हे मानव तू मानव है,
मानवता को यूँ शर्मशार न कर।।
अपने ही अपनो के दुश्मन है,
देश मे फैली ये कैसी उलझन है।।
अपनो ने अपनो को लूटा है।।
चारो तरफ घोर अँधेरा है।।
अब न रहा बुजुर्गों का बसेरा है।।
अपनी ही बहु-बटियाँ अपनो के बीच पराई है,
इस दुनिया मे ये कैसी अनहोनी आई है।।
ये मानव तू बेटे-बेटियों में फर्क ना कर,
आज की इस दुनिया में अपनी सोच बदला।।
बेटियाँ आसमान में परचम लहराई हैं,
यही नही अपने पिता की अर्थी भी उठाई है।।
हे मानव कुछ तो शर्म कर,
यूँ मानव को शर्मशार न कर।।"
रश्मि बंका, बेतिया, बिहार