मां...
मैं कभी डरी नहीं,
क्योंकि आप हमेशा साथ हो ,
मेरे इस पंछी मन का ,
आप ही सारा आकाश हो|
जीवन की तपती राहों में ,
आप ठंडी ठंडी छांव हो,
दिल ने जिसे मांगा है हर पल,
आप मेरी वह चाह हो|
आंचल तेरे दामन का,
मेरे सर पर हमेशा बना रहे,
तू हमेशा संग मेरे रहना मां,
साथ भले कोई रहे ना रहे|
मां तो मां होती है ...
मां की कोई उपमा नहीं होती ..
चाहे मेरी मां हो..
या मेरी सासु मां|
*ओर एक छोटे से लम्हें को उठाने के लिए झुकने का मन उनका भी नहीं हुआ....*
*हम दोनों ने सोचा इतनी बड़ी जिंदगी में एक लम्हें के गिरने का क्या वज़ूद....*
*पर धीरे धीरे वो लम्हा फैलने लगा....*
*अपने आगोश में और भी कीमती क्षणों को समेटने लगा....*
*फिर हम दोनों ने खूब कोशिश की उस गिरे हुए एक लम्हें को समेटने की....*
*पर ये क्या उस इकलौते लम्हें ने तो कई छोटे छोटे लम्हों को जोड़कर अपना अलग वज़ूद बना लिया था....*
*जमीन पर गिरकर गहराइयों में अपनी जड़े फैला लिया था....*
*अब वो लम्हा लम्हा नहीं रह था खुद को एक किस्सा बना लिया था....*
*हम दोनों ने फिर लाख कोशिश पर उस लम्हें को समेट नही पाए....*
*फिर से हमारी जिंदगी में उस एक लम्हें को जोड़ नही पाए....*
*रहने को तो अब भी हम दोनों साथ है....*
*पर उस एक लम्हें के गिर जाने का हर पल हमें एहसाह है....*
*तो अपनीजिंदगी में कभी भी किसी लम्हें को छोटा मत समझना*
*गिरे हुए लमहों को समेटने के लिये उठना पड़े या फिर झुकना पड़े देर मत करना....*
*वरना होगा तो कुछ नहीं..... बस दो लोगों के बीच वो गिरा हुआ पल अपना वजूद बना जाएगा....*
*और क्या होता है जिंदगी से किसी एक क्षण का भी बिछड़ना आप को सीखा जाएगा....*
छतीसगढ़, बाकि मोगरा, सरिता पालीवाल