एज्युकेशन
का जमाना💐
एज्युकेशन
का है ये जमाना
विद्या
से नही दामन छुड़ाना
भारत देश
के तुम ही भविष्य हो
सोच के
कदम उठाना
पढ़ा लिखा
इंसान जगत में
एक दिन
मंजिल पाए
अनपढ़
भटके डगर डगर पे
पग पग
ठोकर खाए
पढ़ाई से
जीवन बनाना है
एज्युकेशन
का है जमाना
विद्या
जीवन के अंधियारे में
लाती है
उजियाला
राह
दिखाती है ये सबको
देखे
देखने वाला
न हाथों
से मौका गवाना है
एज्युकेशन
का है जमाना
कल के
नेता तुम ही बनोगे
तुम ही बनोगे
जवाहर
तुममे से
कोई गांधी बनेगा
कोई लाल
बहादुर
वतन को
लहू से सजाना है
एज्युकेशन
का है ये जमाना
विद्या
से नही दामन छुड़ाना
ऊषा जोशी
माँ
चामुंडा
देवास
मध्यप्रदेश
बहू---बहू----!!
बहू तुम
लक्ष्मी बनकर आना बदले में सम्मान व प्यार है पाना।
बहू
तुम--- लक्ष्मी--- बनकर आना
अपनें से
बड़ों को तुम देना सम्मान,
छोटों को
स्नेह व प्यार लुटाना।
बहू
तुम.... लक्ष्मी... बनकर आना...!
अपनी
करूणा व प्यार से, घर को
स्वर्ग बनाना,
कभी तुम
करूणा की देवी बन जाना ।
बहू
तुम.... लक्ष्मी....बनकर आना .. ...
बदले में..
सम्मान है पाना
समय कभी
विपरीत आ जाए
तो कभी
ना घबराना,
यदि
जरुरत पड़े तो तुम दुर्गा, काली भी
बन जाना ।
बहू
तुम.. लक्ष्मी.... बनकर आना
कहते हैं
बेटी माँ जाई है,
बहू
पराये घर से आई है, बेटी को
तो इक दिन है जाना,
उसे
दुनियाँ की रित है निभाना ।
बहू ही
है अपनी,
बेटी तो
है पराई ...
यह बात
तुम्हें समझ क्यूँ न आई ।
बहू
तुम..... लक्ष्मी---बनकर आना।
बेटे
कहते हैं माता पिता मेरे है,
मै
करूँगा उनकी सेवा,
मगर बेटे
कहते ही रह जाते है,
कर जाती
है बहू मात पिता की सेवा ।
बहु
तुम... लक्ष्मी... .बनकर आना ,
बदले में
.. सम्मान..... है पाना
बेटियाँ
हमारा मान है तो बेटा बहू भी तो हमारा अभिमान है,
जहाँ
होती है बहु मुस्कुराती, वहीं
सारी खुशियाँ दौड़ी चली आती ।
बहू
तुम.... लक्ष्मी.. बनकर आना
बहु तुम
सदा मुस्कुराना, कभी ना
रुठ जाना,
यदि तुम
रूठ गई तो,
हम ना जी
पाएंगे,
तुम्हें
हम प्यार के सिवा क्या दे पाएंगे ।
बहू
तुम...... लक्ष्मी ..बनकर आना,
बदले
में.सम्मान.. ....है पाना
हम
तुम्हारे है, तुम
हमारी हो, यही सोच
को है अपनाना ..
कभी यह
बात भूल न जाना बहु तुम... लक्ष्मी. ...बनकर आना..
तुमसे ही
है हमारा सपना, तुम उसे
अपनाना,
उसे पुरा
कर जाना ।
बहू
तुम.... लक्ष्मी....बनकर आना
तुम जो
मुस्कुराओगी,
बगियाँ
सारी खिल जाएगी, घर में
बहार आएगी,
इन
बहारों में तुम घुलमिल जाना,
अपनें
रंगों को बिखराना ।।
बहू तुम
लक्ष्मी बनकर आना, बदले में
सम्मान व प्यार है पाना ,
बहू तुम
घर को स्वर्ग है बनाना ।
(मेरी ओर से सभी बहूओं और
बेटियों को समर्पित )
संध्या
प्रकाश पेशकार
देवास
आज पितृ दिवस के अवसर पर
सभी बहनें अपनी स्वरचित रचनाएं पढ़ रही हैं, लेकिन मेरे मन की व्यथा कुछ अलग है। आज से 20 वर्ष पूर्व मैंने अपने डैडी
को एक कार एक्सीडेंट में खो दिया था । मेरी रचना उनके अभाव में मेरे जीवन में जो
रिक्तता आई है, उस पर
आधारित है ।
आपकी कमी
खलती है मुझे,
यह खालीपन बहुत सताता है ।
बस यूं
ही आपकी
यादें दिल में समेटे,
यह वक्त गुजरता जाता है।।
समझ में
आता है क्या फर्ज है ??
और क्या जिम्मेदारी है??
खुद से ज्यादा आप अपने,
परिवार की खुशियां प्यारी
है।
दौड़ रहे हैं हम सब यहां,
पकड़ने को जिंदगी की रफ्तार
।
अपना आज
हम जी नहीं पाते ,
और करते
कल की तैयारी हैं।
आपके दूर
जाने का मुझे,
हर पल एहसास होता है।
आपको खो दिया है,
नहीं
विश्वास होता है ।
हर बात
में आपका साथ,
अब याद बहुत आता है।
हर बीता लम्हा अब तो बस,
आंखों में आंसू लाता है।।
आपकी सीख
और समझाईश का मूल मंत्र ,
जीने का
सहारा देता जाता है ।
आपके
बिना जीना भी क्या जीना है??
बस यह वक्त गुजरता जाता है
।
बस यह
वक्त गुजरता जाता है।।
मनीषा लाठी
सोनकच्छ
मध्यप्रदेश
समय (मौलिक)
समय
स-वह और
मय-तल्लीन
होना
समय बहता
जा रहा है
उम्र
निकल गई मेरी
ईश्वर
में तल्लीन
कहां हो
पायी?।
समय को खाती रही
कीमत
करना भुल गयी
समय कहता
है
तेरे साथ
ही तो हूं
बुढ़ापा
आया
मोह माया
न छोड़ा
प्रेम की
गली
घुमती
फिरु
'स'को पहचाना नहीं।
समय नहीं
है
मत कहना
कभी
अंधेरा
आता (अंधड़)
धूल का
अंबार
वर्षा
आती
प्रेम की
वर्षा हुई
अज्ञात
साथी
प्यार
करता है
ऊपर बैठा
मैं न कर
पायी
वह सबके
साथ है।
परिणाम
मेरा
आंखें
हैं मेरी
दिखता
नहीं हैं
खुलती
नहीं
होती अगर
दिव्य
चक्षु
कहलाती।
बात चली
समय की
इसकी बात
उसकी
बातें
चर्चा
होती तेरी मेरी
समय कब
आएगा?
खुद की
कब
पहचान
होगी
समय से
फेंका
बीज
अंकुरित होता
तरस नहीं
है मुझ में
स-मय हो
जाऊं
प्रभु के
संग में
मेरे दिन
जा रहा है
समय जा
रहा है
उम्र
निकलती
जा रही
है
समय जा
कहां रहा है?
देख न
पायी कभी।।
अतुकान्त
भीतर का
रस
अनुभूति
देता है
रस
ब्रह्म है
हैं यह
अनोखा
रस से
परिपूर्ण
रसीला है
प्रकृति
के
कण-कण में
रस का
ढेला है
फल , फूल
अनाज
निहित
होता है।
रसहीन
बनकर
सूखे
पत्ते से
न बन
मानव तू
प्रेम रस
की भक्ति
तरावट
लाती
रस की
सरिता
बहा दे
मानव
रसीला बन
जा तू।
जग सारा
है रसमय
रस का
श्रोत बहता है
रस के
सागर
डूबकी
लगाओ
रसीला बन
जा
पत्ते
पत्ते में रस
टपकता
रहता है
सृष्टि
के कण-कण में
रस ही रस
है
तुझ में ,मुझ में
रस ही रस
है।।
बदल गया इंसान
क्षणिका....
इंसान जब
जब
स्वंय को
जानने
की कोशिश
करता
कहते
इंसान बदल गया
क्यों
!आखिर क्यों?
----ममता गिनोङिया सजग मुग्धा
बहुत कुछ बदल रहा है
बहुत कुछ
बदलना
अभी बाकी
है।
उड़ना तो
हमने सीख लिया
पर आसमाॉ
छूना
अभी बाकी
है।
रंग, जो फीके पड़ गए थे
जिंदगी
के
उन्हें
चमकाना
अभी बाकी
है।
हसरतें, जो मन की रह गई थी अधूरी
उन्हें
पूरी करना
अभी बाकी
है।
सबको खुश
रखना तो सीख लिया
खुद को
खुश करना
अभी बाकी
है।
बहुत कुछ
सुन लिया
अब थोड़ा
कहना
अभी बाकी
है।
आधी
जिंदगी तो गुजर गई
पर खुल
कर जीना
अभी बाकी
है।
मां ,पत्नी ,बहन ,बेटी
तो बन गई
पर खुद
की पहचान
अभी बाकी
है।।
मनीषा
अग्रवाल
सिवनी
मालवा
नर्मदा
पुरम मध्य प्रदेश
जबसे मैंने
आँखें खोली माँ तूने ही मुझे सवारा सजाया
तेरे
स्नेह के आँचल
ने हर ख़तरे से मुझे बचाया
जीवन के
हर ज़हर को पल्लू से छानकर अमृत बनाया
कहने को
तो माँ हो मेरी लेकिन पहला दोस्त तुम्हें बनाया
रिश्तों
की हर गठरी को
सहेजना तुमने सिखलाया
सही है
ये, ग़लत क्या है ? भेद तुमने बतलाया
पढ़ाई
में बनी मेरी टीचर कभी पापा का कुर्ता पहन डराया
जब भी
उदास हो गयी मैं तुमने ही मुझे बहलाया
2 क़दम पीछे रहकर मेरे कंधों
को ढाढ़स बँधाया
संबल बनी
ढाल बनी जब जब मैंने ख़ुद को अकेला पाया
खेल खेल
में जीवन का हर पाठ मुझे पढ़ाया
हिम्मत
से लड़ सकूँ दुनियाँ से इस क़ाबिल मुझे बनाया
ममता
माहेश्वरी
गुना
शाखा मध्य प्रदेश
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
मध्यप्रदेश प्रान्त
मंजुला भूतड़ा : प्रांतीय साहित्य प्रमुख
एज्युकेशन का जमाना💐
एज्युकेशन
का है ये जमाना
विद्या
से नही दामन छुड़ाना
भारत देश
के तुम ही भविष्य हो
सोच के
कदम उठाना
पढ़ा लिखा
इंसान जगत में
एक दिन मंजिल
पाए
अनपढ़
भटके डगर डगर पे
पग पग
ठोकर खाए
पढ़ाई से
जीवन बनाना है
एज्युकेशन
का है जमाना
विद्या
जीवन के अंधियारे में
लाती है
उजियाला
राह
दिखाती है ये सबको
देखे
देखने वाला
न हाथों
से मौका गवाना है
एज्युकेशन
का है जमाना
कल के
नेता तुम ही बनोगे
तुम ही बनोगे
जवाहर
तुममे से
कोई गांधी बनेगा
कोई लाल
बहादुर
वतन को
लहू से सजाना है
एज्युकेशन
का है ये जमाना
विद्या
से नही दामन छुड़ाना
ऊषा जोशी, माँ चामुंडा , देवास मध्यप्रदेश
"बहू---बहू----!!"
बहू तुम
लक्ष्मी बनकर आना बदले में सम्मान व प्यार है पाना।
बहू
तुम--- लक्ष्मी--- बनकर आना
अपनें से
बड़ों को तुम देना सम्मान,
छोटों को
स्नेह व प्यार लुटाना।
बहू
तुम.... लक्ष्मी... बनकर आना...!
अपनी
करूणा व प्यार से, घर को
स्वर्ग बनाना,
कभी तुम
करूणा की देवी बन जाना ।
बहू
तुम.... लक्ष्मी....बनकर आना .. ...
बदले में..
सम्मान है पाना
समय कभी
विपरीत आ जाए
तो कभी
ना घबराना,
यदि
जरुरत पड़े तो तुम दुर्गा, काली भी
बन जाना ।
बहू
तुम.. लक्ष्मी.... बनकर आना
कहते हैं
बेटी माँ जाई है,
बहू
पराये घर से आई है, बेटी को
तो इक दिन है जाना,
उसे
दुनियाँ की रित है निभाना ।
बहू ही
है अपनी,
बेटी तो
है पराई ...
यह बात
तुम्हें समझ क्यूँ न आई ।
बहू
तुम..... लक्ष्मी---बनकर आना।
बेटे
कहते हैं माता पिता मेरे है,
मै
करूँगा उनकी सेवा,
मगर बेटे
कहते ही रह जाते है,
कर जाती
है बहू मात पिता की सेवा ।
बहु
तुम... लक्ष्मी... .बनकर आना ,
बदले में
.. सम्मान..... है पाना
बेटियाँ
हमारा मान है तो बेटा बहू भी तो हमारा अभिमान है,
जहाँ
होती है बहु मुस्कुराती, वहीं
सारी खुशियाँ दौड़ी चली आती ।
बहू
तुम.... लक्ष्मी.. बनकर आना
बहु तुम
सदा मुस्कुराना, कभी ना
रुठ जाना,
यदि तुम
रूठ गई तो,
हम ना जी
पाएंगे,
तुम्हें
हम प्यार के सिवा क्या दे पाएंगे ।
बहू
तुम...... लक्ष्मी ..बनकर आना,
बदले
में.सम्मान.. ....है पाना
हम
तुम्हारे है, तुम
हमारी हो, यही सोच
को है अपनाना ..
कभी यह
बात भूल न जाना बहु तुम... लक्ष्मी. ...बनकर आना..
तुमसे ही
है हमारा सपना, तुम उसे
अपनाना,
उसे पुरा
कर जाना ।
बहू
तुम.... लक्ष्मी....बनकर आना
तुम जो
मुस्कुराओगी,
बगियाँ
सारी खिल जाएगी, घर में
बहार आएगी,
इन
बहारों में तुम घुलमिल जाना,
अपनें
रंगों को बिखराना ।।
बहू तुम
लक्ष्मी बनकर आना, बदले में
सम्मान व प्यार है पाना ,
बहू तुम
घर को स्वर्ग है बनाना ।
(मेरी ओर से सभी बहूओं और
बेटियों को समर्पित )
संध्या प्रकाश पेशकार देवास
आज पितृ दिवस के अवसर पर
सभी बहनें अपनी स्वरचित रचनाएं पढ़ रही हैं, लेकिन मेरे मन की व्यथा कुछ अलग है। आज से 20 वर्ष पूर्व मैंने अपने डैडी
को एक कार एक्सीडेंट में खो दिया था । मेरी रचना उनके अभाव में मेरे जीवन में जो
रिक्तता आई है, उस पर
आधारित है ।
आपकी कमी
खलती है मुझे,
यह खालीपन बहुत सताता है ।
बस यूं
ही आपकी
यादें दिल में समेटे,
यह वक्त गुजरता जाता है।।
समझ में
आता है क्या फर्ज है ??
और क्या जिम्मेदारी है??
खुद से ज्यादा आप अपने,
परिवार की खुशियां प्यारी
है।
दौड़ रहे हैं हम सब यहां,
पकड़ने को जिंदगी की रफ्तार
।
अपना आज
हम जी नहीं पाते ,
और करते
कल की तैयारी हैं।
आपके दूर
जाने का मुझे,
हर पल एहसास होता है।
आपको खो दिया है,
नहीं
विश्वास होता है ।
हर बात
में आपका साथ,
अब याद बहुत आता है।
हर बीता लम्हा अब तो बस,
आंखों में आंसू लाता है।।
आपकी सीख
और समझाईश का मूल मंत्र ,
जीने का
सहारा देता जाता है ।
आपके
बिना जीना भी क्या जीना है??
बस यह वक्त गुजरता जाता है
।
बस यह
वक्त गुजरता जाता है।।
मनीषा लाठी
सोनकच्छ
मध्यप्रदेश
"समय (मौलिक)"
समय
स-वह और
मय-तल्लीन
होना
समय बहता
जा रहा है
उम्र
निकल गई मेरी
ईश्वर में
तल्लीन
कहां हो
पायी?।
समय को खाती रही
कीमत
करना भुल गयी
समय कहता
है
तेरे साथ
ही तो हूं
बुढ़ापा
आया
मोह माया
न छोड़ा
प्रेम की
गली
घुमती
फिरु
'स'को पहचाना नहीं।
समय नहीं
है
मत कहना
कभी
अंधेरा
आता (अंधड़)
धूल का
अंबार
वर्षा
आती
प्रेम की
वर्षा हुई
अज्ञात
साथी
प्यार
करता है
ऊपर बैठा
मैं न कर
पायी
वह सबके
साथ है।
परिणाम
मेरा
आंखें
हैं मेरी
दिखता
नहीं हैं
खुलती
नहीं
होती अगर
दिव्य
चक्षु
कहलाती।
बात चली
समय की
इसकी बात
उसकी
बातें
चर्चा
होती तेरी मेरी
समय कब
आएगा?
खुद की
कब
पहचान
होगी
समय से फेंका
बीज
अंकुरित होता
तरस नहीं
है मुझ में
स-मय हो
जाऊं
प्रभु के
संग में
मेरे दिन
जा रहा है
समय जा
रहा है
उम्र
निकलती
जा रही
है
समय जा
कहां रहा है?
देख न
पायी कभी।।
"अतुकान्त"
भीतर का
रस
अनुभूति
देता है
रस
ब्रह्म है
हैं यह
अनोखा
रस से
परिपूर्ण
रसीला है
प्रकृति
के
कण-कण में
रस का
ढेला है
फल , फूल
अनाज
निहित
होता है।
रसहीन
बनकर
सूखे
पत्ते से
न बन
मानव तू
प्रेम रस
की भक्ति
तरावट
लाती
रस की
सरिता
बहा दे
मानव
रसीला बन
जा तू।
जग सारा
है रसमय
रस का
श्रोत बहता है
रस के
सागर
डूबकी
लगाओ
रसीला बन
जा
पत्ते
पत्ते में रस
टपकता
रहता है
सृष्टि
के कण-कण में
रस ही रस
है
तुझ में ,मुझ में
रस ही रस
है।।
"बदल गया इंसान"
क्षणिका....
इंसान जब
जब
स्वंय को
जानने
की कोशिश
करता
कहते
इंसान बदल गया
क्यों
!आखिर क्यों?
----ममता गिनोङिया सजग मुग्धा
"बहुत कुछ बदल रहा है"
बहुत कुछ
बदलना
अभी बाकी
है।
उड़ना तो
हमने सीख लिया
पर आसमाॉ
छूना
अभी बाकी
है।
रंग, जो फीके पड़ गए थे
जिंदगी
के
उन्हें
चमकाना
अभी बाकी
है।
हसरतें, जो मन की रह गई थी अधूरी
उन्हें
पूरी करना
अभी बाकी
है।
सबको खुश
रखना तो सीख लिया
खुद को
खुश करना
अभी बाकी
है।
बहुत कुछ
सुन लिया
अब थोड़ा
कहना
अभी बाकी
है।
आधी
जिंदगी तो गुजर गई
पर खुल
कर जीना
अभी बाकी
है।
मां ,पत्नी ,बहन ,बेटी
तो बन गई
पर खुद
की पहचान
अभी बाकी
है।।
मनीषा
अग्रवाल
सिवनी
मालवा
नर्मदा
पुरम मध्य प्रदेश
" जबसे मैंने
आँखें खोली माँ तूने ही मुझे सवारा सजाया"
तेरे
स्नेह के आँचल
ने हर ख़तरे से मुझे बचाया
जीवन के
हर ज़हर को पल्लू से छानकर अमृत बनाया
कहने को
तो माँ हो मेरी लेकिन पहला दोस्त तुम्हें बनाया
रिश्तों
की हर गठरी को
सहेजना तुमने सिखलाया
सही है
ये, ग़लत क्या है ? भेद तुमने बतलाया
पढ़ाई
में बनी मेरी टीचर कभी पापा का कुर्ता पहन डराया
जब भी
उदास हो गयी मैं तुमने ही मुझे बहलाया
2 क़दम पीछे रहकर मेरे कंधों
को ढाढ़स बँधाया
संबल बनी
ढाल बनी जब जब मैंने ख़ुद को अकेला पाया
खेल खेल
में जीवन का हर पाठ मुझे पढ़ाया
हिम्मत
से लड़ सकूँ दुनियाँ से इस क़ाबिल मुझे बनाया
ममता
माहेश्वरी
गुना
शाखा मध्य प्रदेश
"हिंदी का
गौरव"
हिंदुस्तानी
होकर हिंदी भाषा को नमन करते हुए मेरे कथन....
जब
हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को दिल की आवाज बनाता है ,
माँ
सरस्वती का वास उसकी वाणी में हो जाता है ,
उसका हर
कथन "तथास्तु"बनकर शंखनाद करता है ,
तब उसका
हर शब्द एक कवच बन जाता है ,
जब हिंदी
को 'भाषा साम्रागी 'का ताज मिल जाता है ,
तब
गौरवान्वित होकर मेरा हर कथन मेरी मातृभाषा को शीश झुकाता है ।
भारत माँ
की जय का नारा हो या लहराये जब तिरंगा प्यारा ,
जो शब्द जहन में गूंजे वो
जयकार हमारी मातृभाषा है ,
जब सरहद
पर सिपाही देशभक्ति का गीत गुनगुनाएं और वतन के लिए गोली तक झेल जाए ,
उस गोली
को पार करता जयहिंद शब्द हिंदी का गौरव बन जब इठलाता है ,
तब मेरा
हर कथन मेरी मातृभाषा को शीश झुकाता है ,
अपने
गीतों से गीतकार जब प्यार के दिये जलाता है ,
कवि अपनी
कलम से देखो कैसे तीर चलाता है ,
जब लेखक
अपनी लेखनी से वतन की तस्वीर बदल देता है ,
हिंदी भाषा में लिखे
वक्तव्य " जियो और जीने दो "जब मुस्कुराते हैं ,
तब फिर
से मेरे कथन अपनी मातृभाषा को शीश झुकाते हैं ।
जब जश्न
कोई हम मनाते हैं ,
वतन से
आतंकवाद को हटाते हैं ,
भ्रष्टाचारी
का दानव जब दम तोड़ता है ,
भारत का
अभिमन्यु जब घर लौटता है ,
काश्मीर
फिर हमारा गहना बन जाता है ,
तब
वंदेमातरम का 'जयनाद' हिंदी में गुनगुनाता है ,
और फिर
से मेरा हर शब्द अपनी मातृभाषा को शीश झुकाता है ,
चाँद पर
जीवन की खोज करते चंद्रयान को चाँद जब गले लगाता है ,
तब भी
हिंदुस्तान "कोशिश करने वालों की हार नही होती" शब्दों के साथ
मुस्कुराता है ,
विभिन्न
भाषी जनमानस के मुख से भारतवर्ष महान का नारा देखो कैसे गूंज जाता है ,
तब फिर
से मेरा हर कथन अपनी मातृभाषा के सम्मान में सर झुकाता है ।
रुचिका हरभजनका
महानंदा
नगर मध्यप्रदेश
"बाप"
घोडो
बण्यो गडोल्यां चाल्यो,
ले बेटा
नें मोरां पर।
गोडा घिस
घिस घणों कमायो,
खरच कर
दियो छोरां पर।
खुदरे तो
फाटी अंगरखी,
सूट
दिराया बेटा नें।
खुद
चपलां सुं काम चलायो,
बूंट
दिराया बेटा नें।
घणों
लडायो घणों पढायो,
पछै
चढायो घोडी पर।
पांच
पांच सौ रा नोट ओवारया,
बेटा बहू
री जोडी पर।
थोडा दिन
तो स्याणां रिया,
पछै शुरू
खटपट होगी।
सास बऊ
में अणबणं होगी,
किचकिच
अर झिकझिक होगी।
टूट गयो
विश्वास बाप रो,
बेटो रण
में कूद गयो।
कात्यो
सूत कपूत निवडग्यो,
मूल गियो
अर सूद गयो।
छाती रे
चेपर राख्या बे,
मूंग दले
है छाती पर।
तूं तूं
पर उतर आया अर,
केवणं
लाग्या पांती कर।
बेटी गई
पराया घर में,
बेटो भी
न्यारो होग्यो।
बुढापे
आंख्यां सुं ओझल,
आंख्यां
रो तारो होग्यो।
झर झर
आंसूं मां रोवे है,
बाप रोवे
है घुटघुट कर।
सेवा रा
सपना टूट्या अर,
सुख री
आशा गई बिखर।
खुदरो घर
खावणं नें दौडे,
सन्नाटो
सो गयो पसर।
कुणं
समझे उणं मां रा दुख नें,
बांझ
रिवी बेटा जणकर।
दो पाटां
बिच बाप पिसीजे,
छाती ने
करडी कर कर।
आंसूं पी
पी दिन काटे है,
कियां
कटैली आ ऊमर।
खुदरो
खून परायो होग्यो,
खुदरी
पीड सुणावे किणनें।
मांय
रोवे अर मुंडे मुलके,
खुदरो
दरद बतावे किणंनें।
ढलती ऊमर में
कमर झुकी,
अर गोडा थाक्या।
ऐडा दिन
देखणं री खातर,
राम
जींवता क्यांनें राख्या।
बाप
बण्या जद घणां फूलीज्या,
थाली
बाजी ढोल घुराया।
मांचा
में मा बाप पड्या जद,
बेटा
देखण नें नहीं आया।
🙏 🙏🙏🙏
चंदा
दाधीच
पश्चिम
इंदौर शाखा