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Saturday, June 25, 2022

नीलकमल टाक महाराष्ट्र

 

हरा पीपल, घना बरगद ,सुनो तुलसी है मेरी मां,

मेरा आंचल, कभी दर्पण ,बनी बदली है मेरी मां।

 

 

मैं फल हूं मां की मन्नत का, जो दुर्गा मां ने बक्शा है,

मिटाऊं ज़ुल्म दुनियां से, सदा कहती है मेरी मां।

 

 

सदा धरती गगन से बेटी, पल-पल अपना रिश्ता रख,

यहीं इक बात शिद्दत से, मुझे कहती है मेरी मां।

 

बहोत ढूंढा ,बहोत देखा, बहोत जांचा, बहोत परखा,

नहीं दुनियां में कोई शै, तेरे जैसी है मेरी मां।

 

नहीं है पास लेकिन रूह में ,मेरी समाई है,

मेरे भीतर सभी कहते हैं, के दिखती है मेरी मां।

 

 तेरा सर गोद में रख - रख के, आ तेरी बलाए लूं,

"प्रीत" अन्दर तेरी ममता, उभर आई है मेरी मां।

                     

आपकी बेटी

                       

नीलकमल टाक