शीर्षक- मां के आंचल से ही बनती है मां
आंचल से ढके सिर से निहारती है आकाश को
पकड़ कर एक हाथ बेटी का दिखा रही है चंदा मामा
सिलेट पोंछती आंचल से सिखा रही है सारेगामा।
आंचल से आंखों को ढके धूप से बचकर, निहारे एकटक बेटे का पथ,
अतिथि के आने पर पल्लू से बुहारती आसन को
मेवे मिष्ठान की थाली को आंचल से पोंछ कर परोसती तत्पर।
मां का आंचल याद दिलाता है अनेक कहानियां
आंचल से ढकी मां लगती है देवी की प्रतिमा
आंचल में अन्न लिए देती फकीर को
पकड़कर आंचल का कोना देती आशीर्वाद सबको।
मां का आंचल नहीं जादुई चिराग है
ढक लिया एक बार आंचल से तो जिंदगी बहार है।
चुटकियों में हो जाता है हर काम मां के आंचल से
मां के आंचल पर जीवन निसार है।
मंदिर में बैठी एक देवी,
देवी से लगा रही गुहार।
करना तुम मेरे परिवार की रक्षा
मेरे हृदय की यही सच्ची पुकार।
"शीर्षक- भूदेवी को बचा लो
रे मानव ! हो सके तो
इस पृथ्वी को बचा लो।
इसके गुणों को पहचानो
कण-कण को निहारो।
पंच तत्वों से निर्मित काया
सांसों में तेरा भाव समाया।
अन्न-जल तू सबको देती
भेदभाव तनिक ना करती सहनशक्ति की तू देवी
सरलता-धैर्य धारण करती।
जड़-चेतन सबको अपनाती
खुशियों से झोली भर जाती।
मात-पिता दोनों का रूप
तेरा आंचल तेरी धूप।
हौंसला तेरा हुआ ना कम
पृथ्वी माँ शत-शत नमन।
लज्जा हीन बेहाल होकर
लालच घट को धारण कर।
निर्वस्त्र करे मानव तुझको
अंग-अंग को काट कर।
तेरी चीख-पुकार सुने ना
अंध गलियों में दौड़ रहा।
हवस का शिकार होकर
घर-द्वार अपने भर रहा।
अंत तेरा क्या होगा
मूर्ख मानव ! तू ना जाने।
यह बचेगी तू बचेगा
एहसानों इसके दबेगा।
डॉ.निशा नंदिनी भारतीय तिनसुकिया,असम
कण-कण मेरे देश का
मन-मन मुझे लुभाता है।
सपनीले गहरे नयनों को
आनंदमय कर जाता है।
स्वर्ण माटी की महक भीनी
अंतर्मन अभिभूत है।
उज्जवल-उज्जवल गंगा जल
शांति द्योतक दूत है।
प्रहरी रक्षक खड़ा हिमालय
खड़ा-खड़ा सो जाता है।
आंच ना आने देता हिंद पर
शत्रुओं से टकराता है।
कण-कण मेरे देश का
मन-मन मुझे लुभाता है।
सपनीले गहरे नयनों को
आनंदमय कर जाता है।
हरे भरे सुंदर खेतों का
जादू मन पर चढ़ता है।
बौराये आमों को देख
भाव-विभोर हो जाता है।
निरंतर बहता नदियों का जल
गीत सुहाने गाता है।
प्रसन्न मन निरपेक्ष भाव से
प्राणवायु दे जाता है।
कण-कण मेरे देश का
मन-मन मुझे लुभाता है।
सपनीले गहरे नयनों को
आनंदमय कर जाता है।
शीर्षक- आओ अमृत महोत्सव मनाएं
आओ अमृत महोत्सव मनाएं
हम सीखें दुनिया को सिखाएं।
बुनकर संस्कृति ताना-बाना
सुंदर भारत आदर्श दिखाएं।
निद्रा से जागे सर्वप्रथम
औरों को जागृत किया।
दूर भगाकर अंधियारे को
पवित्र प्रकाश पर्व किया।
लेकर ज्ञान ज्योति ज्वाला
हर घर की चौखट पर जाएं।
चार वेद, अट्ठारह पुराण
रामायण, गीता का ज्ञान।
हर बालिका माँ का रूप
हर बालक में रमते राम।
कर्म पूजा के मंत्र को
कोने-कोने तक फैलाएं।
आओ अमृत महोत्सव मनाएं
हम सीखें दुनिया को सिखाएं।
बुनकर संस्कृति ताना-बाना
सुंदर भारत आदर्श दिखाएं।
भारत प्यारा देश हमारा
वारे इस पर तन-मन अपना।
आंच न आए कभी किसी पर
पर सेवा का मंत्र उचारे।
रक्षा में तत्पर रहकर इसकी
आजादी का महत्व बताएं।
भारतीय संस्कृति भाषा रूप
देववाणी की उज्जवल धूप।
गंगा मैया का शीतल जल
नीम ,आंवला, पीपल फल।
चरखा, करघा, मिट्टी,मोम
स्व उद्योग का महत्व बताएं।
आओ अमृत महोत्सव मनाएं
हम सीखें दुनिया को सिखाएं।
बुनकर संस्कृति ताना-बाना
सुंदर भारत आदर्श दिखाएं।
शीर्षक - रेत के जंगल
नदी, हो सके तो
छुपा लो अपने आपको
ढूंढ रहे हैं रेत के जंगल तुम्हें।
लग गई है नजर
तुम्हारी खूबसूरती को
जाकर मां से नज़र का
टोटका करवा लो।
करके कब्जा तुम्हारे अर्धांग पर पनप रहा है साम्राज्य
कंकरीट के जंगलों का
हर कोई तुम्हें काटने पर तुला है
हवस बढ़ रही है चहुँ ओर
लूटपाट का महल खड़ा है।
नदी, हो सके तो
छुपा लो अपने आपको
ढूंढ रहे हैं रेत के जंगल तुम्हें।
दिन-दिन आदमी की लालसा
बढ़ती जा रही है
रहता था पहले एक कमरे में
पूरा का पूरा परिवार
अब आठ कमरों के घर में
सिर्फ एक आदमी रहता है।
आदमी के रहने को
धरती छोटी पड़ रही है
नदी,हो सके तो
छुपा लो अपने आपको
ढूंढ रहे हैं रेत के जंगल तुम्हें।
शीर्षक-कफन तिरंगा दे जाओ
चाह नहीं प्रभु
महलों की तुम सैर कराओ।
चाह नहीं प्रभु
पुष्प रथ पर तुम चढ़ाओ।
चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी
कफन तिरंगा दे जाओ।
मैं तो लघुकण इस धरती का
दुर्लभ जीवन पाया है।
कर्ज बहुत बड़ा धरा का
असीम सुख पाया है।
आ सकूं प्रभु इसके काम
ऐसा कुछ करवा जाओ
चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी
कफन तिरंगा दे जाओ।
बोझ बड़ा भारी है सिर पर
कर्मबोध न जानूँ मैं।
भारत माँ के ध्यान में
मत्स्य सम डुबूँ-तैरु मैं।
हरेक कतरा लहू का
इसपे न्यौछावर करवा जाओ
चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी
कफन तिरंगा दे जाओ।
शीर्षक- सुकर्म की गाड़ी हांको
है अगर हिम्मत तो
सुकर्म की गाड़ी हांको
दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे
देख कर चलो।
प्रेम के बस्ते में
आनंद के फल भरो
कुकर्म से बचो
और बचाओ सबको।
मत पूछो किसी से
अपनी मंजिल का पता
मंजिल खुद तुम्हारा
पता ढूंढती है।
चाहे जितना बहला
फुसला लो उसको
तुम्हारे कर्मों के आगे
वो चलती है।
भाग्य से कर्म को
बनाया नहीं जाता
कर्म का लिखा
मिटाया नहीं जाता।
आदि से अंत तक
विवेक से चलो
सुकर्म की कलम से
भाग्य को लिखो।
शीर्षक- पिता का दुख
देकर हर सुख बेटे को
पाल-पोस कर बड़ा किया
सींच अपने खून पसीने से
पढ़ा-लिखा कर खड़ा किया।
हाथ मेरा थामे रहता था
जब वो स्कूल जाता था
पापा तुम जल्दी आ जाना
रो-रो कर वो कहता था।
नहीं चाहिए मुझे खिलौने
बस पापा तुम आ जाना
गोदी में अपनी लेकर के
प्यार मुझे तुम कर लेना।
बड़ा हो गया बेटा मेरा
हाथ मेरा अब छोड़ गया
रोते-बिलखते पापा से
रिश्ता अपना तोड़ गया।
उठा न सका वो भरी बोझ
अपने अपाहिज पापा का
व्हील चेयर में बैठाकर
वृद्धाश्रम की ओर गया।
अजनबियों के बीच में
आज मुझे वो छोड़ गया
जिम्मेदारी से घबरा कर
अनाथ मुझे वो कर गया।
आशीर्वाद देता है दिल
बेटा मेरा खुश रहे
उसकी झोली के सारे दुख
मेरी झोली में पड़े रहे।
डॉ. निशा नंदिनी भारतीय, तिनसुकिया, असम