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Saturday, June 25, 2022

श्रीमती वंदना सुभाष कगलिवाल हिंगोली महाराष्ट्र

दर्द भरी जिंदगी l

 

आज के दौर की यह हालत है,

 अपने ही अपनों से पराए हो जाते हैंl

फिर भी हमें भरोसा है ये,

की आंधियों में भी  चिराग जल सकते हैं।

 

 टूटकर शीशा यह दिल बिखर जाएगा,

 कोई मेरा हमसफ़र या

 जिगर का टुकड़ा छीन जाएगा ।

 

हम बात क्या करें जिसे,

 हमारी कोई खबर ही ना हो ।

वह दुआ भी क्या करें,

 जिसका कोई असर ही ना हो।

 

 वह जिंदगी भी क्या अजीब हो गई है,

 जिसके जीने में कोई सबब ही ना हो ।

 

अब तो मुझसे बोझसी

 लगती है यह जिंदगी,

 फिर भी एक उम्मीद सी लगती है यह जिंदगी।

 

 बुझते हुए चिराग मेंभी

 उजाला नजर आता है,

 आज के दौर में भी कभी कहीं इंसानियत नजर आती है।

 

 क्या वह हमसे दूर है,

 या फिर हम ही रास्ता भटक गए हैं,

 कुछ समझ नहीं आता,

 यह दर्द भरी जिंदगी हमें ही बस रुलाती है।

 बस रुलाती है।

 

 हंसी तो बस मुस्कुराहट बन के रह जाती है।

 दिल रोता है ,आंसू टपक पड़ते हैं।

 

 खुश रहने की कोशिश करते हैं ।

पर ना जाने क्यों ,

यह दर्द भरी जिंदगी,

 हमें फिर रुला देती है।

 

 यादें रह जाती है, खुशियां बीत जाती है। बस मेरी वीरान सी जिंदगी,

 जीने की वजह ढूंढती है ।

 

क्या कहे  खुदसे हम, क्यों हमें जिंदगी दर्द भरी लगती है।

 

 खुशियों के किरण नजर नहीं आते, आंधियां हर वक्त हवा दे जाती।

 फिर चमकती जहां बिजली,

रोशन दुनिया हो जाती।

 बस रात और दिन की तरह ,

यह जिंदगी निकल जाती।

 

 बस बढ़ती ही जाती

 बस बढ़ती ही जाती ।

 

 यही तो है जिंदगी।

  यही तो है जिंदगी।

 

श्रीमती वंदना सुभाष कगलिवाल

शाखा हिंगोली

महाराष्ट्र