Tuesday, April 19, 2022

पर्यावरण

रो-रो कर कहती धरा, अब तो जग इन्सान। 

मानवता ही है धर्म , नहीं बनो हैवान।


आँचल मेरा काटकर, क्यों बनते हैवान।

नदी ताल मिल कर करें ,सबसे एक सवाल। 

मलिन हुआ पर्यावरण,जीना है बेहाल।


उन लोगो से पूछ लो, पानी की औकात । 

तरसें नित जो बूँद को , धूप और बरसात ।।


पिघल रहे हिमखंड हैं , देख सूर्य का ताप।

प्रर्यावरण उजाड़ कर , मानव करता पाप।


मलिन हुआ पर्यावरण,नहीं बचे अब नीड़ । 

पंछी सब बेनूर है , समझो उनकी पीड़ ।।


हरियाली चहुँ और हो, सुखद लगे सुखधाम।

पर्यावरण सुधारिये , धरा देत पैगाम।


मंजू शर्मा (जटनी उड़ीसा ) 9040175652

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