"वो मासूम कचरे वाला बच्चा"
चाय की प्याली लेकर,
जब भी बरामदे में बैठती,
दिख जाता वो बच्चा,
काँधे पे कचरे का थैला उठाए,
नजरे उसकी इधर -उधर डोलती सी,
कहीं कुछ मिलने की खुशी ,
साफ झलकती चेहरे पर।
कुछ खाने का मिल जाता तो
एक स्मित सी मुस्कुराहट चेहरे पर दिख जाती,
कहीं कचरे मे कोई किताब
मिल जाती उसे गर,
उलट पलट कर देखता उसे ,
मानो कोशिश कर रहा हो समझने की,
चमक आ जाती आँखो में उसके
शायद थी पढ़ने की ललक उसमें,
उसे देख सोच में पड जाती
क्या यहीं भविष्य
है इनका?
पुस्तकों की जगह कचरे के थैले
उठाए घूम रहें है,
खेलने की जगह घर का बोझ उठाए
घूम रहे हैं,
कुछ दरक सा जाता था मन में ,
ख्याल आया क्यूँ ना पढाऊ उसे,
आवाज दी उसे ,पर आवाज
दब गयी शोर-शराबे मे,
सोचा दुबारा दिखेगा तो ,
बात करुगीं उस से,
कुछ महिनों तक न दिखा वो बच्चा,
पता चला कचरा बिनते -बिनते किसी गाडी से,
टकरा गया वो बच्चा।"
सिया राजूका, रायनगर, उड़ीसा
7008797783