माँ
"
मेरी प्रथम गुरु "
चरणों
में वन्दौ करूँ
माँ ही
मेरी प्रथम गुरु
पहला कदम रखा धरती पर,
दौड़ पड़ी सम्भाला आकर..
पहला शब्द कहा तुतलाकर,
न्यौछावर तू हुई थी मुझ पर..
प्रथम पाठशाला का दिन था,
मचल गई थी जाना न था..
उठा गोद में गले लगाया,
स्पर्श कभी वो भूल न पाया..
ज्यों-ज्यों उम्र का कदम बढ़ाया,
संस्कारों का तूने पाठ पढ़ाया..
ठोकर लगी तो हौसला बढ़ाया,
कठिनायों से लङना सिखाया..
कहाँ थी तू ज्यादा शिक्षित,
हर गुण था तुझमें परिलक्षित..
हर समस्या का तू ही थी हल,
ज़िन्दगी हो जाती थी सुफल..
आत्मसम्मान से बढ़ना आगे,
संयम से जीना सीखा तुझसे..
मुस्कुराहट तेरी न भूल पाई हूँ,
हर हार से तभी जीत पाई हूँ..
जीवन में जब जब असफलता मिली,
तेरे अनुभव के पाठ्यक्रम से पास हुई..
तेरे होने का प्रतिपल अह्सास होता है,
माँ आज भी सर पे तेरा हाथ होता है..
संगीता मंत्री
नागपुर