"" जिंदगी ""
जिंदगी से बड़ी, कोई सजा ही नहीं,
और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं।
इतने हिस्सों में ,बट गई हूं मैं ,
मेरे हिस्से में तो , कुछ बचा ही नहीं ।
जिंदगी से बड़ी ,कोई सजा ही नहीं ,
और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं ।
चाहे सोने के फ्रेम में , जड़ दो ,
"आईना" झूठ , बोलता ही नहीं ।
जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,
और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं ।
धन के हाथों , बिक गए हैं सभी ,
अब किसी जुल्म की , कोई सजा ही नहीं ।
जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,
और क्या जुल्म है , कुछ पता ही नहीं ।
सच घटे या बड़े, तो सच-सच ना रहे ,
"यारो" - झूठ की तो कोई ," इंतेहा " ही नहीं, इंतेहा ही नहीं
जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,
और क्या जुल्म है ,कुछ पता ही नहीं ।।
झारखंड, जमशेदपुर, मीना अग्रवाल
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