बेटियां करे पुकार..
कुहू- कुहू ! यह किस कोयल की रागिनी है?
जिसने पूरे वातावरण को संगीतमय बनाया है,
यह तो मेरी बेटी का कृंदन है,
जिसने मेरे घर में जन्म लिया है।।
मधुर रस मेरे कानों में वह घोल रही है,
आकर्षण कुछ ऐसा उसमें,
पूरी कायनात को वह मोह रही है।।
गोद में उसे उठाया मैंने,
अंदर तक आत्मा प्रफुल्लित हो गई।
लिपट गई मुझसे वह ऐसे,
जैसे जहां की खुशियां उसे मिल गई।
उसके तन मन की सुंदरता, कुशाग्रबुद्धि ने,
मेरी छाती गर्व से चौड़ी कर दी,
प्रेम और संस्कारों का धन उसके पास,
सीप की चमक उसने चहुं और फैला दी।।
एक समय ऐसा भी आया,
बाबुल के घर से उसे विदा होना पड़ा।।
जान से प्यारी बिटिया को,
डोली में बैठाना पड़ा।।
पर ससुराल में भी उस नव परिणीता ने,
स्वयं को सदा अकेला पाया है।
दहेज की आग में जलती उसकी लाज,
सब ने उसके आत्मसम्मान को तिल - तिल जलाया है।।
उफ़ ना कभी की बेटी ने,
हमेशा मुस्कान के पीछे दर्द छुपाया है।
दुख ने जो भरे उसकी नैनों में आंसू,
कभी मां-बाप के सामने नहीं छलकाया है।।
अपनों के व्यंग्य बाण से ,
हुआ उसका मन आहत,
जख्मों से भरा शरीर उसका ,
पर डोलने ना दी अपनी हिम्मत।।
पर यह क्या!....
बढ गई लोभियो की हिम्मत,
कर दिया उसे आग के हवाले,
चिल्ला रही वह, पुकार रही वह,
आजा बाबुल ,मुझे बचा ले।
एक डरावना सपने से भी डरावना वह पल,
उन पापियों के सामने ना टल सकता था ,न टला वह पल।।
या खुदा...
क्यों होते देख रहा बेटियों पर
इतना अत्याचार,
या तो बेटी पैदा करना बंद कर दे,
या दें उसे उसका पूरा अधिकार।।
आसाम, गुवाहाटी, नीलम चौधुरी
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