दूसरों के अस्तित्व में स्वंय के अस्तित्व को
तिरोहित कर देना ही हमारी नियती थी,
परंतु आज मैं स्वयं में स्वंय को तलाश रही हूँ,
मेरा स्वंय कहीं खो गया है।
मेरा वजूद पैदा होते सिर्फ मैं नही था ,
तब मैं अपने माता पिता की अनचाही ही सही
परन्तु पिता के नाम से जानी जानें वाली पुत्री थी,
माँ के स्नेह आँचल से बँधी बेटी थी,
बडे बहन भाइयों की छोटी बहन थी,
तब भी मैं कहाँ थी।
अपने लिए जीना और अपने अस्तित्व की पहचान का कभी प्रयास ही नहीं किया,
अपनी इच्छाऐं भावनाएँ जाग्रत ही नहीं हुईं ।
विवाहोपरांत लगा किअब शायद मेरा
अन्तस मेरी स्वंय की तलाश कर लेगा,
परंतु पहले जो बन्धन भावनाओं से बंधे थे
अब वे सामाजिक बन्धन के स्वरुप में और कठोर हो गए ।
माँ बनकर मातृत्व की प्राप्ति से नारी जीवन सार्थक हुआ,
परन्तु आज भी मैं स्वयं को ढूंढ ही रही हूँ और मेरा
ये अन्तहीन सफर कब खत्म होगा मुझे भी नहीं पता ?
चंदन खेमका,
बनारस उतरप्रदेश
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