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Wednesday, April 27, 2022

मंजु बंसल, जोरहाट,असम

 "शीर्षक- गुरूर 


समय का पहिया ऐसे चलता

इंसान को सबक सिखाता। 

गुरूर करे तू किसका बंदे 

मिट्टी का तन मिट्टी हो जाता।


दो दिन का मेला है दुनिया 

आकर सबसे मिलते रहना।

जाते समय कोई न सुनता

अनंत यात्रा पर चल देता।


कहीं देखा गुरूर दौलत का

तो कहीं रूप-सौंदर्य का

किसी को गुरूर अपने पद 

तो कहीं गुरूर सत्ता का।


रावण का भी अहं टूट गया

राम के हाथों मोक्ष पा गया। 

कंस के बल का भी गुरूर 

पल में हुआ चकनाचूर।


ऐसे ही कितने बलशाली 

क्षण में धराशायी हुए। 

स्व के अहंकार में फँसकर

इस वसुधा पर फ़ना हुए। 


भला किसी का कर पाओ

तो भी गुरूर कभी न करना।

परोपकार में जीवन जी कर

सत्कर्मों से झोली भरना।


*एक किन्नर के मनोभाव*


माँ खुद से अलग किया क्यों मुझको

बता दें मेरा क्या था दोष

विधाता की सृष्टि हूँ मैं भी 

मुझ पर क्यों उतारा रोष।

नौ माह तक कोख में रखा

प्रसव पीड़ा नहीं भोगी होगी

आँचल जब भींगा होगा

याद मेरी तुझे आई होगी  ।

सुनसान अंधेरी रात में

छोड़ दिया ग़ैरों के बीच

समाज ने भी दुत्कारा मुझे

पल रही बेगानों के बीच।

नर या मादा नहीं तो क्या

इंसान बनकर तो आया हूँ

संवेदनशील हृदय है मेरा

फिर भी तिरस्कार मैं सहता हूँ ।

लोगों की ख़ुशी में शरीक होकर

आशीषों से झोली भर देते

दिल का हमारा हाल न जाने

हर हाल में खुश हम रहते ।

हर पल अपने वजूद की तलाश में 

दर-बदर हम भटकते हैं 

किन्नर कहलाते , प्रताड़ित होते

स्वयं से ही संघर्ष हम करते ।

अन्तस् जार-जार रोता है

हमारे प्रति होता क्यूँ कटु व्यवहार है

समाज की झूठी आन-शान में

हर पल दिल पर होता प्रहार है ।

जज़्बात भी हमारे सिसकते हैं

आशायें भी दम तोड़ देतीं

आम जीवन की चाह

हर पल अंगड़ाई है लेती ।

अधूरा ही रहता हर ख़्वाब

अभिशप्त होता हमारा जीवन

अस्तित्व माना मेरा कुछ भी नहीं

फिर भी जहाँ में मुस्कुराते हम ।

बोलो माँ! क्यों होता है ऐसा

क्यों हमें नकारा समझा जाता

शारीरिक विकलांगता देन प्रभु की

हमें ही क्यों निराश्रित रहना पड़ता ।।


मंजु बंसल “ मुक्ता मधुश्री “

जोरहाट