समय (मौलिक)
समय
स-वह और
मय-तल्लीन होना
समय बहता जा रहा है
उम्र निकल गई मेरी
ईश्वर में तल्लीन
कहां हो पायी?।
समय को खाती रही
कीमत करना भुल गयी
समय कहता है
तेरे साथ ही तो हूं
बुढ़ापा आया
मोह माया न छोड़ा
प्रेम की गली
घुमती फिरु
'स'को पहचाना नहीं।
समय नहीं है
मत कहना कभी
अंधेरा आता (अंधड़)
धूल का अंबार
वर्षा आती
प्रेम की वर्षा हुई
अज्ञात साथी
प्यार करता है
ऊपर बैठा
मैं न कर पायी
वह सबके साथ है।
परिणाम मेरा
आंखें हैं मेरी
दिखता नहीं हैं
खुलती नहीं
होती अगर
दिव्य चक्षु
कहलाती।
बात चली समय की
इसकी बात
उसकी बातें
चर्चा होती तेरी मेरी
समय कब आएगा?
खुद की कब
पहचान होगी
समय से फेंका
बीज अंकुरित होता
तरस नहीं है मुझ में
स-मय हो जाऊं
प्रभु के संग में
मेरे दिन जा रहा है
समय जा रहा है
उम्र निकलती
जा रही है
समय जा कहां रहा है?
देख न पायी कभी।।
अतुकान्त
भीतर का रस
अनुभूति देता है
रस ब्रह्म है
हैं यह अनोखा
रस से परिपूर्ण
रसीला है
प्रकृति के
कण-कण में
रस का ढेला है
फल , फूल
अनाज निहित
होता है।
रसहीन बनकर
सूखे पत्ते से
न बन मानव तू
प्रेम रस की भक्ति
तरावट लाती
रस की सरिता
बहा दे मानव
रसीला बन जा तू।
जग सारा है रसमय
रस का श्रोत बहता है
रस के सागर
डूबकी लगाओ
रसीला बन जा
पत्ते पत्ते में रस
टपकता रहता है
सृष्टि के कण-कण में
रस ही रस है
तुझ में ,मुझ में
रस ही रस है।।
बदल गया इंसान
क्षणिका....
इंसान जब जब
स्वंय को जानने
की कोशिश करता
कहते इंसान बदल गया
क्यों !आखिर क्यों?
----ममता गिनोङिया सजग मुग्धा