जिन्दगी एक पहेली.....
कल अचानक से उससे मुलाकात हो गई , जिससे शिकायते बहुत थी उसी के तर्क पर निसार हो गई.....
चली जा रही थी वह गुनगुनाते हुए , मुझे देखा तो रुकी मुस्कुराते हुए..,.
मैंने पूछा कैसी पहेली हो तुम , कभी समझ ना आती हो....
खुद ही चोट देती हो , खुद ही इस पर मरहम लगाती हो....
कभी खुशियों की रास्ते पर ले जाकर , दर्द की मंजिल पर छोड़ आती हो....
तो कभी सपनों के शहर ले जाकर हकीकत से रूबरू करवाती हो....
कभी इतना हंसाती हो , कि जन्नत सी हसीन लगती हो....
कभी इतना रुलाती हो , की जहानुम सी गमगीन लगती हो....
मेरे सवालों पर खिलखिला उठी वह बोली , तू मुझे समझ ना समझ मैं तेरी सारथी हूं...
तेरे लड़खड़ाते कदमों को थाम , तेरी उंगली पकड़ तुझे चलना सिखाती हूं...
खुदा की बनाई पूरी कायनात से , तुझे रूबरू करवाती हूं....
गम से मिलवा के , खुशियों की पहचान करवाती हूं...
आंसुओ के समंदर में डुबो , हंसी की मोती दिलाती हूं...
दर्द की आवाज में , दुआओं भरे कलमें पढ़वाती हूं....
अरे मैं जिंदगी हूं पगली , तुझे जीने का सलीका सिखाती हूं...
छतीसगढ़, रायगढ़, श्वेता राटेरिया
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