"दर्द मजदूरों का
सिर पर बोझ पांव में छाले।
इनके घर में रोटियों के लाले।।
जुल्मों का बोझ भी संग में उठाते।
मजदूरी के बाद भी आधा पेट भोजन पाते ।।
मजदूर थे ,मजदूर हैं ,मजदूर ही रह गए।
मजबूरी के कारण हजारों सितम सह गए।।
बदल गया जमाना तुम भी बदल जाओ न।
मजदूरों का समझो दर्द।
""औ"" हमदर्द बन जाओ न।।
रानी अग्रवाल जमशेदपुर शाखा झारखंड प्रदेश 9708557661