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Saturday, May 28, 2022

उड़ीसा, बरगढ, सरोज अग्रवाल

 *आखिर जीत गई मां की ममता*

 

हर बार मुश्किल है, पहाड़ बनकर सामने आई।

हर बार लगा मानो, हर सांस मेरी आखरी सांस है आई।

लेकिन हर बार, मां की ममता ही जीत पाई।


कभी बच्चों ने हैं, आंसू को छिपा मुझे खूब हंसाया।

तू कभी मैंने आंसू के हर घूंट पीकर साहस दिखाया।

लेकिन हर बार मां की ममता ही जीत पाई।


बच्चों के लिए ,जिंदगी से कुछ सांसे उधार मांगी।

हर सांस ,हर पल को अनमोल बनाया।

आखिर मौत को भी मात दे, मां की ममता ही जीत पाई।


*संघर्ष को विराम दे, वात्सल्य ने विजय पाई* 


उड़ीसा, बरगढ, सरोज अग्रवाल