🌺माॅ अकेली ही काफी है
हजारो फूल चाहिए एक माला पिरोने के लिए
हजारो दिपक चाहिए एक
थाली सजाने के लिए
मां अकेली ही काफी है बच्चो की जिन्दगी को सुरक्षित बनाने के लिए।
हम भूल जाते है हमारी सारी जिन्दगी की परेशानियां
जब हमारी मां अपने आंचल मे हमारा सर रख लेती है।
चलती फिरती आखों से हमे देखती है पहाड़ो जैसी कठिनाईया झेलती है
सख्त राहों मे भी आसान सफर बनाती है।
कभी खिलौने से खिलाया है
कभी आंचल मे छुपाया है
मां मुझे अंगुली पकड़कर लिखना सिखलाया है
मुझे आगे बढना सिखलाया है
अपनी प्यार भरी आखों से सहलाया है
गलतियां करने पर भी मां ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है।
लेकिन मां मेरी मुझ को हमेशा अपने सीने से लगाया है।
मुझ में तेरी ही आंचल की खुशबू है माॅ
ममता के आंचल मे बढा पला
कामों की गढरी कंधो पर लादे
कभी नही उफ्फ करती है माॅ
मां बच्चो की चिन्ताओं का साझेदारी है मां ही सब है
मां ओ मां अपने आंचल मे रखना मां
मां अकेली ही काफी है
मां अकेली ही काफी है
पर्यावरण से है जीवन इसे अपना हम सफर बनाना है
🌴मेरा मन भी घबराता है, दर्द मुझे भी होता है।
अब थोड़ी मुझ पर दया कर, बहुत कम बचे वृक्ष धरा पर।
🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे।
🌴हरे है वन-उपवन जब तक, सुरक्षित है जीवन तब तक |
बड़ रहा ताप धरा का, पिघल रही हिमनद ये सारी |
मै बादल को खींच लाता, अच्छी लगती बरसात मुझे |
🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे।
🌴वृक्ष बिना जीवन सूना, सूना है घर आंगन
देता हूं छाया अपनी, फल फूल से भरता हूं दामन
🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे।
पर्यावरण से है जीवन इसे अपना हम सफर बनाना है।
छत्तीसगढ प्रदेश, बांकी मोगरा, संतोष अग्रवाल
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