं प्लास्टिक का प्रयोग बंद कर हम

पत्तल एवं मिट्टी के बर्तन प्रयोग में लाएं

 इन सब चीजों का प्रयोग कर हम

धरती मां को स्वच्छ बनाएं

आओ हम सब पर्यावरण बचाएं


झारखंड, सरायकेला, रेखा सेकसरिया 

झारखंड, धनबाद, संजू डालमिया

 देश की शान "मजदूर"


कठोर परिश्रम के बल पर अपने

कठिन कर्म भी आसान करें वो

पथ की हर बाधा दूर कर हो अग्रसर

दुनिया में मज़दूर कहलाएँ वो 

रात दिन की परवाह किए बिना

लक्ष उनका मेहनत के बल पर 

मिट्टी से भी सोना उगा लेना 

मेहनत से इज्जत की दो वक्त की रोटी कमाएँ वो

दुनिया में मज़दूर कहलाएँ वो

अपनी जान जोखिम में डाल

सबके सपने साकार करता वो

खुद रूखी-सुखी खाकर रहता

सबके जीवन में ख़ुशियाँ लाए वो

दुनिया में मज़दूर कहलाएँ वो


झारखंड, धनबाद, संजू डालमिया 

झारखंड, चाकुलिया, पुष्पा रूंगटा

 ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि  पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश "कल" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


 झारखंड, चाकुलिया, पुष्पा   रूंगटा

श्वेता राटेरिया रायगढ़, छतीसगढ़,

जिन्दगी एक पहेली.....

कल अचानक से उससे मुलाकात हो गई , जिससे शिकायते बहुत थी उसी के तर्क पर निसार हो गई.....

चली जा रही थी वह गुनगुनाते हुए , मुझे देखा तो रुकी मुस्कुराते हुए..,.

मैंने पूछा कैसी पहेली हो तुम , कभी समझ ना आती हो....

खुद ही चोट देती हो , खुद ही इस पर मरहम लगाती हो....

कभी खुशियों की रास्ते पर ले जाकर , दर्द की मंजिल पर छोड़ आती हो....

तो कभी सपनों के शहर ले जाकर हकीकत से रूबरू करवाती हो....

कभी इतना हंसाती हो , कि जन्नत सी हसीन लगती हो....

कभी इतना रुलाती हो , की जहानुम सी गमगीन लगती हो....

मेरे सवालों पर खिलखिला उठी वह बोली , तू मुझे समझ ना समझ मैं तेरी सारथी हूं...

तेरे लड़खड़ाते कदमों को थाम , तेरी उंगली पकड़ तुझे चलना सिखाती हूं...

खुदा की बनाई पूरी कायनात से , तुझे रूबरू करवाती हूं....

गम से मिलवा के , खुशियों की पहचान करवाती हूं...

आंसुओ के समंदर में डुबो , हंसी की मोती दिलाती हूं...

दर्द की आवाज में , दुआओं भरे कलमें पढ़वाती हूं....

अरे मैं जिंदगी हूं पगली , तुझे जीने का सलीका सिखाती हूं...


छतीसगढ़, रायगढ़, श्वेता राटेरिया 

मध्यप्रदेश, खरगोन, कीर्ति जैन अनुराग जैन

 विषय - मुखौटा



आज हर इंसान ने पहना है मुखौटा 

कभी गम का मुखौटा

कभी झूठी खुशी का मुखौटा

आज सामने जो मित्र हैं कल वो कोन सा पहनेगा मुखौटा

अभी चुनावी मैदान में सभी नेता पहनेगे मुखौटा

अक्सर रिश्तेदार भी हमारी मदद के लिए पहन लेते है मुखौटा

आज हम पहचान भी नहीं सकते है उन लोगों को जिन्होंने पहने है मुखौटा

गुजारिश है मेरी सभी से 

अपने चेहरे से कब हटाओगे ये मुखौटा,

बहुत देख लिया सब को अब तो इंसानियत का पहन लो मुखौटा



पानी से जीवन


पानी से बने सब का जीवन

 सुंदर सपन सलोना ।

पेड़ पक्षी या हो मानव 

पानी को व्यर्थ ना बहाना ।

पानी की कीमत समझो 

एक एक बूंद है सोना ।

जितनी जरूरत उतना ले लो

 इसको व्यर्थ ना खोना ।

कोई मालामाल है 

कोई बूंद-बूंद को तरसे।

 एक कुआं इस गांव में 

वह भी गर्मी से सूखा।

 नल की लाइन ना आई 

त्राहि-त्राहि मची गांव में ।

वोट मांगने आए नेता 

जीत के वादे को भूला ।

पानी की कीमत के संग में 

इंसानों की कीमत समझो ।

तुम तो भर भर टंकी फेंको 

वह तो मांगे बस एक लोटा ।

पानी से बने सबका जीवन 

सुंदर सपन सलोना ।

पेड़ पक्षी या हो मानव

पानी को व्यर्थ ना बहाना।


मध्यप्रदेश, खरगोन, कीर्ति जैन अनुराग जैन


बिहार मुजफ्फरपुर, अर्चना सिंघानिया

 राष्ट्र चेतना


राष्ट्र हमारा गौरवशाली

वंदन इसको हम करते हैं,

इसके वैभव का गुणगान

हर वृक्ष के पत्ते भी करते हैं।


इसकी लाज बचाने को

हमारे वीर सतत सजग रहते हैं,

भारत माता की पावन मिट्टी को

शत्- शत् नमन हम करते हैं।


धन्य भाग्य हमारे जीवन के

इस अद्भुत धरती पर हम जन्में हैं,

अपनी इस जननी की खातिर हम

हर पल जान न्योछावर करते हैं।


बिहार मुजफ्फरपुर, अर्चना सिंघानिया 

९३०८८४१०७१

Friday, May 13, 2022

पुष्पा रूंगटा, चाकुलिया शाखा, झारखण्ड

 "गौ संरक्षण 


ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश ""कल"" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


पुष्पा रूंगटा

चाकुलिया शाखा

( झारखण्ड )"

Tuesday, May 3, 2022

पुष्पा रूंगटा चाकुलिया शाखा झारखण्ड

 "       गौ संरक्षण     

                       

ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि  पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश ""कल"" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


पुष्पा   रूंगटा

चाकुलिया शाखा

झारखण्ड 

सरोज अग्रवाल, बरगढ़, उड़ीसा

 *आखिर जीत गई मां की ममता*

 

हर बार मुश्किल है, पहाड़ बनकर सामने आई।

हर बार लगा मानो, हर सांस मेरी आखरी सांस है आई।

लेकिन हर बार, मां की ममता ही जीत पाई।


कभी बच्चों ने हैं, आंसू को छिपा मुझे खूब हंसाया।

तू कभी मैंने आंसू के हर घूंट पीकर साहस दिखाया।

लेकिन हर बार मां की ममता ही जीत पाई।


बच्चों के लिए ,जिंदगी से कुछ सांसे उधार मांगी।

हर सांस ,हर पल को अनमोल बनाया।

आखिर मौत को भी मात दे, मां की ममता ही जीत पाई।


*संघर्ष को विराम दे, वात्सल्य ने विजय पाई* 


सरोज अग्रवाल, बरगढ़, उड़ीसा 

7749013516"

रानी अग्रवाल, जमशेदपुर शाखा झारखंड प्रदेश

 "दर्द मजदूरों का


सिर पर बोझ पांव में छाले।

 इनके घर में रोटियों के लाले।।

 जुल्मों का बोझ भी संग में उठाते।

 मजदूरी के बाद भी आधा पेट भोजन पाते ।।

मजदूर थे ,मजदूर हैं ,मजदूर ही रह गए।

  मजबूरी के कारण हजारों सितम सह गए।।

बदल गया जमाना तुम भी बदल जाओ न।

 मजदूरों का समझो दर्द।

 ""औ"" हमदर्द बन जाओ न।।


रानी अग्रवाल जमशेदपुर शाखा झारखंड प्रदेश 9708557661

पुष्पा रूंगटा, चाकुलिया शाखा, झारखण्ड

 


"       गौ संरक्षण     

                       

ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि  पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश ""कल"" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


 पुष्पा   रूंगटा,  चाकुलिया शाखा, झारखण्ड

                 

प्रियंका चौधरी कटरस गढ़, झारखंड

 "अपगंता

मैं अपंग हूं

मेरी अपंगता पर मैं विवश हूं

पर मैं उड़ना चाहती 

चलना दौड़ना चाहती हूं।

पर मैं अपने पैरों से विवश हूं

समाज भी मुझे

 अपाहिजता का बोध करातीहैं

मैं आगे बढ़ना चाहती हूं 

पर दुनिया मुझे नकारा समझ कर

अंधकार में  धकेलना चाहती

मैं इस अंधकार से निकल कर 

स्वतंत्र जीवन जीना चाहती हूं

मुझे भीख नहीं

आगे बढ़ने की राह दिखाओ

मुझे सहारा नहीं

मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाओ

मैं स्वतंत्र होकर

दुनिया में घूमना चाहती हूं

मेरी अपंगता पर मुझे

विवशता का एहसास मत कराओ।।



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औरत

इस युग में कृष्ण का

    इन्तजार मत कर द्रौपदी

घोर कलयुग की है 21वीं सदी

    आसुं से नहीं अंगारों से

   अपनी आंखें  भरनी है ।

कृष्ण के भेष में

     दुस्शासन घात लगाएं हैं

जिनसे आशा है हमको

     वह ईमान बेच कर बैठे हैं।

शस्त्र उठालो द्रौपदी

     नहीं और कुछ कर सकती

मेहंदी से नहीं

    तलवारो से  श्रृंगार करो

तुमको ही देने होगे

     अपराधियो को सजा

इस युग में जीना हैं

    तो स्वालम्बी बनो ।


प्रियंका चौधरी कटरस गढ़, झारखंड