कहांँ लौट कर आता है दोबारा
वो आलय वो चौबारा
स्वप्निल बना वो आंँचल
स्वप्निल लगती अब हवा वो चंचल
वो पहचानी सी राहें अब भी
बुलाती है फैला अपनी बाहें
तुम्हारी वो स्नेहिल छाया
दामन छोड़ा तेरा
पर प्यार भरा वो रंग
गहरा ही पाया
तुम दूर तो हो पर उससे
कई ज्यादा पास तुम्हें पाया
कानों में लरजती आज भी
लाडो कह बुलाती वो आवाज़
मांँ क्यों ना करूं मैं
कहो ना तुझ पर नाज
तेरी ही दूआओं का तो
सर पे पहना है ताज।
स्वर्गिक कल्पनाओं की निश्वास भरी सांँसे
धूल भरी तेज हवाओं से स्वयं को बचाती
निष्कपट निश्चल मन से आशाओं को सजाती
कठिनाइयों को झेलती स्वतंत्रता की अनछुई चाह
स्वयं की पहचान को तलाशती आंँखे
सरल भाव से मानवता की अभिलाषा में
अपनी मर्यादाओं में रह खुद को बचाती
अनगिनत और असामान्य क्षमताओं के साथ
दृढ़ता से आचरण को सिद्ध करती
हर बाधाओं को टाल प्रेम को बांटती
असीमित भावनाओं को उकेरती
अनंत जिज्ञासाओं में भी धीमे से
अपनी सौम्यता से खुद में सिमटती
फिर भी सदा नारी ही क्यों बिखरती।
सुरुचि चमरिया शिलोंग मेघालय