आज की शाम
आज फिर से जवानी दिवानी हुई
देख कर ज़ाम महफ़िल रुमानी हुई
चाहता था जिसे आज याद आ गई
दिल में हलचल मचा तो सुनामी हुई
शाम होती गई दिन ढला जब सनम
ज़ाम हाथों चढ़ा बे जुबानी हुई
आशिकी में हमारे कहीं थी कमी
चाह कर भी नहीं ये सुहानी हुई
सुन सहज अब नहीं है कहीं आसरा
तार दिल की बहुत ही पुरानी हुई..
"आज की शाम
आज फिर से जवानी दिवानी हुई
देख कर ज़ाम महफ़िल रुमानी हुई
चाहता था जिसे आज याद आ गई
दिल में हलचल मचा तो सुनामी हुई
शाम होती गई दिन ढला जब सनम
ज़ाम हाथों चढ़ा बे जुबानी हुई
आशिकी में हमारे कहीं थी कमी
चाह कर भी नहीं ये सुहानी हुई
सुन सहज अब नहीं है कहीं आसरा
तार दिल की बहुत ही पुरानी हुई"
कृष्णा सुल्तानिया
सरीइंदेला, झारखंड
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