Saturday, May 28, 2022

आसाम, गुवाहाटी, नीलम चौधरी

 बेटियां करे पुकार..


कुहू- कुहू ! यह किस कोयल की रागिनी है?

जिसने पूरे वातावरण को संगीतमय बनाया है,

यह तो मेरी बेटी का कृंदन है,

जिसने मेरे घर में जन्म लिया है।।


मधुर रस मेरे कानों में वह घोल रही है,

आकर्षण कुछ ऐसा उसमें,

पूरी कायनात को वह मोह रही है।।


गोद में उसे उठाया मैंने,

अंदर तक आत्मा प्रफुल्लित हो गई।

लिपट गई मुझसे वह ऐसे,

जैसे जहां की खुशियां उसे मिल गई।


उसके तन मन की सुंदरता, कुशाग्रबुद्धि ने,

मेरी छाती गर्व से चौड़ी कर दी,

प्रेम और संस्कारों का धन उसके पास,

सीप की चमक उसने चहुं और फैला दी।।

 

एक समय ऐसा भी आया,

बाबुल के घर से उसे विदा होना पड़ा।।

जान से प्यारी बिटिया को,

डोली में बैठाना पड़ा।।


पर ससुराल में भी उस नव परिणीता ने,

स्वयं को सदा अकेला पाया है।    

 दहेज की आग में जलती उसकी लाज,

सब ने उसके आत्मसम्मान को तिल - तिल जलाया  है।।


उफ़ ना  कभी की बेटी ने,

हमेशा मुस्कान के पीछे दर्द छुपाया है।

दुख ने जो भरे उसकी नैनों में आंसू,

कभी मां-बाप के सामने नहीं  छलकाया है।।


अपनों के व्यंग्य बाण से ,

हुआ उसका मन आहत,

जख्मों से भरा शरीर उसका ,

पर डोलने ना दी अपनी हिम्मत।।


पर यह क्या!....


बढ गई लोभियो की हिम्मत,

कर दिया उसे आग के हवाले,

चिल्ला रही वह, पुकार रही वह,

आजा बाबुल ,मुझे बचा ले।


एक डरावना सपने से भी डरावना वह पल,

उन पापियों के सामने ना टल सकता था ,न टला वह पल।।


या खुदा...


क्यों होते देख रहा बेटियों पर 

इतना अत्याचार,

या तो बेटी पैदा करना बंद कर दे,

या दें उसे उसका पूरा अधिकार।।


               

आसाम, गुवाहाटी, नीलम चौधुरी

             

बिहार, जोगबनी, मीना गोयल

 पता है मुझे...

तेरे बिन मैं कुछ नही हूँ

पर मैं सबकुछ होना चाहती  हूँ।।

मैं बिना वजह  हंसती हूं... मैं बिना  समझे बोलती हूं...

इसलिए कि  मैं खुश रहना चाहती  हूँ  ।।

बच्चों सी मासूमियत... मुस्कुराहट.. अपने खोए  बचपन को बचाकर रखना चाहती हूँ ।।

पता है मुझे  ....

मैं अच्छा  नृत्य नही करती हूँ

पर मैं आनंदित हूँ 

बिना ताल  मटकना चाहती हूँ।।

पता है मुझे...मैं सुंदर भी  नही हूँ।

लेकिन फिर भी मैं खुद को 

 संवारना चाहती हूँ।।

पता है अभी... मैं अच्छा नही लिखती  पर मेरा भी मन है... सबकुछ बताना चाहती हूँ।।

मेरे न रहने पर भी जो बाते जिंदा रहे..वो सब भी मैं  लिखना चाहती हूँ।।

किसी वजह से तो सब हंसते हैं...

पर मै बिना वजह  मुस्कुराना चाहती हूँ।।

*मैं कुछ नही हूँ पर सबकुछ होना चाहती हूँ*।।

स्वरचित 

बिहार, जोगबनी, मीना गोयल 

बिहार, बेगुसराय, रेखा खेमका

 *मानवता*


धर्म के नाम पर जान लेने को है तैयार, 

यह भगवान और खुदा से है कैसा प्यार?

मानव बड़ा ही बेशर्म हो गया है,

मानवता से बड़ा अब धर्म हो गया है।


धर्म ही मानव को मानवता का पाठ पढ़ाता है,

स्वार्थ, लालच और विचार हमसे गलत करता है।

धर्म को जाने, कर्म को जाने,

ईश्वर कण कण में हैं पहचाने।

मानवता ही बड़ा धर्म है, आओ मानवता को पहचाने।


मानवता से होगा जग उज्ज्वल,

मानवता में विश्वास रखो।

निर्माण करें हम प्रेम फूलो का,

मानवता को मानव से जोड़ें

मानवता ही बड़ा धर्म है,

आओ दिल से दिल जोड़ें।।


बिहार, बेगुसराय, रेखा खेमका 

उड़ीसा, ब्रह्म पूर, शांति मुदरा

 संस्कार और संस्कृति

आजकल की बहु बेटीया भी गजब ढा रही है , जिस घर में जाकर देखो सब जॉब पर जा रही है .।


सुबह नौ बजते ही वो काम पर निकल जाती है , अपने परिवार लिए भी खाना कहा बना पाती है ।


बच्चे कब स्कुल को जाते है, कब लौंटकर घर को आते है पता तक ना होता है इस बात का ।

बस पैसा कमाना ही उनका मकसद है, परवाह न रहती दिन और रात का  ।


अभी बच्चे तो पल रहे है आया के भरोसे, फिर बड़े होकर चले जाएगे कमाने प्रदेश ।

जिन बच्चो को माँ _बाप का प्यार ही नशीब  नही उन बच्चो को क्या पता होगा, 


संस्कारो और संस्कृति के बारे में विशेष ।

कि, कौन है दादा कौन है दादी कौन है नाना नानी ।

आने वाली हमारी नयी पिढी तो किताबो में ही पढा करेगी संस्कार और संस्कृति की कहानी।


माना कि पैसा जीवन की जरुरत है,पर संस्कार है जीवन का आधार।

अपने बच्चो को संस्कारी बनाओ देकर के परिवार का प्यार ।


उड़ीसा, ब्रह्म पूर, शांति मुदरा 

आसाम, देरगांव शाखा, मनोरमा जैन

रक्त दान


मानव हो, मानवता का चरम रूप धर ।

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


रक्तदान से बड़ा, ना कोई दान है 

रक्तदाता से बड़ा, ना कोई महान है

अपने लहु से बचाता जो औरों की जान है

पुण्यात्मा और पूज्य वह इन्सान है ।

इन्सान हो, इंसानियत का चढ़ जा शिखर 

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


रक्त्दानीयो के जब चलेंगे काफिले

रक्त अल्पता मरीजों की थमेगी मुश्किलें 

दुर्घटना ग्रस्त हज़ारों नव जीवन पाएंगे

तेरा रक्त पा कर फिर से जी जाएंगे ।

मरते हुए में रक्त से फिर से जान भर

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


गरीब या अमीर हो सभी यहाँ समान ।

ज़रुरतमंद कोई हो अपना या पराया

रक्तदानीयों के लिए अपना सारा जहां

रक्तदान से नहीं कोई भी नुक्सान

आगे बढ़ संशय ना कर बना रहे निडर

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर।


कुछ सरफिरें देखो ले रहें निर्दोषों की जान

रक्तदान ललकार तेरी बचालो घायलों के प्राण 

सीमा पर लड़ते प्रहरी देश के खातिर जो क़ुर्बान  

वहां भी रक्तदान यज्ञ से बचेंगे वीरों के प्राण ।

जीवन में कई दान किए अब ये महादान कर

तू रक्तदान कर, तू रक्तदान कर ।


आसाम, देरगांव शाखा, मनोरमा जैन

उत्तरप्रदेश, प्रतापगढ़, संगीता खंडेलवाल

 मैं ख़ुशी कहाँ मिलती!!


एक दिन स्वपन में आई खुशी!!

बोली मैं महलों में नहीं

मंदिर-में नहीं

रामायण, गीता मैं नहीं

महंगे कपड़ो , मोटर-गाड़ी सब लगते मुझे सजावटी

मैं खुशी!!

हर दिल में मैं मिलती

बस मुझे चाहने के लिए बनों सरल व संतोषी

फिर देखो

मैं तो दिन-रात पास में ही रहती

मैं हूं थककर आते पति की चाय की चुस्की

मैं खुशी

बच्चों की मुस्कुराहट में मैं मिलती

अतिथियो के सत्कार से मैं मिलती

बड़ों का आदर,छोटों को प्यार से मैं मिलती

पडोसियों के सुख-दुख में शामिल होने से मिलती..

मैं खुशी

दया, धर्म, मान सम्मान 

मीठे बोल से मैं चहकती

मैं सच्चे दोस्तों मैं महकती 

स्वच्छ व स्वस्थ वातावरण को मैंलुभाती

हरियाली देख नाचती बन मोरनी..

जो अपने दायित्वों में दिखाते ईमानदारी

मैं रहती वहींं जो है मेहनती, सरल, सहज 

‘मैं खुशी बाल मन मैं मिलती !!!!


उत्तरप्रदेश, प्रतापगढ़, संगीता खंडेलवाल


उड़ीसा, बडबिल, डा. रजनीश शर्मा

  पर्यावरण                                                                    

पर्यावरण का अदभुत संगम।                                              

रो-रो  क़र अब कहता है।                                                        

निकल मेरे अतीत पर अब।                                             

जब पादप ,तटनीऔर महीधर                                              

दूध सा झरना बहे अकड़ कर।                                          

लहरें जब इठलाये ,विमल सरिता शरमाए।                        

सघन प्रतिबिम्ब क़ी चादर ओढ़े, वसुन्धरा भी  हरषाये                

नीम का कड़वा दातुन भी तब अपनी धाक जमा जाए।       

बरगद,पीपल और आँवला जन जन-जन में पूजे जाय।                                    

चमकते सूर्य क़ी रश्मि दीप अविरल बन जाए                      

फिर इस आपाधापी में , तकनीकी की आँधी में।                  

ठूँठ हो गये वृक्ष घनेरे, मौन हो गईं धरा ये सारी।                                                                                                                                                 

हे नर शपथ ये दोहराओ,धरा फिर से मह्काओ                                                         

वृक्षों को  बचाते जाओ, नये वृक्ष सजाते जाओ


-उड़ीसा, बडबिल, डा. रजनीश शर्मा  

आसाम, देर गावं, निशा काबरा

हिंदी हैं हम


हिंदी को नई  पहचान दिलाई 

मोदी जी ने,

हिंदी को ऊंचा मुकाम दिलाया

मोदी जी ने,

हिंदी को जन जन तक पहुंचाया

मोदी जी ने,

विश्व में हिंदी का झंडा फहराया 

मोदी जी ने,

भारतवासियों को हिंदी का महत्व समझाया

मोदी जी ने,

हिंदी को राष्ट्र संघ में स्थान दिलाया

मोदी जी ने।


हम भी हिंद के वासी हैं,

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है,

हिंदी को हमसे बहुत आशा हैं,

हिंदी को बढ़ावा देना होगा,

बच्चों को हिंदी सीखना होगा,

हिंदी का आत्मविश्वास जगाना होगा,

हिंदी को निरंतर प्रयोग में लाना होगा,

हिंदी को दिल से अपनाना होगा,

हिंदी की मशाल को जलाना होगा।


हिंदी की मशाल को जलाना होगा।।


 गौ सेवा मातृभूमि की पुकार* 


गौ सेवा है पुण्य महान

गौ सेवा को उत्तम जान,

गौ सेवा भारत की शान

गौ सेवा से सृष्टि जहान।



गौ सेवा मातृभूमि की पुकार,

गौ माता का ना कर अपकार,

गौ माता हैं सृष्टि का आधार,

गौ सेवा से रखो सरोकार।


गौ माता की सेवा करना,

गौ माता की रक्षा करना,

गौ माता की हत्या रोकना,

गौ माता को अपना कहना,

अपने जीवन को पुण्य बनाना।


गौ मूत्र,गोबर से कटते हैं रोग,

गौ सेवा से शरीर रहे निरोग,

गौ सेवा से सुधरेगा परलोक,

गौ सेवा हैं सबसे शुभ संयोग।


गौशाला में हर दिन जाना,

गौ माता के दर्शन करना,

गायों को चारा खिलाना,

गायों के लिए तन धन लुटाना,

अपने कुल का मान बढ़ाना।


 आसाम, देर गावं, निशा काबरा 

महाराष्ट्र, नागपुर, माया शर्मा

 🌹🙏 **माँ** 🙏🌹


जिसके एक नयन में ममता,

एक नयन में करुणा है, 

जिसका हृदय प्यार का सागर ,

प्रभु की वह रचना मां है। 

 

कन  कन में ईश्वर रहता है, 

ये तो हर कोई कहता है।

लेकिन ना किसी ने देखा है,

इसलिए एक अंदेशा है           

 है सर्वत्र व्याप्त ईश्वर,

हर शास्त्र यही तो कहता है।

शायद मां के रूप में ईश्वर हर घर घर में रहता है। 


माता  के तन से ही हमको इस  मानव  तन का दान मिला।

वो देवी है मां जिससे मानव जीवन का वरदान मिला।

मां से सब है,

मां ही रब है,

राग रंग सबमें मां है।

इस नीरस जग में माता,

सरस सलोना झरना है।


 रग रग  मां के वात्सल्य से     सदा प्रफल्लित रहता है, 

शिरा शिरा में प्रेम उसी का रक्त रूप में बहता है। 

मां का त्याग अनोखा है,

मां का हर रूप अनूठा  है।

इस रिश्ते के सच के आगे,

हर रिश्ता लगता बोना है।


इस स्वप्निल संसार में,

मां ही सबसे सुंदर सपना है।

ईश्वर की रचनाओं में 

मां सबसे सुंदर रचना है।


सरस,शहद झरना है

और मां का हर त्याग अनोखा है ,

मां का हर रूप सलौना है।

 संसार कल्पना ईश्वर की, 

मां सबसे श्रेष्ठ कल्पना है।

मां के उपकार अनगिनत है,

 मां जैसा ना कोई दूजा।


मां की सेवा प्रभु की सेवा 

मां की पूजा प्रभु की पूजा।

मां के जैसी बस मां ही है,

मां का सा ना कोई दूजा। 


एहसान चुकाना कब  संभव ? एहसानों को स्वीकार करे।

इस प्रीत  प्रसविनी जननी की सच्चे मन से जयकार करें।



महाराष्ट्र, नागपुर, माया शर्मा

सरिता पालीवाल बाकि मोगरा, छतीसगढ़,

 मां... 

मैं कभी डरी नहीं, 

क्योंकि आप हमेशा साथ हो , 

मेरे इस पंछी मन का , 

आप ही सारा आकाश हो|

जीवन की तपती राहों में , 

आप ठंडी ठंडी छांव हो, 

 दिल ने जिसे मांगा है हर पल, 

 आप मेरी वह चाह हो|

आंचल तेरे दामन का, 

 मेरे सर पर हमेशा बना रहे, 

 तू हमेशा संग मेरे रहना मां, 

साथ भले कोई रहे ना रहे|



 मां तो मां होती है ... 


मां की कोई उपमा नहीं होती .. 

चाहे मेरी मां हो.. 

 या मेरी सासु मां|

*ओर एक छोटे से लम्हें को उठाने के लिए झुकने का मन उनका भी नहीं हुआ....*

*हम दोनों ने सोचा इतनी बड़ी जिंदगी में एक लम्हें के गिरने का क्या वज़ूद....*

*पर धीरे धीरे वो लम्हा फैलने लगा....*

*अपने आगोश में और भी कीमती क्षणों को समेटने लगा....*

*फिर हम दोनों ने खूब कोशिश की उस गिरे हुए एक लम्हें को समेटने की....*

*पर ये क्या उस इकलौते लम्हें ने तो कई छोटे छोटे लम्हों को जोड़कर अपना अलग वज़ूद बना लिया था....*

*जमीन पर गिरकर गहराइयों में अपनी जड़े फैला लिया था....*

*अब वो लम्हा लम्हा नहीं रह था खुद को एक किस्सा बना लिया था....*

*हम दोनों ने फिर लाख कोशिश पर उस लम्हें को समेट नही पाए....*

*फिर से हमारी जिंदगी में उस एक लम्हें को जोड़ नही पाए....*

*रहने को तो अब भी हम दोनों साथ है....*

*पर उस एक लम्हें के गिर जाने का हर पल हमें एहसाह है....*

*तो अपनीजिंदगी में कभी भी किसी लम्हें को छोटा मत समझना*

*गिरे हुए लमहों को समेटने के लिये उठना पड़े या फिर झुकना पड़े देर मत करना....*

*वरना होगा तो कुछ नहीं..... बस दो लोगों के बीच वो गिरा हुआ पल अपना वजूद बना जाएगा....*

*और क्या होता है जिंदगी से किसी एक क्षण का भी बिछड़ना आप को सीखा जाएगा....*



छतीसगढ़, बाकि मोगरा, सरिता पालीवाल 

छत्तीसगढ प्रदेश, बांकी मोगरा, संतोष अग्रवाल

 🌺माॅ अकेली ही काफी है


हजारो फूल चाहिए एक माला  पिरोने के लिए 

हजारो दिपक चाहिए एक 

थाली सजाने के लिए 

मां अकेली ही काफी है बच्चो की जिन्दगी को सुरक्षित बनाने के लिए।

हम भूल जाते है हमारी सारी जिन्दगी की परेशानियां 

जब हमारी मां अपने आंचल मे हमारा सर रख लेती है।

चलती फिरती आखों से हमे देखती है पहाड़ो जैसी कठिनाईया झेलती है 

सख्त राहों मे भी आसान सफर बनाती है। 

कभी खिलौने से खिलाया है

कभी आंचल मे छुपाया है 

मां मुझे अंगुली पकड़कर लिखना सिखलाया है  

मुझे आगे  बढना सिखलाया है 

अपनी प्यार भरी आखों से सहलाया है 

गलतियां करने पर भी मां ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है। 

लेकिन मां मेरी मुझ को हमेशा अपने सीने से लगाया है। 

मुझ में तेरी ही आंचल की खुशबू है माॅ 

ममता के आंचल मे बढा पला 

कामों की गढरी कंधो पर लादे 

कभी नही उफ्फ करती है माॅ 

मां बच्चो की चिन्ताओं का साझेदारी है मां ही सब है 

मां ओ मां अपने आंचल मे रखना मां

मां अकेली ही काफी है

मां अकेली ही काफी है



पर्यावरण से है जीवन इसे अपना हम सफर बनाना है

🌴मेरा मन भी घबराता है, दर्द मुझे भी होता है।

अब थोड़ी मुझ पर दया कर, बहुत कम बचे वृक्ष धरा पर।

🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे। 


🌴हरे है वन-उपवन जब तक, सुरक्षित है जीवन तब तक |

बड़ रहा ताप धरा का, पिघल रही हिमनद ये सारी | 

मै बादल को खींच लाता, अच्छी लगती बरसात मुझे |

🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे। 


🌴वृक्ष बिना जीवन सूना, सूना है घर आंगन 

देता हूं छाया अपनी, फल फूल से भरता हूं दामन

🌴टुकडों मे मत बाँट मुझे,अब रहने दे मत काट मुझे। 

पर्यावरण से है जीवन इसे अपना हम सफर बनाना है। 


छत्तीसगढ प्रदेश, बांकी मोगरा, संतोष अग्रवाल

झारखंड, गिरिडीह, तुलिका सरावगी

 मातृ दिवस पर विशेष 

बच्चो के मुख से

आज मेरा 6 साल का पोता अद्वित मेरे पास खेल रहा था, 

खेल खेल में मैने उसे पुछा, बेटा बडे होकर तुम क्या बनोगे!!!!

उसने बडे मासूमियत से हाजिर जवाब दिया

 '''''कुछ नहीं बनूँगा, मै बडे होकर आराम करूँगा। 

मैने बहुत विस्मित होकर पुछा ''

''क्यूँ ?

तो उसने पुन: जवाब दिया: क्यूँकि अभी तो मुझे आराम करने का वक्त ही नहीं मिलता,

सुबह से मेरी मम्मा मुझे स्कूल फिर ट्यूसण,

डांस टीचर ड्रॉइंग टीचर आ जाते हैं और मै थक जाता हूँ,

एक मिनट भी आराम करने का वक्त ही नहीं मिलता।

बाल सुलभ मुख से सहज भाव से बोली बाते मेरे हृदय को छू गई।


 झारखंड, गिरिडीह, तुलिका सरावगी 

8th May 2022

झारखंड, चाकुलिया, लता लोधा

माँ की महिमा 

माँ की महिमा सबसे न्यारी 

दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती बनकर घर मे प्रकाश फैलाये 

माँ की शक्ति बड़ी निराली हर आंगन महकाये

माँ बहन पत्नी बनकर, घर मे अपने प्यार बरसाये । 


सबका ध्यान रखे तनमन से घर आंगन को महकाये।

नारी शक्ति बनके  जनजन मे जाग्रति फेलाये ।

हर जुग हर क्षेत्र मे नारी ऐसा काम करे 


इसलिए माॅ आदि शक्ति कहलाये, 

प्यार भरा घर संसार बनाये 

माॅ की गरिमा सबसे न्यारी 

माॅ की महिमा सबसे प्यारी ।


झारखंड, चाकुलिया, लता लोधा 

झारखंड, जमशेदपुर, पुष्पा संगी

 किताब

 

गुरुओं की गुरु है यह,

आचार्यों की है आचार्य।

हर एक को दिया है ज्ञान,

चाहे आर्य हो या अनार्य।


जीवन मार्ग करती है प्रशस्त

टूटता मनोबल करती है सशक्त,

अज्ञान के तम में दिया है,

भ्रांति को यथार्थ सेजिया है।


रूढ़िवादी दासता से दिलाती है मुक्ति,

कैसी भी हो उलझन, देती है युक्ति।


फूलों सी कोमल ता, इत्र सा पसराव।

बूझो तो कौन???


जीवन की सच्ची साथी किताब मैं किताब।


झारखंड, जमशेदपुर, पुष्पा संगी

झारखंड, जमशेदपुर, ऋतू नागेलिया

 ✏️ मां

आज सपने में मां आई थी

बोली कुछ नहीं बस मुस्कुराई थी

सोचा अपनी आपबीती सुनाऊं

जीवन की उथल पुथल बतलाऊं


जब तुम पास थी मेरे , मैं तुम्हें समझ नही पाई

आज जब खुद मां बनी ,तब तुम्हारी याद आई


कैसे करती थी तुम मुझे भी सिखाना

खुद को भुला कर जिंदगी बिताना

बच्चों की परवरिश मां का फर्ज होता है

आज समझी कि वो एक कर्ज होता है


अब मुझे भी ये कर्ज चुकाना है

अपने बच्चों के सुखद भविष्य का आधार बनाना है


जानती हूं कभी तुम अब वापस नही आओगी

मुझसे तो बस अब सपनों में ही मिल पाओगी

पर वो मां है सब जान गई

बेटी का दर्द पहचान गई


फिर माँ ने मुझको गले लगाया

तो इस बात पे यकिं आया 

कि दुनिया में इतना सुकून कहीं नहीं है

अगर स्वर्ग है कहीं तो बस यहीं है यहीं है 💔😞🤱


झारखंड, जमशेदपुर, ऋतू नागेलिया 

महाराष्ट्र , अकोला, सोनिया चेतन

 माँ की दहलीज



आज भी छोड़ते वक़्त दहलीज माँ की, धड़कने बढ़ जाती है।

वो पहली विदाई हुई थी , हर बार याद आ जाती  है।

वो आँचल की छाँव, फिर से धूप बन जाती है।

वो अल्हड़ सी बचकानिया, जो वहाँ छुपा कर रखती हूं।

वो छूकर तेरे आँगन को,फिर से जिंदा हो जाती है।


बस तू ही समझती है कि, मुझमें बचपना अभी भी बाकी है

वरना उस दहलीज़ पर जाकर तो, ये बच्ची बड़ी हो जाती है।


हर फरमाइश खुल जाती है, इस जुबान पे जो जो अटकी है।

जाने कैसा नाता है, बिन कहे तू समझ जाती है


महाराष्ट्र  , अकोला, सोनिया चेतन


झारखंड, जमशेदपुर, बबिता भावसिंहका

 मेरी सहेलियां 


कितनी प्यारी होती है सहेलियां, कितनी अनोखी होती है सहेलियां । 

हर रोज सहेलियों से मिलने का बहाना ढूंढा करते थे,

कहा गए वो दिन ...आज भी हम अपनी सहेलियों को ढूंढा करते है। 


मां बहन दादी चाची से जो बात बताने में कतराते थे। 

कितनी आसानी से यह बात अपनी सहेलियों से कह पाते थे। 

बचपन के सहेलियां आज भी याद आती है...

जब कभी आंखें बंद करूं तो वही बातें याद आती है।   

कब एक एक करके बिछड़ते चले गए,

पत्नी भाभी चाची आंटी न जाने क्या क्या कहलाने लग गए।


बचपन कब बीत गया सहेलियों वाला शब्द भूलते चले गए । 

आज भी सहेलियों के लिए दिल का एक कोना खाली है... 

कितनी याद आती है जब एक साथ हम खेला करते थे। 

कहा गया वो बचपन जो हर वक्त सहेलियों को ढूंढा करते थे।


कितनी प्यारी होती है सहेलियां , कितनी अच्छी होती है यह सहेलियां।।।

सारी सहेलियों को समर्पित।



झारखंड, जमशेदपुर, बबिता भावसिंहका 

झारखंड, जमशेदपुर, मीना अग्रवाल

 "" जिंदगी ""


जिंदगी से बड़ी, कोई सजा ही नहीं,

और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं।

इतने हिस्सों में ,बट गई हूं मैं ,

मेरे हिस्से में तो , कुछ बचा ही नहीं ।

जिंदगी से बड़ी  ,कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं ।

चाहे सोने के फ्रेम में , जड़ दो ,

"आईना" झूठ , बोलता ही नहीं ।

जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है, कुछ पता ही नहीं ।

धन के हाथों , बिक गए हैं सभी ,

अब किसी जुल्म की , कोई सजा ही नहीं ।

जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है , कुछ पता ही नहीं ।

सच घटे या बड़े, तो सच-सच ना रहे ,

"यारो" - झूठ की तो कोई ," इंतेहा " ही नहीं, इंतेहा ही नहीं 

जिंदगी से बड़ी , कोई सजा ही नहीं ,

और क्या जुल्म है ,कुछ पता ही नहीं ।। 


झारखंड, जमशेदपुर, मीना अग्रवाल 

झारखंड, जमशेदपुर,संगीता मित्तल

 *किरदार*


*मेरी निष्ठा,मेरे समर्पण के इजहार से खुशबू आये।*

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।*


 बातें करती हूँ सबसे मुस्कुरा के मगर।

दिल से किसी की बात को लगाया नहीं मैनें !।


चल रही हूं मैं दुनिया के उसूलों पर मगर ।

 ईमान कभी अपना डिगाया नहीं मैनें।।


गलतियाँ भी हुई है मुझ से बहुत सी मगर।

 किसी और को ज़िम्मेदार कभी ठहराया नहीं मैनें!।


खुशियॉं चुराकर किसी और के दामन से।

क़िस्मत को कभी अपनीं  सजाया नहीं मैनें !।


किसी का साथ मिले ना मिले ।

पर ख़ुद को सफर में थकाया नहीं मैनें !।


  दोस्त बहुत से हैं मेरे इस ज़माने में।

 दोस्ती का रिश्ता दिल से निभाया है मैनें!।


दिल में कुछ और जुबॉं पे कुछ और।

जीने का ये सलीक़ा कभी अपनाया नहीं मैनें !।


भले ही ना दी हो खुशियॉं  किसी के लबों को।

पर किसी की आँखों को  भिगोया नहीं मैनें!।


सुख, दुख के पल हों ,या उदासी के भंवर।

ख़ुद पर से विश्वास कभी हटाया नहीं मैनें !।



*दिल से लिखे इस हर एक अशआर से खुशबू आये*।

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।।*


"*किरदार*


*मेरी निष्ठा,मेरे समर्पण के इजहार से खुशबू आये।*

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।*


बातें करती हूँ सबसे मुस्कुरा के मगर।

दिल से किसी की बात को लगाया नहीं मैनें !।


चल रही हूं मैं दुनिया के उसूलों पर मगर ।

ईमान कभी अपना डिगाया नहीं मैनें।।


गलतियाँ भी हुई है मुझ से बहुत सी मगर।

किसी और को ज़िम्मेदार कभी ठहराया नहीं मैनें!।


खुशियॉं चुराकर किसी और के दामन से।

क़िस्मत को कभी अपनीं सजाया नहीं मैनें !।


किसी का साथ मिले ना मिले ।

पर ख़ुद को सफर में थकाया नहीं मैनें !।


दोस्त बहुत से हैं मेरे इस ज़माने में।

दोस्ती का रिश्ता दिल से निभाया है मैनें!।


दिल में कुछ और जुबॉं पे कुछ और।

जीने का ये सलीक़ा कभी अपनाया नहीं मैनें !।


भले ही ना दी हो खुशियॉं किसी के लबों को।

पर किसी की आँखों को भिगोया नहीं मैनें!।


सुख, दुख के पल हों ,या उदासी के भंवर।

ख़ुद पर से विश्वास कभी हटाया नहीं मैनें !।


*दिल से लिखे इस हर एक अशआर से खुशबू आये*।

*मैं चाहती हूं कि मेरे किरदार से खुशबू आये।।*



झारखंड, जमशेदपुर, संगीता मित्तल

झारखंड, साहिबगंज, रेनू तमाखुवाला

संस्कार


 इंसान अपने जीवन में पैसे के महत्व को इतना बढ़ा लिया है कि बाकी चीजे उसके लिये महत्वहीन हो चुकी हैं. अच्छे संस्कार से बच्चे का चरित्र निर्माण होता है. इससे बच्चा जीवन में सफलता पाता है. बुढ़ापे में माता-पिता की सेवा करता है. दान-पूण्य, जरूरत मंदों की मदत करता है. संस्कार अच्छे होने से मनुष्य के विचार सकारात्मक होते है. जीवन में हार, दुःख, कठिनाई होने के बावजूद भी आप निराश नही होते है. आप वही आचरण करें, जैसा आप अपने बच्चे से चाहते है.


सन्तान न हो तो पूरे जीवन में सिर्फ एक दुःख होता है,

संतान संस्कारविहीन हो तो पूरा जीवन ही दुःख होता है.


जिनके संस्कार अच्छे होते है,

वो किसी का दिल नही दुखाते है,

चाहे प्यार में हो या मजाक में हो.


जो बच्चों को सिर्फ पैसा कमाना सिखाते है,

वही माँ-बाप बुढ़ापा अकेलेपन में बिताते है. 


झारखंड, साहिबगंज, रेनू तमाखुवाला 

झारखंड, जमशेदपुर, किरण देबुका

 माँ

माँ सबसे अटूट रिश्ता !! 

एक रिश्ता जिसमें माँ को कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं 

बस वो आँखें पढ लेती है !! 

ज़िंदगी के हर मोड़ पर माँ ने मुझे आगे बडना सीखाया !! 

हर लड़ाई को positive mind के साथ लड़ना सीखाया !! 

हिम्मत ना हारना बस बेटा तू मेहनत कर !! 

गलती पर डाँटना!! घर को संवारना !! 

हर एक activity में मुझे involve करना सीखया!! 

Love, concern n affection की तो वो एक मूरत थी!! 

माँ तू आज नहीं है!! पर तेरी परवरिश मेरे साथ हमेशा रहेगी!! 

I love you maa!! We all miss u a lot maa!!  MAA 🙏❤️ 


झारखंड, जमशेदपुर, किरण देबुका 

झारखंड, हजारीबाग, श्वेता सेठी

 *नारी*

*नारी हूं मैं नारी हूं*, सबकी मैं आभारी हूं।

घर सम्भालू तो  संसारी हूं, जो व्यापार संभालू तो व्यापारी हूं।

कुदरत की सर्वश्रेष्ठ कलाकारी हूं, हर बात की रखती जानकारी हूं।

मैं हर घर में खुशियों की किलकारी हूं।

*नारी मैं हूं मैं नारी हूं* ।

       हर गम को भुला दूं मैं हँसती  हँसती, मुझसे ही घर में खुशियां बस्ती।

कभी अबला तो कभी आदिशक्ति, ऐसी है हमारी कुछ अभिव्यक्ति। 

*नारी हूं मैं नारी हूं*, सबकी मैं आभारी हूं।

*धन्यवाद*


झारखंड, हजारीबाग, श्वेता सेठी

झारखंड, रांची, सरोज गर्ग रत्नप्रभा

 तू जननी है

स्वयं को आंकती क्यों कम है?

यूं दीन हीन लाचार बनकर

थर-थर कांपती क्यों है?


बन रणचंडी तांडव मचा

कर मर्दन शत्रु  (बलात्कारी)का

रूप धर काली का

ले खड्ग हाथ में

अंत कर दुराचारी का...


बन दामिनी टूट शत्रु पर

इतिहास तभी रच पाओगी

*_बन  स्वयंसिद्धा_*

 फिर अनगिनत बालाओं की

प्रेरणा तुम बन जाओगी...


दिन बहुरेंगे तेरे भी फिर

आसमान से सूरज- चांद- तारे भी

नई रोशनी बरसाएंगे;

कलरव करते पंछी भी फिर

गीत नया गुनगुनाएंगे,

देखना फिर मुरली वाले मोहन भी

आसमान में मुस्काएंगे...!!!



झारखंड, रांची, सरोज गर्ग रत्नप्रभा

 

कृष्णा सुल्तानिया, सरीइंदेला, झारखंड

 आज की शाम 


आज फिर से  जवानी   दिवानी हुई

देख कर ज़ाम महफ़िल रुमानी  हुई


चाहता था जिसे आज याद आ गई

दिल में हलचल मचा तो सुनामी हुई


शाम होती गई दिन ढला जब सनम

ज़ाम   हाथों  चढ़ा  बे  जुबानी  हुई 


आशिकी  में हमारे  कहीं  थी  कमी

चाह  कर  भी नहीं  ये  सुहानी  हुई


सुन सहज अब नहीं है कहीं आसरा

तार  दिल  की  बहुत ही  पुरानी हुई..


"आज की शाम 

आज फिर से जवानी दिवानी हुई

देख कर ज़ाम महफ़िल रुमानी हुई


चाहता था जिसे आज याद आ गई

दिल में हलचल मचा तो सुनामी हुई


शाम होती गई दिन ढला जब सनम

ज़ाम हाथों चढ़ा बे जुबानी हुई 


आशिकी में हमारे कहीं थी कमी

चाह कर भी नहीं ये सुहानी हुई


सुन सहज अब नहीं है कहीं आसरा

तार दिल की बहुत ही पुरानी हुई"


कृष्णा सुल्तानिया  

सरीइंदेला,  झारखंड

 

पश्चिम बंगाल, मिड डटाउन, सीमा अग्रवाल

 *धारावी*


महाराष्ट्र के मुंबई में एक जगह है धारावी,

बाशिंदों पर बेबसी ,भ्रष्टाचारी गरीबी है हावी,

आते हैं विदेशी उठाते हैं लुप्त लाचारी का,

रुपए देकर करते हैं भ्रमण गली गलियारों का,

दस बाय दस के कमरों में रहते हैं लोग दस दस,

दरिद्रता और दयनिता 

की मिसाल है वे लोग बस,

ड्राइंग रूम डायनिंग रूम और बाथरूम का देखते वो सपना,

दो जून की रोटी मिल जाए, भरे पेट परिवार और अपना,

धंधा करते हैं कभी ड्रग्स, गांजा और अफीम का,

चोरी करते हैं कभी कार ,बस और लोरी का,

उन्हीं मे पैदा होते हैं कुछ इमानदार कुछ दो नंबरी,

नहीं रुकती सुबह_ शाम ,दिन_ रात मुंबई मायानगरी,

दुनिया की सबसे बड़ी बस्ती, है दस लाख की आबादी,

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई है सभी को आजादी,

स्लमडॉग, गली बॉय बना कर पूरा करते मकसद,

कभी फिल्मफेयर कभी ऑस्कर कमाते करोड़ों नकद।


– पश्चिम बंगाल, मिड डटाउन,

सीमा अग्रवाल

झारखंड, खाटरस गढ़, प्रियंका चौधरी

औरत

इस युग में कृष्ण का

    इन्तजार मत कर द्रौपदी

घोर कलयुग की है 21वीं सदी

    आसुं से नहीं अंगारों से

   अपनी आंखें  भरनी है ।

कृष्ण के भेष में

     दुस्शासन घात लगाएं हैं

जिनसे आशा है हमको

     वह ईमान बेच कर बैठे हैं।

शस्त्र उठालो द्रौपदी

     नहीं और कुछ कर सकती

मेहंदी से नहीं

    तलवारो से  श्रृंगार करो

तुमको ही देने होगे

     अपराधियो को सजा

इस युग में जीना हैं

    तो स्वालम्बी बनो ।


झारखंड, खाटरस गढ़, प्रियंका चौधरी  

उड़ीसा, बरगढ, सरोज अग्रवाल

 *आखिर जीत गई मां की ममता*

 

हर बार मुश्किल है, पहाड़ बनकर सामने आई।

हर बार लगा मानो, हर सांस मेरी आखरी सांस है आई।

लेकिन हर बार, मां की ममता ही जीत पाई।


कभी बच्चों ने हैं, आंसू को छिपा मुझे खूब हंसाया।

तू कभी मैंने आंसू के हर घूंट पीकर साहस दिखाया।

लेकिन हर बार मां की ममता ही जीत पाई।


बच्चों के लिए ,जिंदगी से कुछ सांसे उधार मांगी।

हर सांस ,हर पल को अनमोल बनाया।

आखिर मौत को भी मात दे, मां की ममता ही जीत पाई।


*संघर्ष को विराम दे, वात्सल्य ने विजय पाई* 


उड़ीसा, बरगढ, सरोज अग्रवाल  

झारखंड, चाकुलिया, रीना केडिया

 एक भारत श्रेष्ठ भारत


क्या झारखण्ड, क्या बंगाल, क्या उत्तराखंड |

जब खड़ा हर एक भारतवासी अखंड |


नेताओं, बस करो! अब न फैलाओ सांप्रदायिक दंगे, 

याद रखो! हम सब हैं एक ही मालिक के बन्दे |


यूँ न फैलाओ चहुँ और वैचारिक लड़ाई, 

आखिर यह तो है भारत के लिए दुखदायी |


कुछ तो सबक लो- देख लो रूस और यूक्रेन की जंग, 

हर तरफ आज हो रहा बस दमन ही दमन |


याद करो इतिहास को- जब रफ़ी चाचा भी दिवाली मानते थे, 

राधा भी ईद की सेवइयां खाती थी | 

हमारी भारत माँ सोने की चिड़िया कहलाती थी |

..... सोने की चिड़िया कहलाती थी ||


एक भारत श्रेष्ठ भारत


क्या झारखण्ड, क्या बंगाल, क्या उत्तराखंड |

जब खड़ा हर एक भारतवासी अखंड |


नेताओं, बस करो! अब न फैलाओ सांप्रदायिक दंगे, 

याद रखो! हम सब हैं एक ही मालिक के बन्दे |


यूँ न फैलाओ चहुँ और वैचारिक लड़ाई, 

आखिर यह तो है भारत के लिए दुखदायी |


कुछ तो सबक लो- देख लो रूस और यूक्रेन की जंग, 

हर तरफ आज हो रहा बस दमन ही दमन |


याद करो इतिहास को- जब रफ़ी चाचा भी दिवाली मानते थे, 

राधा भी ईद की सेवइयां खाती थी | 

हमारी भारत माँ सोने की चिड़िया कहलाती थी |

..... सोने की चिड़िया कहलाती थी || 


झारखंड, चाकुलिया,  रीना केडिया

झारखंड, सरायकेला, रेखा सेकसरिया

 स्वच्छ पर्यावरण

आओ हम सब मिलकर पेड़ लगाएं

 सड़क किनारे छायादार बनाएं

खाली स्थानों पर पौधे लगाकर

पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं

नदियों में कचरा ना डालें

पानी स्वच्छ बनाएं

ऑटो रिक्शा एवं कार की जगह

साइकिल प्रयोग में लाएं

आओ हम सब मिलकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं

डिस्पोजल एवं प्लास्टिक का प्रयोग बंद कर हम

पत्तल एवं मिट्टी के बर्तन प्रयोग में लाएं

 इन सब चीजों का प्रयोग कर हम

धरती मां को स्वच्छ बनाएं

आओ हम सब पर्यावरण बचाएं


झारखंड, सरायकेला, रेखा सेकसरिया 

झारखंड, धनबाद, संजू डालमिया

 देश की शान "मजदूर"


कठोर परिश्रम के बल पर अपने

कठिन कर्म भी आसान करें वो

पथ की हर बाधा दूर कर हो अग्रसर

दुनिया में मज़दूर कहलाएँ वो 

रात दिन की परवाह किए बिना

लक्ष उनका मेहनत के बल पर 

मिट्टी से भी सोना उगा लेना 

मेहनत से इज्जत की दो वक्त की रोटी कमाएँ वो

दुनिया में मज़दूर कहलाएँ वो

अपनी जान जोखिम में डाल

सबके सपने साकार करता वो

खुद रूखी-सुखी खाकर रहता

सबके जीवन में ख़ुशियाँ लाए वो

दुनिया में मज़दूर कहलाएँ वो


झारखंड, धनबाद, संजू डालमिया 

झारखंड, चाकुलिया, पुष्पा रूंगटा

 ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि  पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश "कल" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


 झारखंड, चाकुलिया, पुष्पा   रूंगटा

श्वेता राटेरिया रायगढ़, छतीसगढ़,

जिन्दगी एक पहेली.....

कल अचानक से उससे मुलाकात हो गई , जिससे शिकायते बहुत थी उसी के तर्क पर निसार हो गई.....

चली जा रही थी वह गुनगुनाते हुए , मुझे देखा तो रुकी मुस्कुराते हुए..,.

मैंने पूछा कैसी पहेली हो तुम , कभी समझ ना आती हो....

खुद ही चोट देती हो , खुद ही इस पर मरहम लगाती हो....

कभी खुशियों की रास्ते पर ले जाकर , दर्द की मंजिल पर छोड़ आती हो....

तो कभी सपनों के शहर ले जाकर हकीकत से रूबरू करवाती हो....

कभी इतना हंसाती हो , कि जन्नत सी हसीन लगती हो....

कभी इतना रुलाती हो , की जहानुम सी गमगीन लगती हो....

मेरे सवालों पर खिलखिला उठी वह बोली , तू मुझे समझ ना समझ मैं तेरी सारथी हूं...

तेरे लड़खड़ाते कदमों को थाम , तेरी उंगली पकड़ तुझे चलना सिखाती हूं...

खुदा की बनाई पूरी कायनात से , तुझे रूबरू करवाती हूं....

गम से मिलवा के , खुशियों की पहचान करवाती हूं...

आंसुओ के समंदर में डुबो , हंसी की मोती दिलाती हूं...

दर्द की आवाज में , दुआओं भरे कलमें पढ़वाती हूं....

अरे मैं जिंदगी हूं पगली , तुझे जीने का सलीका सिखाती हूं...


छतीसगढ़, रायगढ़, श्वेता राटेरिया 

मध्यप्रदेश, खरगोन, कीर्ति जैन अनुराग जैन

 विषय - मुखौटा



आज हर इंसान ने पहना है मुखौटा 

कभी गम का मुखौटा

कभी झूठी खुशी का मुखौटा

आज सामने जो मित्र हैं कल वो कोन सा पहनेगा मुखौटा

अभी चुनावी मैदान में सभी नेता पहनेगे मुखौटा

अक्सर रिश्तेदार भी हमारी मदद के लिए पहन लेते है मुखौटा

आज हम पहचान भी नहीं सकते है उन लोगों को जिन्होंने पहने है मुखौटा

गुजारिश है मेरी सभी से 

अपने चेहरे से कब हटाओगे ये मुखौटा,

बहुत देख लिया सब को अब तो इंसानियत का पहन लो मुखौटा



पानी से जीवन


पानी से बने सब का जीवन

 सुंदर सपन सलोना ।

पेड़ पक्षी या हो मानव 

पानी को व्यर्थ ना बहाना ।

पानी की कीमत समझो 

एक एक बूंद है सोना ।

जितनी जरूरत उतना ले लो

 इसको व्यर्थ ना खोना ।

कोई मालामाल है 

कोई बूंद-बूंद को तरसे।

 एक कुआं इस गांव में 

वह भी गर्मी से सूखा।

 नल की लाइन ना आई 

त्राहि-त्राहि मची गांव में ।

वोट मांगने आए नेता 

जीत के वादे को भूला ।

पानी की कीमत के संग में 

इंसानों की कीमत समझो ।

तुम तो भर भर टंकी फेंको 

वह तो मांगे बस एक लोटा ।

पानी से बने सबका जीवन 

सुंदर सपन सलोना ।

पेड़ पक्षी या हो मानव

पानी को व्यर्थ ना बहाना।


मध्यप्रदेश, खरगोन, कीर्ति जैन अनुराग जैन


बिहार मुजफ्फरपुर, अर्चना सिंघानिया

 राष्ट्र चेतना


राष्ट्र हमारा गौरवशाली

वंदन इसको हम करते हैं,

इसके वैभव का गुणगान

हर वृक्ष के पत्ते भी करते हैं।


इसकी लाज बचाने को

हमारे वीर सतत सजग रहते हैं,

भारत माता की पावन मिट्टी को

शत्- शत् नमन हम करते हैं।


धन्य भाग्य हमारे जीवन के

इस अद्भुत धरती पर हम जन्में हैं,

अपनी इस जननी की खातिर हम

हर पल जान न्योछावर करते हैं।


बिहार मुजफ्फरपुर, अर्चना सिंघानिया 

९३०८८४१०७१

Friday, May 13, 2022

पुष्पा रूंगटा, चाकुलिया शाखा, झारखण्ड

 "गौ संरक्षण 


ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश ""कल"" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


पुष्पा रूंगटा

चाकुलिया शाखा

( झारखण्ड )"

Tuesday, May 3, 2022

पुष्पा रूंगटा चाकुलिया शाखा झारखण्ड

 "       गौ संरक्षण     

                       

ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि  पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश ""कल"" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


पुष्पा   रूंगटा

चाकुलिया शाखा

झारखण्ड 

सरोज अग्रवाल, बरगढ़, उड़ीसा

 *आखिर जीत गई मां की ममता*

 

हर बार मुश्किल है, पहाड़ बनकर सामने आई।

हर बार लगा मानो, हर सांस मेरी आखरी सांस है आई।

लेकिन हर बार, मां की ममता ही जीत पाई।


कभी बच्चों ने हैं, आंसू को छिपा मुझे खूब हंसाया।

तू कभी मैंने आंसू के हर घूंट पीकर साहस दिखाया।

लेकिन हर बार मां की ममता ही जीत पाई।


बच्चों के लिए ,जिंदगी से कुछ सांसे उधार मांगी।

हर सांस ,हर पल को अनमोल बनाया।

आखिर मौत को भी मात दे, मां की ममता ही जीत पाई।


*संघर्ष को विराम दे, वात्सल्य ने विजय पाई* 


सरोज अग्रवाल, बरगढ़, उड़ीसा 

7749013516"

रानी अग्रवाल, जमशेदपुर शाखा झारखंड प्रदेश

 "दर्द मजदूरों का


सिर पर बोझ पांव में छाले।

 इनके घर में रोटियों के लाले।।

 जुल्मों का बोझ भी संग में उठाते।

 मजदूरी के बाद भी आधा पेट भोजन पाते ।।

मजदूर थे ,मजदूर हैं ,मजदूर ही रह गए।

  मजबूरी के कारण हजारों सितम सह गए।।

बदल गया जमाना तुम भी बदल जाओ न।

 मजदूरों का समझो दर्द।

 ""औ"" हमदर्द बन जाओ न।।


रानी अग्रवाल जमशेदपुर शाखा झारखंड प्रदेश 9708557661

पुष्पा रूंगटा, चाकुलिया शाखा, झारखण्ड

 


"       गौ संरक्षण     

                       

ना काटो बैलों को मानव ,

कि धरती टूट जाएगी !

ये नन्दी वाहन है शिव का ,

कि भगवान रुठ जाएंगे !

ना काटो बैलों को मानव !!


समर्पण है स्वभाव इनका ,

परिश्रम की मिसाल है ये !

ये संगी साथी मानव का ,

ये जीने का भी सहारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


है गोवंश धरती पर वरदान ,

किया ऋषियों ने इनका गान !

है गोबर गौमूत्र सर्वोत्तम ,

कि  पूजन योग्य माना है !

ना काटो बैलों को मानव !!


जूड़ा इनसे हमारा कर्म ,

जूड़ा इनसे हमारा धर्म !

तो जोड़ें क्यूं ना अपना मन ,

ये गौवंश ""कल"" हमारा है !

ना काटो बैलों को मानव !!


 पुष्पा   रूंगटा,  चाकुलिया शाखा, झारखण्ड

                 

प्रियंका चौधरी कटरस गढ़, झारखंड

 "अपगंता

मैं अपंग हूं

मेरी अपंगता पर मैं विवश हूं

पर मैं उड़ना चाहती 

चलना दौड़ना चाहती हूं।

पर मैं अपने पैरों से विवश हूं

समाज भी मुझे

 अपाहिजता का बोध करातीहैं

मैं आगे बढ़ना चाहती हूं 

पर दुनिया मुझे नकारा समझ कर

अंधकार में  धकेलना चाहती

मैं इस अंधकार से निकल कर 

स्वतंत्र जीवन जीना चाहती हूं

मुझे भीख नहीं

आगे बढ़ने की राह दिखाओ

मुझे सहारा नहीं

मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाओ

मैं स्वतंत्र होकर

दुनिया में घूमना चाहती हूं

मेरी अपंगता पर मुझे

विवशता का एहसास मत कराओ।।



____________________ ___  _________________





औरत

इस युग में कृष्ण का

    इन्तजार मत कर द्रौपदी

घोर कलयुग की है 21वीं सदी

    आसुं से नहीं अंगारों से

   अपनी आंखें  भरनी है ।

कृष्ण के भेष में

     दुस्शासन घात लगाएं हैं

जिनसे आशा है हमको

     वह ईमान बेच कर बैठे हैं।

शस्त्र उठालो द्रौपदी

     नहीं और कुछ कर सकती

मेहंदी से नहीं

    तलवारो से  श्रृंगार करो

तुमको ही देने होगे

     अपराधियो को सजा

इस युग में जीना हैं

    तो स्वालम्बी बनो ।


प्रियंका चौधरी कटरस गढ़, झारखंड