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Saturday, April 30, 2022

मंजुला भूतड़ा इन्दौर, मध्यप्रदेश,

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*जय जय श्री राम हो*


राम मंदिर का सपना,

हुआ है साकार।

मिल गया सबको,

मनचाहा  उपहार।


जागे हैं जब शासक,

तब इतिहास हिला।

बहुत प्रयासों के बाद,

रामलला का द्वार खुला। 


जिनका जीवन महान,

मर्यादा का विधान।

त्यागपूर्ण जीवन,

देते सबको अधिकार समान।


पटाक्षेप हुआ है,

वर्षों की बहस का।

आया शुभ मुहूर्त,

निर्माण शुभारंभ का।


कितनी तारीखें तय की,

रामलला को न्याय की।

रामलला तारीख तय करेंगे,

तो होगी मुश्किल सबकी।


हैं हम सौभाग्यशाली,

बने हैं प्रत्यक्षदर्शी।

सारे भक्तों में आल्हाद, 

छाई है अनुपम खुशी।


वैसे न्यायालय ने दी है,

 जिन्हें अनुमति।

वाकई में छबि तो उनकी,

 हर मन में बसी।


रामजी स्वयं एक मंत्र हैं, स्वतंत्र हैं,

 समझ सकें तो वे स्वयं लोकतंत्र हैं।

जिनकी अदालत में होता सबका

न्याय,

किसी के पास है कहां राम का पर्याय।


राम जी का देश है ,

तो रामजी का काम हो।

सब मिलकर हम यही कहें,

जय जय श्री राम हो।


जय जय श्री राम हो।।



आए हम जिस दिन से

मृत्यु तो तय है ही,
फिर करें न तैयारी!
जब चले ही जाएंगे
कोशिश करें ,
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

छोड़ जाएं अपनी आँखें
किसी और की रोशनी के लिए,
समय रहते कर लें प्रण
देहदान अंगदान का भी
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

लिवरचर्म,किडनी
मिले किसी को जिन्दगी।
हम तो जाएंगे ही
अच्छा हो किसी के काम आ जाएं
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

पहली बारिश के बाद बची रही
सौंधी सुगन्ध की तरह ,
मानव का मानव के प्रति
स्नेह समर्पण के लिए,
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

परिजन महसूस करेंगे
हमारे होने का एहसास,
जाने के बाद कोई आस्तित्व नहीं
थोड़ा-थोड़ा दूसरों में बस जाएं,
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं।

सोच लें ,वाकई हम चले जाएंगे ।
किसी  की ज्योति में,
किसी की धड़कन में,
किसी के जीवन स्पंदन मेें
हमारा भी अंश होगा ।
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।


फूलों से नाजुक हैं रिश्ते


सच, फूलों से नाजुक हैं रिश्ते,

करनी होती है बहुत देखभाल।

बनानी होती है  नई नम भूमि,

अपनेपन की मिट्टी,

देनी होती है स्नेह की खाद।


लू के थपेड़ों जैसे

विचारों के उद्वेग से,

सम्हाल करनी होती है।

करनी पड़ती है रक्षा,

कहीं मुरझा न जाएं रिश्ते।


महामारी ने सिखा दिया,

रिश्तों का दर्द समझा दिया।

करीब होकर भी करीब न हो सके,

उमड़ते भावों ने बतला दिया।


फिर भी समय समय पर,

लगाते रहें हैं, नई पौध भी,

त्यौहारों अवसरों पर

बनाए रखते हैं मेलजोल।


प्यार से करते हैं साल-सम्हाल,

तभी तो आती है खुशबू,

और गूंजता है घर आँगन।

बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते,

फूलों की तरह।


 *मंजुला भूतड़ा*

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