Saturday, May 28, 2022

श्वेता राटेरिया रायगढ़, छतीसगढ़,

जिन्दगी एक पहेली.....

कल अचानक से उससे मुलाकात हो गई , जिससे शिकायते बहुत थी उसी के तर्क पर निसार हो गई.....

चली जा रही थी वह गुनगुनाते हुए , मुझे देखा तो रुकी मुस्कुराते हुए..,.

मैंने पूछा कैसी पहेली हो तुम , कभी समझ ना आती हो....

खुद ही चोट देती हो , खुद ही इस पर मरहम लगाती हो....

कभी खुशियों की रास्ते पर ले जाकर , दर्द की मंजिल पर छोड़ आती हो....

तो कभी सपनों के शहर ले जाकर हकीकत से रूबरू करवाती हो....

कभी इतना हंसाती हो , कि जन्नत सी हसीन लगती हो....

कभी इतना रुलाती हो , की जहानुम सी गमगीन लगती हो....

मेरे सवालों पर खिलखिला उठी वह बोली , तू मुझे समझ ना समझ मैं तेरी सारथी हूं...

तेरे लड़खड़ाते कदमों को थाम , तेरी उंगली पकड़ तुझे चलना सिखाती हूं...

खुदा की बनाई पूरी कायनात से , तुझे रूबरू करवाती हूं....

गम से मिलवा के , खुशियों की पहचान करवाती हूं...

आंसुओ के समंदर में डुबो , हंसी की मोती दिलाती हूं...

दर्द की आवाज में , दुआओं भरे कलमें पढ़वाती हूं....

अरे मैं जिंदगी हूं पगली , तुझे जीने का सलीका सिखाती हूं...


छतीसगढ़, रायगढ़, श्वेता राटेरिया 

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