माँ की दहलीज
आज भी छोड़ते वक़्त दहलीज माँ की, धड़कने बढ़ जाती है।
वो पहली विदाई हुई थी , हर बार याद आ जाती है।
वो आँचल की छाँव, फिर से धूप बन जाती है।
वो अल्हड़ सी बचकानिया, जो वहाँ छुपा कर रखती हूं।
वो छूकर तेरे आँगन को,फिर से जिंदा हो जाती है।
बस तू ही समझती है कि, मुझमें बचपना अभी भी बाकी है
वरना उस दहलीज़ पर जाकर तो, ये बच्ची बड़ी हो जाती है।
हर फरमाइश खुल जाती है, इस जुबान पे जो जो अटकी है।
जाने कैसा नाता है, बिन कहे तू समझ जाती है
महाराष्ट्र , अकोला, सोनिया चेतन