तू जननी है
स्वयं को आंकती क्यों कम है?
यूं दीन हीन लाचार बनकर
थर-थर कांपती क्यों है?
बन रणचंडी तांडव मचा
कर मर्दन शत्रु (बलात्कारी)का
रूप धर काली का
ले खड्ग हाथ में
अंत कर दुराचारी का...
बन दामिनी टूट शत्रु पर
इतिहास तभी रच पाओगी
*_बन स्वयंसिद्धा_*
फिर अनगिनत बालाओं की
प्रेरणा तुम बन जाओगी...
दिन बहुरेंगे तेरे भी फिर
आसमान से सूरज- चांद- तारे भी
नई रोशनी बरसाएंगे;
कलरव करते पंछी भी फिर
गीत नया गुनगुनाएंगे,
देखना फिर मुरली वाले मोहन भी
आसमान में मुस्काएंगे...!!!
झारखंड, रांची, सरोज गर्ग रत्नप्रभा
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