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Thursday, June 23, 2022

नेहा अविनाश अग्रवाल, चांपा, छत्तीसगढ

 आओ सखियों मिलकर 

एकजुट हो हम बढ़ाए कदम, कुछ अच्छा कार्य करे क्योंकि मिला हैं हमें मानव जन्म।

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जबसे जन्म हुआ तबसे ही, हम खेल रहे प्रकृति की गोद में 🧚 अब जब बारी आई इसके देखभाल की तो, सब पड़ गए किस सोंच में।

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जब नींद लगी तो ममतामयी 🌿🌿

धरती मां ने अपने हरे भरे गोद में सुला लिया, भूख लगी तो धरा से उगे अन्न और फल से तृप्ति पा लिया।

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जब ठंड लगी तो सूरज🌄🌤️ 

की किरणों से गर्मी हमने पाई, गर्मी में पसीने की बूंद हटाने फिर पेड़ों ने शीतल हवा चलाई।

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जब प्यास लगी तो 💧💧

गंगा सी कलकल बहती नदियों ने प्यास बुझाई, हुआ झूम कर नाचने का मन तो कोयल ने कुहू कुहू आवाज लगाई।

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क्या कुछ नही देती यह💚💚💚💚 

धरती मां,क्या कभी क्षण भर के लिए भी सोंचा हमने। हम तो बस इसी हिसाब ने लगे हुए की आज कितनी कमाई की हमने।

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फिर कल कहां घूमने और पिकनिक मनाने है जाना, कौन सी मूवी देखनी हैं और किस रेस्टोरेंट में जाकर है खाना , खाना।

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कभी क्षण भर रुक कर सोंचिए, कि क्या हो, प्रकृति भी बन जाए अगर स्वार्थी, अरे भाई साहब! यही प्रकृति ही तो साथ देती है, जब आए तब पालना बनकर और जाते वक्त बनती है अर्थी।

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क्या नही हमारा कोई कर्तव्य, कि करें हम इसकी देखभाल, यह तो निःस्वार्थ देते आई हैं सदियों से, और देती रहेगी सालो साल।

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लेने वाले से देने वाला कहलाता है हरदम महान, फिर अगर आपने नही चुकाया प्रकृति का कर्ज, तो बेकार है आपकी ये, धन दौलत और झूठी शान।

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✏️नेहा अविनाश अग्रवाल, चांपा, छत्तीसगढ 🙏