संस्कार एवं संस्कृति
भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृतियों का मूलाधार है।
संस्कृति से तात्पर्य प्राचीन काल से चले आ रहे संस्कारों से है।
मनुष्य द्वारा लौकिक-पारलौकिक विकास के लिए किया गया आचार-विचार ही संस्कृति है।
सनातन परंपरा के अनुरूप संस्कार की पद्धति ही संस्कृति है।
संस्कृति अनुभवजन्य ज्ञान पर और सभ्यता बुद्धिजन्य ज्ञान पर आधारित है।
सभ्यता से सामाजिक व आर्थिक जीवन प्रभावित होता है,
जबकि संस्कृति से आध्यात्मिक जीवन।
भारतीय संस्कृति सदैव अपने उदार गुणों के कारण पंथनिरपेक्ष रही है।
यह उदात्ता व्यवहार की प्रतीक है। इसमें सहिष्णुता कूट-कूट कर भरी है।
भारतीय संस्कृति प्रत्येक जाति व प्रत्येक व्यक्ति में सुसंस्कार उत्पन्न करती है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा है, 'यदि मनुष्य के पास संसार की प्रत्येक वस्तु है,
लेकिन मानवता व धर्म नहीं है, तो क्या लाभ?' भारतीय संस्कृति अध्यात्मवादी है,
देहात्मवादी नहीं। हमारी संस्कृति प्राचीनतम है। संस्कार अपने आप में अमूर्त होते हैं।
ये व्यक्ति के आचरण से झलकते हैं। चरित्र निर्माण में धर्म व संस्कार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सहिष्णुता, समन्वय की भावना, गौरवशाली इतिहास, संस्कार,
रीति-रिवाज और उच्च आदर्शो के कारण भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है।
विवेक और ज्ञान भारतीय संस्कृति की आत्म भावना है।
उमा डोकानिया,
सहरसा शाखा, बिहार प्रदेश, 9470291605