पर्यावरण
पर्यावरण पिता तुल्य तो
प्रकृति हमारी माँ
आशीषो से जिनके
फलते फूलते हम सदा।
प्रकृति माँ बन हमें दुलारती
सिर पर छत नीले आकाश की
पैरों के नीचे हरियाली की चादर बिछाती।
व्योम में अठखेलियाँ करते बादल
कभी इंद्रधनुष की छँटा बिखरती
चिड़ियों की चहचहाहट मन को मोह लेती।
नदियों का मधुर स्वर कल कल है करता
झरनों से स्वच्छ जल पर्वत शिखर से गिरता
अनुपम छबि प्रकृति की मदहोश कर देती ।
प्रकृति से ही जीवन है, सहेजना है नियति ।
प्रदूषण से पर्यावरण की आत्मा हो रही छलनी
हे मानव तेरी मनमानी अब नही है चलनी।
माँ की तरह हो पर्यावरण का सम्मान
वृक्षों का पहनाओ नवीन परिधान
नदियों में मत फैलाओ गंदगी
ऐसे होगी प्रकृति की बंदगी ।
जीवन प्रकृति से है ये बात लो जान
इस धरा पर हम सब है बस मेहमान
वन पर्वत सागर हैं प्रकृति की गरिमा
मत इनको पहुँचाओ नुक़सान ।
जिस क्षण तनी भ्रकुटी प्रकृति की
मानव का नामोनिशान मिट जायगा
संभल जा ए इंसान अब भी वक़्त है
क्यूँकि प्रकृति अब तेरे ख़िलाफ़ सख़्त है ।
राष्ट्र चेतना
विषय -पर्यावरण
राष्ट्र हमारा गौरवशाली
वंदन इसको हम करते हैं
पर्यावरण पिता तुल्य तो
प्रकृति हमारी माँ
आशीषो से जिनके
फलते फूलते हम सदा।
प्रकृति माँ बन हमें दुलारती
सिर पर छत नीले आकाश की
पैरों के नीचे हरियाली की चादर बिछाती।
मनीषा राठी
अध्यक्ष
उज्जैन पश्चिमांचल शाखा
उज्जैन मप्र.
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