मॉं
याद नहीं मॉं जब पहली बार दुनिया में आयी
दोनों हथेलियों के पलने में पलती चली गई।
स्नेह से जब तुम थामती थी मेरा हाथ
लगता जैसे सारा जहॉं है मेरे साथ।
तुझे देखते देखते भागने लगा डर
करने लगी धमाचौकड़ी होकर नीडर।
साथ में रहता था थोड़ा पढ़ाई का टेंशन
और मॉं तुम्हारा स्नेह भरा अनुशासन ।
लगता था तब
तो वह बड़ा ही आतंकी
करनी पड़तीं थी रात-दिन पढ़ाई की नौटंकी ।
धीरे-धीरे चढ़ती गई सीढ़ी दर सीढ़ी
तेरी छाया में तैयार होने लगी नई पीढ़ी।
हम भाई बहन देखने लगे नये नये सपने
व्यस्त रहने लगे,खोये रहने लगे
काम में अपने ।
यह था मेरे जीवन का अमूल्य कालखंड
जिसमें था तेरी ममता का झरना अखंड।
भूल ना पाएँगे मॉं उन स्वर्णिम पलों को
कभी हंसना कभी रोनाभाई बहनों कीं तकरारों को।
कहते है नींव मज़बूत हो तो इमारत बुलंद होती
हैं
संघर्षों में तपकर मिट्टी सोना और कुंदन होती
है ।
मॉं तुमने मुझे वही मज़बूत नींव दी है
आसमान में उड़ान भरने की उम्मीद दी है।
ऋणी हूँ ,हमेशा ऋण में रहना चाहती हूँ
तू सदा स्वस्थ रहे, मस्त रहे यही कामना करती हूँ ।।
दीप्ति अग्रवाल