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Thursday, June 23, 2022

सुरुचि चमरिया शिलोंग मेघालय

कहांँ लौट कर आता है दोबारा

वो आलय वो चौबारा

स्वप्निल बना वो आंँचल

स्वप्निल लगती अब हवा वो चंचल

वो पहचानी सी राहें अब भी

बुलाती है फैला अपनी बाहें

तुम्हारी वो स्नेहिल छाया

दामन छोड़ा तेरा

पर प्यार भरा वो रंग

गहरा ही पाया

तुम दूर तो हो पर उससे

कई ज्यादा पास तुम्हें पाया

कानों में लरजती आज भी

लाडो कह बुलाती वो आवाज़

मांँ क्यों ना करूं मैं 

कहो ना तुझ पर नाज

तेरी ही दूआओं का तो

सर पे पहना है ताज।


स्वर्गिक कल्पनाओं की निश्वास भरी सांँसे


धूल भरी तेज हवाओं से स्वयं को बचाती

निष्कपट निश्चल मन से आशाओं को सजाती

कठिनाइयों को झेलती स्वतंत्रता की अनछुई चाह

स्वयं की पहचान को तलाशती आंँखे

सरल भाव से मानवता  की अभिलाषा में

अपनी मर्यादाओं में रह खुद को बचाती

अनगिनत और असामान्य क्षमताओं के साथ

दृढ़ता से आचरण को सिद्ध करती

हर बाधाओं को टाल प्रेम को बांटती

असीमित भावनाओं को उकेरती

अनंत जिज्ञासाओं में भी धीमे से

अपनी सौम्यता से खुद में सिमटती

फिर भी सदा नारी ही क्यों बिखरती।


सुरुचि चमरिया शिलोंग मेघालय