Saturday, June 25, 2022

निधि भट्टड़ जलगांव महाराष्ट्र

 माँ  का  आँचल

माँ, तुम्हारा आँचल जैसे मेरे लिए मेरी खुशियो का बादल

नन्ही सी कली को अपनी तुमने इस मे ही सहेजा

मेरी हर किलकारी और खुशियों को इसमें ही समेटा

नन्हे नन्हे कदम तुम्हारे पीछे चल पड़े

ममता के आंचल को हौले से पकड़े

पसीने से तरबतर खेलकूद जब मैं आती

तुम्हारे ही आँचल को अपना तौलिया थी बनाती

मिट्टी से पैर जब कभी सन जाते

चढ़कर तुम्हारी गोद मे साफ हो जाते

कभी ढोल देती मैं  कुछ खाते खाते

बड़े प्यार से तुम आँचल अपना थमा देती हाथ मेरे

भरी दोपहरी तपती धूप हो कभी भी

तुम्हारा ही आँचल मेरी छांव होती

बाहर कभी जाते बारिश जो होती तुम्हारा वो आँचल मेरी छतरी होती

जो गुस्सा कभी हुई बुआ और चाची

आँचल के पीछे तुम्हारे ही छिपती

उसी आँचल को तरसती है अब भी

तुम्हारी सयानी सी ये बिटिया रानी

मुझे तुम बुला लो ,गले से लगा लो, ममता के आंचल में फिर से छिपा लो.....

छोड़ कर के अकेले जबसे तुम हो गई...

खाली खाली सी सारी दुनिया हो गई...

न आते है आंसू न आती है हिचकी....

तरसती है ये बेटी सिसकती है ये आंखे...…

 

निधि भट्टड़ 

स्वलिखित 

जलगांव शाखा

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