फूल बिछा दो राहों में बस,काँटे सारे तुम चुन लो।
नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा अब बुन लो।।
जन्म मिला जब मानव का है, कर्म करो मानव जैसे।
लिप्त सदा क्यों पशुता में हो,बने स्वयं दानव जैसे।।
छुपा मुखौटे के पीछे मुख, दुनिया को धोखा देते।
ले डूबेगा अहंकार ये,अभी नहीं यदि तुम चेते।।
बुरे भाव को बाहर रखकर,रूई के सम तुम धुन लो।
नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा अब बुन लो।।
जाति-पाँति से ऊपर उठ कर,अलख जगाओ प्रेम भरी।
भाईचारे के आगे तो,बैर-भावना सदा डरी।।
शांति अहिंसा के रक्षक बन,जीवन का उद्धार करो।
नई चेतना हृदयों में भर,ऊर्जा का संचार करो।।
अंतर्मन जो कहता तुमको,बात तनिक उसकी सुन लो।
नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा तुम बुन लो।।
फूल बिछा दो राहों में बस,काँटे सारे तुम चुन लो।
नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा अब बुन लो।।
-शकुन अग्रवाल, राउरकेला शाखा, उड़ीसा