रो-रो कर कहती धरा, अब तो जग इन्सान।
मानवता ही है धर्म , नहीं बनो हैवान।
आँचल मेरा काटकर, क्यों बनते हैवान।
नदी ताल मिल कर करें ,सबसे एक सवाल।
मलिन हुआ पर्यावरण,जीना है बेहाल।
उन लोगो से पूछ लो, पानी की औकात ।
तरसें नित जो बूँद को , धूप और बरसात ।।
पिघल रहे हिमखंड हैं , देख सूर्य का ताप।
प्रर्यावरण उजाड़ कर , मानव करता पाप।
मलिन हुआ पर्यावरण,नहीं बचे अब नीड़ ।
पंछी सब बेनूर है , समझो उनकी पीड़ ।।
हरियाली चहुँ और हो, सुखद लगे सुखधाम।
पर्यावरण सुधारिये , धरा देत पैगाम।
मंजू शर्मा (जटनी उड़ीसा ) 9040175652