Saturday, May 28, 2022

सरिता पालीवाल बाकि मोगरा, छतीसगढ़,

 मां... 

मैं कभी डरी नहीं, 

क्योंकि आप हमेशा साथ हो , 

मेरे इस पंछी मन का , 

आप ही सारा आकाश हो|

जीवन की तपती राहों में , 

आप ठंडी ठंडी छांव हो, 

 दिल ने जिसे मांगा है हर पल, 

 आप मेरी वह चाह हो|

आंचल तेरे दामन का, 

 मेरे सर पर हमेशा बना रहे, 

 तू हमेशा संग मेरे रहना मां, 

साथ भले कोई रहे ना रहे|



 मां तो मां होती है ... 


मां की कोई उपमा नहीं होती .. 

चाहे मेरी मां हो.. 

 या मेरी सासु मां|

*ओर एक छोटे से लम्हें को उठाने के लिए झुकने का मन उनका भी नहीं हुआ....*

*हम दोनों ने सोचा इतनी बड़ी जिंदगी में एक लम्हें के गिरने का क्या वज़ूद....*

*पर धीरे धीरे वो लम्हा फैलने लगा....*

*अपने आगोश में और भी कीमती क्षणों को समेटने लगा....*

*फिर हम दोनों ने खूब कोशिश की उस गिरे हुए एक लम्हें को समेटने की....*

*पर ये क्या उस इकलौते लम्हें ने तो कई छोटे छोटे लम्हों को जोड़कर अपना अलग वज़ूद बना लिया था....*

*जमीन पर गिरकर गहराइयों में अपनी जड़े फैला लिया था....*

*अब वो लम्हा लम्हा नहीं रह था खुद को एक किस्सा बना लिया था....*

*हम दोनों ने फिर लाख कोशिश पर उस लम्हें को समेट नही पाए....*

*फिर से हमारी जिंदगी में उस एक लम्हें को जोड़ नही पाए....*

*रहने को तो अब भी हम दोनों साथ है....*

*पर उस एक लम्हें के गिर जाने का हर पल हमें एहसाह है....*

*तो अपनीजिंदगी में कभी भी किसी लम्हें को छोटा मत समझना*

*गिरे हुए लमहों को समेटने के लिये उठना पड़े या फिर झुकना पड़े देर मत करना....*

*वरना होगा तो कुछ नहीं..... बस दो लोगों के बीच वो गिरा हुआ पल अपना वजूद बना जाएगा....*

*और क्या होता है जिंदगी से किसी एक क्षण का भी बिछड़ना आप को सीखा जाएगा....*



छतीसगढ़, बाकि मोगरा, सरिता पालीवाल 

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