पर्यावरण
पर्यावरण का अदभुत संगम।
रो-रो क़र अब कहता है।
निकल मेरे अतीत पर अब।
जब पादप ,तटनीऔर महीधर
दूध सा झरना बहे अकड़ कर।
लहरें जब इठलाये ,विमल सरिता शरमाए।
सघन प्रतिबिम्ब क़ी चादर ओढ़े, वसुन्धरा भी हरषाये
नीम का कड़वा दातुन भी तब अपनी धाक जमा जाए।
बरगद,पीपल और आँवला जन जन-जन में पूजे जाय।
चमकते सूर्य क़ी रश्मि दीप अविरल बन जाए
फिर इस आपाधापी में , तकनीकी की आँधी में।
ठूँठ हो गये वृक्ष घनेरे, मौन हो गईं धरा ये सारी।
हे नर शपथ ये दोहराओ,धरा फिर से मह्काओ
वृक्षों को बचाते जाओ, नये वृक्ष सजाते जाओ
-उड़ीसा, बडबिल, डा. रजनीश शर्मा
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