"अपगंता
मैं अपंग हूं
मेरी अपंगता पर मैं विवश हूं
पर मैं उड़ना चाहती
चलना दौड़ना चाहती हूं।
पर मैं अपने पैरों से विवश हूं
समाज भी मुझे
अपाहिजता का बोध करातीहैं
मैं आगे बढ़ना चाहती हूं
पर दुनिया मुझे नकारा समझ कर
अंधकार में धकेलना चाहती
मैं इस अंधकार से निकल कर
स्वतंत्र जीवन जीना चाहती हूं
मुझे भीख नहीं
आगे बढ़ने की राह दिखाओ
मुझे सहारा नहीं
मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाओ
मैं स्वतंत्र होकर
दुनिया में घूमना चाहती हूं
मेरी अपंगता पर मुझे
विवशता का एहसास मत कराओ।।
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औरत
इस युग में कृष्ण का
इन्तजार मत कर द्रौपदी
घोर कलयुग की है 21वीं सदी
आसुं से नहीं अंगारों से
अपनी आंखें भरनी है ।
कृष्ण के भेष में
दुस्शासन घात लगाएं हैं
जिनसे आशा है हमको
वह ईमान बेच कर बैठे हैं।
शस्त्र उठालो द्रौपदी
नहीं और कुछ कर सकती
मेहंदी से नहीं
तलवारो से श्रृंगार करो
तुमको ही देने होगे
अपराधियो को सजा
इस युग में जीना हैं
तो स्वालम्बी बनो ।