"हिंदी का गौरव"
हिंदुस्तानी होकर हिंदी भाषा को नमन करते हुए मेरे कथन....
जब हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को दिल की आवाज बनाता है ,
माँ सरस्वती का वास उसकी वाणी में हो जाता है ,
उसका हर कथन "तथास्तु"बनकर शंखनाद करता है ,
तब उसका हर शब्द एक कवच बन जाता है ,
जब हिंदी को 'भाषा साम्रागी 'का ताज मिल जाता है ,
तब गौरवान्वित होकर मेरा हर कथन मेरी मातृभाषा को शीश झुकाता है ।
भारत माँ की जय का नारा हो या लहराये जब तिरंगा प्यारा ,
जो शब्द जहन में गूंजे वो जयकार हमारी मातृभाषा है ,
जब सरहद पर सिपाही देशभक्ति का गीत गुनगुनाएं और वतन के लिए गोली तक झेल जाए ,
उस गोली को पार करता जयहिंद शब्द हिंदी का गौरव बन जब इठलाता है ,
तब मेरा हर कथन मेरी मातृभाषा को शीश झुकाता है ,
अपने गीतों से गीतकार जब प्यार के दिये जलाता है ,
कवि अपनी कलम से देखो कैसे तीर चलाता है ,
जब लेखक अपनी लेखनी से वतन की तस्वीर बदल देता है ,
हिंदी भाषा में लिखे वक्तव्य " जियो और जीने दो "जब मुस्कुराते हैं ,
तब फिर से मेरे कथन अपनी मातृभाषा को शीश झुकाते हैं ।
जब जश्न कोई हम मनाते हैं ,
वतन से आतंकवाद को हटाते हैं ,
भ्रष्टाचारी का दानव जब दम तोड़ता है ,
भारत का अभिमन्यु जब घर लौटता है ,
काश्मीर फिर हमारा गहना बन जाता है ,
तब वंदेमातरम का 'जयनाद' हिंदी में गुनगुनाता है ,
और फिर से मेरा हर शब्द अपनी मातृभाषा को शीश झुकाता है ,
चाँद पर जीवन की खोज करते चंद्रयान को चाँद जब गले लगाता है ,
तब भी हिंदुस्तान "कोशिश करने वालों की हार नही होती" शब्दों के साथ मुस्कुराता है ,
विभिन्न भाषी जनमानस के मुख से भारतवर्ष महान का नारा देखो कैसे गूंज जाता है ,
तब फिर से मेरा हर कथन अपनी मातृभाषा के सम्मान में सर झुकाता है ।
रुचिका हरभजनका
महानंदा नगर मध्यप्रदेश