र्मैं धरती हूँ
मैं धरती हूँ, सुन्दर सुशीला,
शस्य-श्यामला, स्वर्ण शरीरा,
मृदु भाषी और पूर्ण यौवना,
देख मुझे है अम्बर का भी जी ललचाता।।
मेरे आँचल में लहराए,
खेले डोले ये गेंहू की बाली,
जिनकी स्वर्णिम आभा से,
मैं बन जाती वैभवशाली।।
मेरी इस सम्पन्नता को किंतु ,
आज लगी ऐसी नजर,
कट रहें मेरे पेड़- पौधे ,
हो रही मेरी मिट्टी बंजर और
खो रहा सौंदर्य मेरा,
देख जिसे लुभाता था अम्बर का भी मन।।
समय रहते बचाना मुझको,
मानव तुम्हारी है जिम्मेवारी ,
ऐसे कदम उठाओ के मैं,
फिर से बन जाउँ वैभवशाली।।
पेड़ की पीड़*
क्यों न समझ पाते तुम
पीड़ हम पेड़ो की,
सुन क्यों न पाते तुम
कराह हमारे दिल की ।।
कहो ना--
क्या सच मे नही सुनी तुमने
मेरी वह करुण पुकार,
झेल रहा था जब मै
उस कुल्हाड़ी की मार,
और
कह रहा था तुमसे यही बारम्बार-
ना काटो ए मानव, मुझे
दर्द बड़ा ही होता है, मुझे
दर्द बड़ा ही होता है ।।
क्या बिगाड़ा तुम्हारा मैंने
दर्द कहाँ मैंने दिया तुम्हें,
फिर भी क्यों ए मानव तुमने
दर्द ही दर्द दिया मुझे ।
मैने मांगा तुमसे ना कुछ भी कभी
दे रहा था मे तो तुम्हें कुछ न कुछ फिरभी ।
ए मानव निर्दयी -
क्यों भूल गया तू इतनी जल्दी
मैने ही तो दिया तुम्हें फल ,फूल, हरियाली
मुझसे ही तो है धरा पर
छाव, हवा और पानी
समझ न पाया दोष मेरा,
अशमंजस में हूं बड़ा,
बार बार दोहराऊ यही-
ना काटो ए मानव मुझे
दर्द बड़ा ही होता है,
मुझे दर्द बड़ा ही होता है,
मुझे दर्द बड़ा ही होता है ।
पिंकी बजाज
सरुपथार,असम"