Saturday, April 30, 2022

कविता शर्मा चाईबासा झारखंड

 "नारी


जमाना बदला है दौर बदला है।

महिलाओं का हक और हौसला बदला है।

नहीं अब नारी किसी के आधीन।

अपने लिए जीना अपनी खुशी के लिए लड़ना 

वर्तमान युग की नारी की है पहचान.


बहुत कुछ बदला बहुत बदलना अभी बाकी है

संकुचित विचार संकीर्ण मानसिकता अब भी नारी को जंजीर से जकड़ी है.


जिस सम्मान और अधिकार की हकदार है

वह मिलना अभी बाकी है.


दूर है मंजिल अभी मीलों का सफर बाकी है.

स्वयं के अधिकारों के प्रति सजगता.

स्वयं के हित के लिए लानी होगी जागरूकता"


-कविता शर्मा चाईबासा झारखंड

मंजुला भूतड़ा इन्दौर, मध्यप्रदेश,

 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏

*जय जय श्री राम हो*


राम मंदिर का सपना,

हुआ है साकार।

मिल गया सबको,

मनचाहा  उपहार।


जागे हैं जब शासक,

तब इतिहास हिला।

बहुत प्रयासों के बाद,

रामलला का द्वार खुला। 


जिनका जीवन महान,

मर्यादा का विधान।

त्यागपूर्ण जीवन,

देते सबको अधिकार समान।


पटाक्षेप हुआ है,

वर्षों की बहस का।

आया शुभ मुहूर्त,

निर्माण शुभारंभ का।


कितनी तारीखें तय की,

रामलला को न्याय की।

रामलला तारीख तय करेंगे,

तो होगी मुश्किल सबकी।


हैं हम सौभाग्यशाली,

बने हैं प्रत्यक्षदर्शी।

सारे भक्तों में आल्हाद, 

छाई है अनुपम खुशी।


वैसे न्यायालय ने दी है,

 जिन्हें अनुमति।

वाकई में छबि तो उनकी,

 हर मन में बसी।


रामजी स्वयं एक मंत्र हैं, स्वतंत्र हैं,

 समझ सकें तो वे स्वयं लोकतंत्र हैं।

जिनकी अदालत में होता सबका

न्याय,

किसी के पास है कहां राम का पर्याय।


राम जी का देश है ,

तो रामजी का काम हो।

सब मिलकर हम यही कहें,

जय जय श्री राम हो।


जय जय श्री राम हो।।



आए हम जिस दिन से

मृत्यु तो तय है ही,
फिर करें न तैयारी!
जब चले ही जाएंगे
कोशिश करें ,
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

छोड़ जाएं अपनी आँखें
किसी और की रोशनी के लिए,
समय रहते कर लें प्रण
देहदान अंगदान का भी
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

लिवरचर्म,किडनी
मिले किसी को जिन्दगी।
हम तो जाएंगे ही
अच्छा हो किसी के काम आ जाएं
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

पहली बारिश के बाद बची रही
सौंधी सुगन्ध की तरह ,
मानव का मानव के प्रति
स्नेह समर्पण के लिए,
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।

परिजन महसूस करेंगे
हमारे होने का एहसास,
जाने के बाद कोई आस्तित्व नहीं
थोड़ा-थोड़ा दूसरों में बस जाएं,
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं।

सोच लें ,वाकई हम चले जाएंगे ।
किसी  की ज्योति में,
किसी की धड़कन में,
किसी के जीवन स्पंदन मेें
हमारा भी अंश होगा ।
थोड़ा-सा यहीं रह जाएं ।


फूलों से नाजुक हैं रिश्ते


सच, फूलों से नाजुक हैं रिश्ते,

करनी होती है बहुत देखभाल।

बनानी होती है  नई नम भूमि,

अपनेपन की मिट्टी,

देनी होती है स्नेह की खाद।


लू के थपेड़ों जैसे

विचारों के उद्वेग से,

सम्हाल करनी होती है।

करनी पड़ती है रक्षा,

कहीं मुरझा न जाएं रिश्ते।


महामारी ने सिखा दिया,

रिश्तों का दर्द समझा दिया।

करीब होकर भी करीब न हो सके,

उमड़ते भावों ने बतला दिया।


फिर भी समय समय पर,

लगाते रहें हैं, नई पौध भी,

त्यौहारों अवसरों पर

बनाए रखते हैं मेलजोल।


प्यार से करते हैं साल-सम्हाल,

तभी तो आती है खुशबू,

और गूंजता है घर आँगन।

बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते,

फूलों की तरह।


 *मंजुला भूतड़ा*

🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏"

                  

सुनीता गोयल, अकलतरा, छतीसगढ़

*मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं*

पहली धड़कन  मेरी धडकी थी तेरे ही भीतर,

आंखें खुली जब सबसे पहले  तेरा ही चेहरा दिखा,

जिंदगी का हर लम्हा जीना तुझसे ही सीखा।

*मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं*


सुर मिला मुझे तुझसे ही,

मेरी अभिलाषाओं को रंगों से भरा तुमने ही,

अपना निवाला छोड़ , मेरा भंडार भरी। 

बेटी होने पर हमेशा नाज करी।

**मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं*


नासमझ थी मैं इतनी खुद का भी मुझे इतना ध्यान नहीं था,

तू ही बस वो एक थी, जिसको मेरी भूख प्यास का ध्यान था,

विषम परिस्थितियों में भी कभी नहीं जताया

पाला पोसा और आगे बढ़ाया।

*मां आखिर मैं तेरी हीअंश हूं*


अपने लिए कभी तुझे दुर्गा, कभी काली बनते देखा।

बड़ी बड़ी परेशानियों में भी हंसते हुए आगे बढ़ते देखा।।

*मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं*


अब और नहीं घिसने देना चाहती तेरे ही मुलायम हाथों को,

चाहती हूं पूरा करना,

तेरे सपनों में देखी हर बातों को।

*मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं*


तूने ही तो मुझे हर गमों में हंसना सिखाया,

किसी भी जुल्म के आगे, कभी न झुकना सिखाया,

सितम की उम्र छोटी है हमेशा ये बताया।

*मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं*


मुझे ऊंचाइयों पर सारी दुनिया देख रहीं है आज,

मेरी इस तरक्की पर तुझे है नाज।

और मां तेरे इस अंदाज पर मुझे है नाज।

*मां आखिर में तेरी ही अंश हूं*


लूं कितने भी जन्म पर तेरा ना कर्ज उतार पाऊंगी।

लड़ जाऊंगी, मर जाऊंगी पर हर जन्म में तेरी ही बेटी कहलाना चाहूंगी।।

*मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं*


8 मई मातृ दिवस पर एक स्वरचित कविता जिसमें मैंने अपने बेटी के भाव को बताने की कोशिश की है🙏

🌹❤️❤️🌹

मातृ शक्ति को नमन

 ❤️ मातृ दिवस पर एक स्वरचित कविता ❤️

मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं

 पहली धड़कन  मेरी धडकी थी तेरे ही भीतर ,

आंखें खुली जब सबसे पहले  तेरा ही चेहरा दिखा,

जिंदगी का हर लम्हा जीना तुझसे ही सीखा.

      मांआखिर मैं तेरी ही अंश हूं

  सुर मिला मुझे तुझसे ही,

 मेरी अभिलाषाओं को रंगों से भरा तुमने ही,

अपना निवाला छोड़ , मेरा भंडार भरी। बेटी होने पर हमेशा नाज करी।

मां आखिर मैं तेरी हीअंश हूं

अपने लिए कभी तुझे दुर्गा, कभी काली बनते देखा।

बड़ी बड़ी परेशानियों में भी हंसते हुए आगे बढ़ते देखा।।

मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं

अब और नहीं घिसने देना चाहती तेरे ही मुलायम हाथों को,

चाहती हूं पूरा करना,

तेरे सपनों में देखी हर बातों को.

मांआखिर मैं तेरी ही अंश हूं

तूने ही तो मुझे हर गमों में हंसना सिखाया।

किसी भी जुल्म के आगे, कभी न झुकना सिखाया

सितम की उम्र छोटी है हमेशा ये बताया।

,,मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं

मुझे ऊंचाइयों पर सारी दुनिया देख रहीं है आज,

मेरी इस तरक्की पर तुझे है नाज।

और मां तेरे इस अंदाज पर मुझे है नाज।

मांआखिर में तेरी ही अंश हूं

लूं कितने भी जन्म पर तेरा ना कर्ज उतार पाऊंगी।

लड़़ जाऊंगी, मर जाऊंगी पर हर जन्म में तेरी ही बेटी कहलाना चाहूंगी।।

मां आखिर मैं तेरी ही अंश हूं


- सुनीता गोयल अकलतरा

छतीसगढ़ 

Friday, April 29, 2022

अनामिका संजय अग्रवाल खरसिया छत्तीसगढ़

 "शादी "" एक अस्तित्व!

सात जन्मो का बंधन है ये अटूट रिश्ता। 

रस्मो, वचनो और प्रेम से बंधा अनोखा रिश्ता ।। 

संस्कारो और विश्वास से जन्मा सुंदर रूप है पाया।

साथ साथ रहने की कसम से दो लोगो ने घर बसाया।। 


आडंबर और दिखावे ने इसे बिगाङ डाला। 

दहेज जैसी कुरीति ने खिलवाड ही कर डाला।। 

प्रीवेडींग और लीव इन ने सब खत्म ही कर डाला।

अहम के कारण तो तलाक अपनी पहचान मे आ गया।। 


युवाओ से कर रही है शादी बस एक ही पुकार।

मुझे बचाओ मुझे संभालो शादी की यही पुकार ।। 

शादी रिश्ते से ही बना हुआ है ये समाज।

इसके साथ सब खङा हुआ हमारा संसार।। 


गिरते हुये लोगो को युवा ही खङे कर सकते है।

साथ रहकर ही दोनो सब कुछ संवार सकते है।। 

एक एक कदम साथ मिलाकर आगे बढ़ना होगा ।

एक दुसरे के साथ मिलकर अपना संसार बसाना होगा।।

      अनामिका संजय अग्रवाल

      खरसिया छत्तीसगढ़"

संतोष मोदी, जोरहाट शाखा, असम प्रांत

पर्यावरण 


तपते सूरज की प्रखर किरणें,

जिनसे झुलस रही धरती !

लाल हो गया सिन्दूरी गोला,

त्राहि त्राहि कर रही प्रकृति !


प्रकृति से की छेड़खानी,

वायुमंडल हो गया दूषित !

गुस्से से सूर्य तमतमा उठा,

हो गया संसार पे कुपित !


हमारी गलती की सजा,

हम खुद ही भुगत रहे !

पेङ पौधों से विहीन धरा,

ऑक्सीजन को तरस रहे !


हे इंसान अब भी संभल जाओ,

प्लास्टिक का बहिष्कार करो !

स्वच्छ सुंदर देश बनाओ,

नदियों को न दूषित करो !


संकल्प करें हम सब मिलकर,

एक नया पेड़ लगाएँगे हम !

धरा हमारी निर्मल होगी,

सुख से जी पाएंगे हम !

- श्रीमती संतोष मोदी, जोरहाट शाखा, असम प्रांत 

Wednesday, April 27, 2022

श्रीमती अरूणा अग्रवाल, उमंग शाखा, छत्तीसगढ

        स्वधर्म

हाहाकार मचा रहा कोरोना,

पूरा  विश्व  है  कांप  रहा ।

विदेशों की सीमाएं लांघ,

भारत में पांव पसार रहा ।।

जाति, धर्म और बच्चे- बूढ़े, 

इसे किसी का बोध नहीं ।

किसी को भी हो सकता है,

 इसमें किसी का दोष नहीं ।।

इसे रोक सकती सजगता,

 सावधानी और सतर्कता ।

भारत से इसे भगाना है, 

 हमें अपना देश बचाना है ।

जिन्होंने अपना फर्ज निभाया,

 अनथक सेवा कर हमें बचाया ।।

हम भी अपना फर्ज निभाये,

इन योद्धाओं का हौसला बढ़ाये।

सम्मान करें जब लौट के आएं, 

भारत की परंपरा निभाये।।"


-श्रीमती अरूणाअग्रवाल

उमंग शाखा,रायपुर

छत्तीसगढ

7470622704

पिंकी बजाज, सरुपथार,असम

र्मैं धरती हूँ 


मैं धरती हूँ, सुन्दर सुशीला, 

शस्य-श्यामला, स्वर्ण शरीरा, 

मृदु भाषी और पूर्ण यौवना, 

देख मुझे है अम्बर का भी जी ललचाता।।        


 मेरे आँचल में लहराए,

खेले डोले ये  गेंहू की बाली, 

जिनकी स्वर्णिम आभा से, 

मैं बन जाती वैभवशाली।। 


मेरी इस सम्पन्नता को किंतु ,

आज लगी ऐसी नजर, 

कट रहें मेरे पेड़- पौधे ,

हो रही मेरी मिट्टी बंजर और 

खो रहा सौंदर्य मेरा, 

देख जिसे लुभाता था अम्बर का भी मन।। 


 समय रहते बचाना मुझको,

मानव तुम्हारी है जिम्मेवारी ,

ऐसे कदम उठाओ के मैं, 

फिर से बन जाउँ वैभवशाली।। 

          

पेड़ की पीड़*


क्यों न समझ पाते तुम

पीड़ हम पेड़ो की,

सुन क्यों न पाते तुम

कराह हमारे दिल की ।।

कहो ना--

क्या सच मे नही सुनी तुमने

मेरी वह करुण पुकार,

झेल रहा था जब मै

उस कुल्हाड़ी की मार,

और 

कह रहा था तुमसे यही बारम्बार-

ना काटो ए मानव, मुझे

दर्द बड़ा ही होता है, मुझे

दर्द बड़ा ही होता है ।।

क्या बिगाड़ा तुम्हारा मैंने

दर्द कहाँ मैंने दिया तुम्हें,

फिर भी क्यों ए मानव तुमने

दर्द ही दर्द दिया मुझे ।

मैने मांगा तुमसे ना  कुछ भी कभी

दे रहा था मे तो तुम्हें कुछ न कुछ फिरभी ।

ए मानव निर्दयी -

क्यों भूल गया तू इतनी जल्दी

मैने ही तो दिया तुम्हें फल ,फूल, हरियाली

मुझसे ही तो है धरा पर

छाव, हवा और पानी

समझ न पाया दोष मेरा,

अशमंजस में हूं बड़ा,

बार बार दोहराऊ यही-

ना काटो ए मानव मुझे 

दर्द बड़ा ही होता है, 

मुझे दर्द बड़ा ही होता है,

मुझे दर्द बड़ा ही होता है ।       


       

पिंकी बजाज

सरुपथार,असम"

उषा खेमका, दक्षिण कोलकाता, पश्चिम बंगाल

 "*बुचा नरसंहार पर उद्गार*: 


क्या होगा जब उठी संवेदना थोड़ी सी देर  के लिए 

धूल की मोटी  सी परत पर एक धूमिल सी रेख

कुछ करने का जज्बा नहीं, चारों ओर सिर्फ निराशा

सिर्फ बातों से पेट नहीं भरता, ना ही पौंछ जाते आँसू

इसलिए रचनाओं पर रचनाएं सब बेकार है, 

चारों तरफ जहां क्रूरता और अनैतिकता का समंदर है, 

वहां सिर्फ जीभ हिलाने से शर्म शेर नहीं बन सकती. 


-उषा खेमका, दक्षिण  कोलकाता पश्चिम बंगाल 9339664194

मंजु बंसल, जोरहाट,असम

 "शीर्षक- गुरूर 


समय का पहिया ऐसे चलता

इंसान को सबक सिखाता। 

गुरूर करे तू किसका बंदे 

मिट्टी का तन मिट्टी हो जाता।


दो दिन का मेला है दुनिया 

आकर सबसे मिलते रहना।

जाते समय कोई न सुनता

अनंत यात्रा पर चल देता।


कहीं देखा गुरूर दौलत का

तो कहीं रूप-सौंदर्य का

किसी को गुरूर अपने पद 

तो कहीं गुरूर सत्ता का।


रावण का भी अहं टूट गया

राम के हाथों मोक्ष पा गया। 

कंस के बल का भी गुरूर 

पल में हुआ चकनाचूर।


ऐसे ही कितने बलशाली 

क्षण में धराशायी हुए। 

स्व के अहंकार में फँसकर

इस वसुधा पर फ़ना हुए। 


भला किसी का कर पाओ

तो भी गुरूर कभी न करना।

परोपकार में जीवन जी कर

सत्कर्मों से झोली भरना।


*एक किन्नर के मनोभाव*


माँ खुद से अलग किया क्यों मुझको

बता दें मेरा क्या था दोष

विधाता की सृष्टि हूँ मैं भी 

मुझ पर क्यों उतारा रोष।

नौ माह तक कोख में रखा

प्रसव पीड़ा नहीं भोगी होगी

आँचल जब भींगा होगा

याद मेरी तुझे आई होगी  ।

सुनसान अंधेरी रात में

छोड़ दिया ग़ैरों के बीच

समाज ने भी दुत्कारा मुझे

पल रही बेगानों के बीच।

नर या मादा नहीं तो क्या

इंसान बनकर तो आया हूँ

संवेदनशील हृदय है मेरा

फिर भी तिरस्कार मैं सहता हूँ ।

लोगों की ख़ुशी में शरीक होकर

आशीषों से झोली भर देते

दिल का हमारा हाल न जाने

हर हाल में खुश हम रहते ।

हर पल अपने वजूद की तलाश में 

दर-बदर हम भटकते हैं 

किन्नर कहलाते , प्रताड़ित होते

स्वयं से ही संघर्ष हम करते ।

अन्तस् जार-जार रोता है

हमारे प्रति होता क्यूँ कटु व्यवहार है

समाज की झूठी आन-शान में

हर पल दिल पर होता प्रहार है ।

जज़्बात भी हमारे सिसकते हैं

आशायें भी दम तोड़ देतीं

आम जीवन की चाह

हर पल अंगड़ाई है लेती ।

अधूरा ही रहता हर ख़्वाब

अभिशप्त होता हमारा जीवन

अस्तित्व माना मेरा कुछ भी नहीं

फिर भी जहाँ में मुस्कुराते हम ।

बोलो माँ! क्यों होता है ऐसा

क्यों हमें नकारा समझा जाता

शारीरिक विकलांगता देन प्रभु की

हमें ही क्यों निराश्रित रहना पड़ता ।।


मंजु बंसल “ मुक्ता मधुश्री “

जोरहाट 

अनु शर्मा, शिवसागर, असम

 """ आत्मविश्वास ""

 ‌हम वो परिंदे नहीं जो उड़ना छोड़ देंगे

    ये आसमां छिन गया तो क्या हुआ नया ढूंढ लेंगे 

    ये पारावर छुट गया तो क्या हुआ नया सागर ढूंढ लेंगे 

    हम वो कश्तियां नहीं जो तैरना छोड़ देंगे

    कदम चलते रहेंगे जब तक श्वास है

    परिस्थिति से परे स्वयं पर हमें विश्वास है

    एक रास्ता नहीं मिला तो क्या हुआ एक नयी राह ढूंढ लेंगे 

   हम वो मुसाफिर नहीं जो चलना छोड़ देंगे 

  नशा हमें हमारी फितरत का हर हार करती है बुलंद इरादा जीत का 

   ये मुकाम हासिल नहीं किया तो क्या हुआ नये ठिकाने ढूंढ लेंगे 

    हम वो परिंदे नहीं जो उड़ना छोड़ देंगे 

     हम हमारे आत्मविश्वास को झुकने नहीं देंगे 

         हम वो परिंदे नहीं जो उड़ना छोड़ देंगे 

                       


शीर्षक- नारी शक्ति  

 

मैं नारी हूं ! मैं नारी हूं ! 

मैं राष्ट्र की शक्ति और भक्ति हूँ। 

               

अद्भुत है मेरा हरेक रूप  

कभी मां दुर्गा तो कभी मैं काली हूं। 

               

मेरी हरेक सोच अलग है

कभी सरल तो कभी कठोर हूँ। 

          

मैं मतृत्व संजोए माँ हूँ 

कभी बहू तो कभी बेटी हूँ। 

              

मैं कभी किसी का दर्द

तो कभी ममता और त्याग हूँ। 

              

मैं चमकीली तलवार हूँ 

तो कभी आंधी तुफां की धार हूँ। 

          

मैं अभिमान और हिम्मत हूँ

तो कभी परछाईं बन जाती हूँ। 

  

हरेक दिन हरेक रूप हूँ 

मैं कभी छांव तो कभी धूप हूँ। 


कुछ सपने कुछ उम्मीदें हूँ     

कुछ दिल में अरमान रखती हूँ। 

         

मैं बलिदान की मूर्ति हूँ 

कभी ना डरी कभी ना हारी हूँ। 

मैं सब कुछ सुनती हूँ

अपने अस्तित्व को पहचान हूँ। 

मैं आस्था,प्रेम,विश्वास हूँ

कोमल हूँ कमजोर नहीं हूँ। 

जीव का निर्माण हूँ 

राष्ट्र का मान-सम्मान अभिमान हूँ। 

मैं नारी हूं ! मैं नारी हूं ! 

मैं राष्ट्र की शक्ति और भक्ति हूँ। 


अनु शर्मा 

शिवसागर, असम

सरला बजाज, गोलाघाट, असम

 खुशी और गम

खुशी और गम 

दोनों है जिंदगी के दस्तूर 

हर इंसान के जीवन में 

दोनों आते हैं जरूर।

कभी तो हम मिलते हैं 

ऐसे हो जाते हैं 

खुशियों से भरपूर 

कभी ऐसा ही होता है 

वह हो जाता है गमों से चूर।

मगर आज एक ऐसा 

वक्त है आया

खुशी और गम 

दोनों को साथ पाया।

हम खुशी मनाएं या हो गमगीन

हमें कुछ समझ नहीं आया।

दिल का टुकड़ा नजरों से 

दूर होकर जा रहा था 

सात समंदर पार।

ऐसे में दिल की वेदना 

निकलने को हो रही थी बेकरार।

दूसरी तरफ मन में हो रहा था 

नई आशाओ का संचार 

जिंदगी का एक सपना 

हो रहा था साकार।

सफलताओं के लिए 

खुल रहा था एक नया द्वार।

जिस पल को पाने का लोग 

करते हैं जिंदगी भर इंतजार 

वह पल बाहें फैलाए खड़ा था हमारे लिए तैयार।

ऐसे में हमने फैसला लिया

इसी में ही सार

अगर पानी है खुशियां 

तो गमों को भी सहना पड़ेगा। 

क्योंकि कांटों से डरने वाले 

गुलाब नहीं पाया करते 

जिंदगी में ऐसे मौके 

हमेशा नहीं आया करते। 

हमेशा नहीं आया करते।



बेटी का जन्मदिन


मेरी जिंदगी का अहम दिन है आज,

 नन्ही गुड़िया गोद में आई थी आज।।


 नाजुक सी परी मेरे घर आई थी,

 रोशनी बन के आसमां पे छाई थी।

 खुशबू से महकता हमारा घर बार ,

तुम्हारे होने से ही पूरा हुआ हमारा परिवार।

मेरी जिंदगी का अहम दिन है आज,

 नन्ही गुड़िया गोद में आई थी आज।।


 कितने सपने और अरमान संजोए,

भाइयों के हाथ खाली न रहे राखी के लिए।

 भाभियों की आंखों का तारा दिल की जान ,

खुश रहे सदा ऐसा संजोती रहती अरमान।

मेरी जिंदगी का अहम दिन है आज,

 नन्ही गुड़िया गोद में आई थी आज।।


 मां करती है बात बेटी के लाड प्यार की ,

पापा खुशियां देना चाहते हैं पूरे संसार की।

 बेटी नहीं बेटा से कम यह बात समझ आ जाएगी,

 बेटा एक घर की लाज बेटी दो घर संभालेगी।

मेरी जिंदगी का अहम दिन है आज,

 नन्ही गुड़िया गोद में आई थी आज।।



सरला बजाज गोलाघाट शाखा ( आसाम)

-सरला बजाज ,गोलाघाट, असम.


चंचल अग्रवाल, जुनागङ, उङिसा

 वायरस                                                                       

रिश्ते नाते प्यार के सब दरवाजे गुम से हो गए है                          

कोरोना के इस दौर मे सब रास्ते सुन से हो गए है                       

न जाने कब? दूर दराज बैठे रिश्तो से ऑखे तार तार होगी          

कब इस कोरोना रुपी भॅवर से नौका पार होगी?                        

ताली बजाओ, दीप जलाओ से लेकर,

हर एक उसके आदेशो को सर ऑखो पे संभाला है।                                           मोदी जी को हमने अपना तारण हार माना है।                          

न कहीं आना,  न कहीं जाना, न ही हाथ मिलाना है                   

कोरोना के भय से ही सही, भारतीय संस्कृति  को फिर से पूरे जग ने जाना है।                                                                      

आओ  सब मिलकर प्रण करे,हमारी संस्कृति  को फिर से जगाना है                                                                                 पश्च्यात संस्कृति को भूलकर, भारतीय संस्कृति को अपनाना है।                   

जय भारत      

स्व रचित-

चंचल अग्रवाल                         

स्नातकोत्तर, पीजीडीसीए पूर्व शिक्षिका

जुनागङ उङिसा 9556204869

Saturday, April 23, 2022

कविता अग्रवाला शिवसागर, असम

 "शीर्षक - कबूतर


रोज सवेरे जब मैं उठती

पहले इनको दाना देती। 

शांति दूत उड़-उड़ कर आते

चुग-चुग कर दाना खाते। 

नहीं ईर्ष्या एक दूजे से 

अपने-अपने हक़ का खाते।


कितने सुंदर कितने प्यारे

मासूम से जीव ये सारे।

कुछ सफेद कुछ हैं काले

आँखें हरपल इन्हें निहारें।


नर कर मन में तनिक विचार 

क्यों इनको तुम मार गिराते।

अपने एक निवाले खातिर

क्यों बन जाते तुम कातिल।

मेल-जोल प्रेम भाईचारा 

कुछ तो सीखो तुम भी इनसे। 


कविता अग्रवाला

शिवसागर, असम"

9101641304

सुमन शर्मा, शिवसागर, असम

 "धरती का श्रृंगार ""पर्यावरण""


स्वच्छ पर्यावरण, स्वस्थ पर्यावरण 

धरती का श्रृंगार है ये आवरण।

इस आवरण के आंचल तले फलते पेड़ पौधे अनंत,

गोद में इसकी विचरते अनेकों जीवन और मरण।

नदी तालाब झील और झरने, 

शीतलता के ये अनमोल गहने। 

फूल पत्ते, बाग बगीचे रंगों की छटा बिखराए। 

पेड़ पौधे झूम झूम कर सांसों की सरगम सुनाए ।

ऊँचे पर्वत, विशाल मैदान, 

अन्नदाता हैं ये खेत खलिहान ।

पर्यावरण से ही हमारा पोषण,

इस अनमोल रत्न का ना हो शोषण। 

संरक्षण इसका दायित्व हमारा,

जीवन तभी सुरक्षित है सारा। 

स्वच्छ आवरण और उन्मुक्त वातावरण ,

धरती को मिले स्वस्थ पर्यावरण।"


सुमन शर्मा, शिवसागर, असम 9435516564

सिया राजूका, रायनगर, उड़ीसा

 "वो मासूम कचरे वाला बच्चा"


चाय की प्याली लेकर,

जब भी बरामदे में बैठती,

दिख जाता वो बच्चा,

काँधे पे कचरे का थैला उठाए,

नजरे उसकी इधर -उधर डोलती सी,

कहीं कुछ मिलने की खुशी ,

साफ झलकती चेहरे पर।


कुछ खाने का मिल जाता तो 

एक स्मित सी मुस्कुराहट चेहरे पर दिख जाती,

 कहीं कचरे मे कोई किताब 

मिल जाती उसे गर,

उलट पलट कर देखता उसे ,

मानो कोशिश कर रहा हो समझने की,

चमक आ जाती आँखो में  उसके

शायद थी पढ़ने की ललक उसमें,

 उसे देख सोच में पड जाती

क्या यहीं भविष्य 

है इनका?

पुस्तकों की जगह कचरे के थैले

उठाए घूम रहें है,

खेलने की जगह घर का बोझ उठाए 

घूम रहे हैं,

 कुछ दरक सा जाता था मन में ,

ख्याल आया क्यूँ ना पढाऊ उसे,

आवाज दी उसे ,पर आवाज

दब गयी शोर-शराबे मे,

सोचा दुबारा दिखेगा तो ,

बात करुगीं उस से,

कुछ महिनों  तक न दिखा वो बच्चा,

पता चला कचरा बिनते -बिनते किसी गाडी से,

टकरा गया वो बच्चा।"

सिया राजूका, रायनगर, उड़ीसा 

7008797783

अनिता डोकानिया, जयनगर, बिहार

 मत करो अच्छाई व शान्ति को  खत्म

"मत करो अच्छाई व शान्ति को  खत्म,                                         

मत दो इन्सानियत व बेगुनाहो को जख़्म।

 आग से आग बुझा सकते हो क्या?   

 दुषित दुर्गंध में सांस ले सकते हो क्या?                                      

 एक बात समझ नहीं आती है ये हिंसा क्यूँ हो जाती है,

रात अंधेरी होने पर मानवता क्यूँ सो जाती है।                 

खुदा तो तुम्हारे कर्म में है,  खुदा तो मानव धर्म में है।

 मत फैलाओ समाज में आतंक व हिंसा जो तेरा नाश कर देगी ,

 मत करो कूरता इतनी की धरती की छाती तेरा बोझ उठाने से इन्कार कर देगी।


अनिता डोकानिया, जयनगर, बिहार

9934949669


विनिता डालमिया, बौसी, बिहार प्रान्त

 "मेरी मां"

औ मां प्यारी मां मम्मा

नो महिना का सफर तय कर

तुने मुझे जन्म दिया ममता के आंचल मे बड़ा किया

सब गम से दूर रख नाजो से पाला।

औ मां प्यारी मां मम्मा

तेरी नज़रों से दुनिया देखी तुने हि जीना सिखाया

तुझसे से ही  ज़िंदगी तुझसे आत्मा 

तुझसे ही मेरा वजुद ।

औ मां प्यारी मां मम्मा

मां तु मेरी जननी है तु है तो मै हुं

मुझसे तो जिने का आधार

मै तो  तेरी परछाईं मात्र हुं ।

औ मां प्यारी मां मम्मा

तुम ही मेरी जननी हो

यह तो सोभागय मेरा

तेरे चरणों में हि हैं जनत मेरा ।

औ मां प्यारी मां मम्मा


 विनिता डालमिया  बौसी  बिहार प्रान्त  6203349148

ऋतू अग्रवाल, सृजन शाखा, कटक, उड़ीसा

 "*निर्मल धरा*

*‌‌बूंद बूंद से धारा बनती बूंद से ही बुझती प्यास* 

*अपनों के खातिर आज से ही जल बचाने का करना होगा हमें प्रयास*

*तपता सूरज तपती धरती और उजड़ी हरियाली यह करा रही एहसास* 

*पेड़ लगाओ पेड़ बचाओ पेड़ से ही मिलती हम को ठंडक और जीवन को सांस*

*सबसे पहले करें दिमाग की सफाई और रखें अपने सफाई आसपास*

*सौर्य ऊर्जा के प्रति जागरूकता लाकर हर घर-घर में फैलाएं प्रकाश*"

ऋतू अग्रवाल, सृजन शाखा, कटक उड़ीसा 

पूनम अग्रवाल, गोलाघाट, असम

 चल अकेला.... चल अकेला.....

हे मानव तू चल अकेला ,चल अकेला,

दुनिया में भीड़ बहुत है और लगा है बेबसी का रेला,

बेहतर है कि .....तू चल अकेला ,चल अकेला ,चल अकेला,

निडर बन ,निस्वार्थ बन,ईश्वर की इबादत कर,

सच्चाई की डगर पर चल,

कर्म को  अपनी पहचान बना,

जिंदगी बढ़ती रहेगी , कारवां चलता रहेगा,

न जीत की परवाह कर, न हार  से  तू डर,

खुद पर यकीन कर, आगे बढ़... आगे बढ़....

हौसला अगर बुलंद हो ,तो मंजिल भी नजदीक मिलेगी,

बस मेहनत कर ,खून - पसीना एक कर,

सूर्य  की ताप में जलना पड़े तो जल,राह में अगर कांटे बिछे हो तो भी चल,

दुखों के बादल को गरजने दे,आंसुओं के सैलाब को बहने दे,

केवल अपने दृढ़ संकल्प पर अमल कर,

 समय का सम्मान कर,समय की गति संग बहता जा,

आगे बढ़ता जा .....आगे बढ़ता जा....

तेरी मेहनत जरूर रंग लाएगी....सफलता तुझे  जल्द ही गले लगाएगी.....

हे मानव... तू चल अकेला, चल अकेला!!

 

"  वृद्धावस्था वरदान है!!"

जन्म से मरण तक का आखिरी पड़ाव वृद्ध अवस्था कहलाता है I

जीवन के हर उतार-चढ़ाव भरे संघर्ष को बखूबी दर्शाता है l

उच्च विचार, सुदृष्टि, मधुर वाणी की आवश्यकता समझाता है l

भक्ति भाव ,प्रेम, अच्छे संस्कार से नव पीढ़ी को अवगत कराता है l

वृद्ध अवस्था के अंतिम चरण में बचपन फिर लौट आता है l

सांसारिक चकाचौंध नहीं ,दो मीठे बोल,दो सुनहरे पल अपनों के साथ,यही इनका दिल चाहता है l

वृद्ध अवस्था कोई अभिशाप नहीं,

यह तो एक अमूल्य ईश्वरिक  वरदान है l

वृद्ध  परिजन हमारे घर की शान है l

जिनके घर होती इनकी सेवा ,वह केवल घर नहीं, 

एक दिव्य तीर्थ स्थान है .......

एक दिव्य तीर्थ स्थान है!!


पूनम अग्रवाल, गोलाघाट, असम

Tuesday, April 19, 2022

गुंजन वर्साने, पटना, बिहार

पेड़ लगाओ

पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ

जीवन को हरा-भरा बनाओ

हम जो पेड़ लगाएंगे 

ऑक्सीजन ही पाएंगे 

जीवन सुखी बनाएंगे 

बीमारी दूर भगाएंगे

हर कोई जब एक पेड़ लगाए 

दुनिया में हरियाली छाए

आओ लेते हैं संकल्प 

पेड़ नहीं काटने देंगे 

एक एक सब पेड़ लगाकर

दुनिया को हरा भरा करेंगे

पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ 

जीवन को हरा-भरा बनाओ l"


-गुंजन वर्साने, पटना, बिहार. 

7979030830

पायल अग्रवाल मुजफ्फरपुर शाखा, बिहार प्रदेश

कलियों ने ली अंगड़ाई,

गुल खिले गुलशन-गुलशन

महक उठी फुलवारी.....

देख रे सखी री आई री 

बसंत ऋतु आई.....

सुनहरी ओढ़नी ओढ़ के

खेतों में पीली सरसों लहराई

मीठे-मीठे रस से भर गई

बगीची में अमराई....

देख रे सखी री आई री आई बसंत ऋतु आई......

मधुर संगीत कोकिल के गुंजे

पतझड़ का कर अंत 

बहार बन झुम उठी ऋतुओं की रानी....

देख रे सखी री आई री आई बसंत ऋतु आई


साहित्य प्रमुख 

"पायल अग्रवाल"

बिहार प्रदेश मुजफ्फरपुर शाखा

8544320267

सीता अग्रवाल, ओड़िसा

आओ अंग दान करें

आओ मिलकर दान करें 

कार्य यह महान करें

किसी के दिल में उतर जाए

किसी को नया संसार दिखाएं

किसी को किडनी का दान करें

किसी को रक्तदान करें

कार्य यह महान करें

आंसुओं को मुस्कुराहटों में बदले

किसी के सूने घर को फिर से बसाए

ईश्वर ने हमें मौका दिया है

चलो समय को बदल जाए

रूढी परंपराओ को छोड़कर

चलो दान में कर्ण को पीछे छोड़ जाएं

अपने लिए तो सब करते हैं 

आओ अब इस संसार को अपना बनाएं

जीते जी कुछ कर ना सके तो क्या

मरने की बाद ही कुछ कर जाए

किसी को जीवनदान करें 

कार्य यह महान करें"


सीता अग्रवाल, ओड़िसा 

9337107204

मीनू अग्रवाल केंसिगा ओडिशा

औरत तेरी यही कहानी


कहीं बनी पाँव की जुती, तो कहीं बनी महारानी 

*औरत तेरी यही कहानी।*

कहीं बनी माँ के रूप मे देवी तो कहीं बनी नौकरानी

*औरत तेरी यही कहानी।*

तुझसा कोई त्यागी तपस्वी नहीं यह देवों ने भी मानी

*औरत तेरी यही कहानी।*

हर रूप में तेरी पूजा होती पर इन्सान ने तेरी कदर न जानी

*औरत तेरी यही कहानी।*

सेवा की तू मिसाल है बनी पर तेरे दुखों का नहीं कोई सानी

*औरत तेरी यही कहानी।*

*मीनू अग्रवाल*"

केंसिगा ओडिशा

7008683034/9938892964

उमा डोकानिया, सहरसा शाखा, बिहार प्रदेश

संस्कार एवं संस्कृति


भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृतियों का मूलाधार है। 

संस्कृति से तात्पर्य प्राचीन काल से चले आ रहे संस्कारों से है। 

मनुष्य द्वारा लौकिक-पारलौकिक विकास के लिए किया गया आचार-विचार ही संस्कृति है। 

सनातन परंपरा के अनुरूप संस्कार की पद्धति ही संस्कृति है। 

संस्कृति अनुभवजन्य ज्ञान पर और सभ्यता बुद्धिजन्य ज्ञान पर आधारित है। 

सभ्यता से सामाजिक व आर्थिक जीवन प्रभावित होता है, 

जबकि संस्कृति से आध्यात्मिक जीवन। 

भारतीय संस्कृति सदैव अपने उदार गुणों के कारण पंथनिरपेक्ष रही है। 

यह उदात्ता व्यवहार की प्रतीक है। इसमें सहिष्णुता कूट-कूट कर भरी है। 

भारतीय संस्कृति प्रत्येक जाति व प्रत्येक व्यक्ति में सुसंस्कार उत्पन्न करती है। 

स्वामी विवेकानंद ने कहा है, 'यदि मनुष्य के पास संसार की प्रत्येक वस्तु है, 

लेकिन मानवता व धर्म नहीं है, तो क्या लाभ?' भारतीय संस्कृति अध्यात्मवादी है, 

देहात्मवादी नहीं। हमारी संस्कृति प्राचीनतम है। संस्कार अपने आप में अमूर्त होते हैं। 

ये व्यक्ति के आचरण से झलकते हैं। चरित्र निर्माण में धर्म व संस्कार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

सहिष्णुता, समन्वय की भावना, गौरवशाली इतिहास, संस्कार, 

रीति-रिवाज और उच्च आदर्शो के कारण भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है। 

विवेक और ज्ञान भारतीय संस्कृति की आत्म भावना है।


उमा डोकानिया,

सहरसा शाखा, बिहार प्रदेश, 9470291605

बबीता डोकानिया, पूर्णिया शाखा, बिहार प्रदेश

 बुचा - नरसंहार


रूस द्वारा मानवता हुई शर्मसार,

फैलाया आतंक किया नरसंहार,

खूनखराबा को अंजाम देकर ,

शहर बूचा को किया तार-तार।


लाशों का लगा दिया ढेर,

सड़कें हुई सुनसान , 

40 दिन के खूनी खेल में ,

शहर बुचा बना कब्रिस्तान ।


बहुत खोया कुछ ना पाया,

दोनों को युद्ध रास ना आया,

क्षति हुई हर तरफ की,

प्रभाव विश्व पर भी है छाया।


जय- हिन्द"

बबीता डोकानिया,

पूर्णिया शाखा, बिहार प्रदेश

9631158628

बिमला सर्राफ, पूर्णिया, बिहार प्रदेश

कितनी सुंदर प्रकृति हमारी, मगर हो रहा इसका विनाश | 

कट रहे हैं पेड़-पौधे, और हो रहा हरियाली का नाश || 

प्रकृति पर होता सित्तम, हमसे सहा नहीं जाता है| 

पर्यावरण के नष्ट होने से, वातावरण दूषित हो जाता है || 

नदियों, तालाबों, जंगलों और झरनों की हमको रक्षा करनी है| 

चारों ओर हरियाली फैलाकर, धरती सुरक्षित रखनी है|| 

जीवनदायिनी धरा की, अहमियत सबको समझाना है | 

विश्व में फैले वायुमण्डलीय प्रदूषण को मिटाना है || 

औद्योगिकरण के इस युग में, हिमनद सारी सुख जाएगी | 

तपती हुई धरा के विस्फोट से, प्रकृति नहीं बच पाएगी || 

पर्यावरण के महत्व को, हमको समझना होगा | 

प्राकृतिक साधनों के होते हुए, हनन को रोकना होगा।। 

प्रकृति का शृंगार है हरियाली, 

हरियाली ही हमारे जीवन में लाएगी खुशहाली। 


भारतीय संस्कृति


अनेकानेक उत्कृष्ट गुण हैं विद्यमान, 

भारतीय संस्कृति है बड़ी महान |


आध्यात्मिकता एवं भौतिकता का, 

विशिष्ट समन्वय है इसमें, 

त्याग , तपस्या, मोक्ष और कर्तव्यनिष्ठा

का पूर्ण समावेश है इसमें |


एकता, उदारता, सहनशीलता और, 

गतिशीलता कूट कूट कर भरी है। 

प्राकृतिक-प्रेम, सहिष्णुता और, 

समानता की सच्ची परिचायक है।। 


कल्याणकारी भावनाओं वाली संस्कृति,

मनुष्य और समाज के संबंध का आदर्श है। 

वैदिक साहित्य, संगीत , कला और

नारी सम्मान के लिए विख्यात है। 


ग्रहणशीलता और वैदिक परम्पराओं से जुड़ी हुई, 

विश्व की समस्त संस्कृतियों में श्रेष्ठतम है।

है सदैव प्रगतिशील रहनेवाली संस्कृति, 

बड़ी विलक्षण है हमारी भारतीय संस्कृति।।  

बिमला सर्राफ,

पूर्णिया, बिहार प्रदेश

8969828969


राष्ट्र चेतना

(भारत माता अपना दर्द बयां करते हुए)


आक्रमण जो हुआ,सीना छलनी हुआ।

सब तार-तार हो गया,वार ऐसा हुआ।।

मेरी अस्मत लुटी,मेरी किस्मत रूठी।

जोर कुछ ना चला, घात ऐसा हुआ।।


चतुरों ने चतुराई से,ऐसी चालें चली।

फूट डाली,कमान हाथों में थाम ली।।

बंटवारा होने लगा,वजूद मिटने लगा।

चोट धर्म पर पड़ी,नींव हिलने लगी।।


मेरी चुनर लाल हुई थी,जिन बेटों के खून से।

जंजीरों से आजाद हुई,उन बेटों के जुनून से।।

मुक्त हुई थी बंधन से , फिर भी मैं बैचेन रही।

घर में छुपे गद्दारों से,अब भी मुझको चैन नहीं।।


रोज- रोज सरहद पर,मेरे लाल जान गंवाते हैं।

पर मजहब के नाम ,लोग लूट-मार मचाते हैं।।

कर लो दिल से सम्मान,सरहद के जवानों का।

देश के सच्चे सपूत,वीर-शहीद-नौजवानों का।।


स्वरचित,

"रोशनी सेक्सरिया"

बेलपहाड़ शाखा

ओडिसा

8327795554

पर्यावरण

रो-रो कर कहती धरा, अब तो जग इन्सान। 

मानवता ही है धर्म , नहीं बनो हैवान।


आँचल मेरा काटकर, क्यों बनते हैवान।

नदी ताल मिल कर करें ,सबसे एक सवाल। 

मलिन हुआ पर्यावरण,जीना है बेहाल।


उन लोगो से पूछ लो, पानी की औकात । 

तरसें नित जो बूँद को , धूप और बरसात ।।


पिघल रहे हिमखंड हैं , देख सूर्य का ताप।

प्रर्यावरण उजाड़ कर , मानव करता पाप।


मलिन हुआ पर्यावरण,नहीं बचे अब नीड़ । 

पंछी सब बेनूर है , समझो उनकी पीड़ ।।


हरियाली चहुँ और हो, सुखद लगे सुखधाम।

पर्यावरण सुधारिये , धरा देत पैगाम।


मंजू शर्मा (जटनी उड़ीसा ) 9040175652

Friday, April 15, 2022

राष्ट्र चेतना का अलख

 🚩🚩🚩राष्ट्र चेतना🚩🚩🚩

राष्ट्र चेतना का अलख 

देशवासियों में जगाना है

सीमा पर डटे सैनिकों का

मनोबल हमें बढ़ाना है

देश दुश्मनों की मनसा को

हम सब मिल तोड़ देंगे

भारत मां की रक्षा हेतु

कोई भी प्रयास ना छोड़ेंगे

खून बहाया था जिन वीरों ने

मां का शीश बचाने को

व्यर्थ ना जाने देंगे हम

उन वीरों की कुर्बानी को

वीर सैनिकों की कुर्बानी को

थोड़ा तो तुम याद करो

भूले बिसरे चित्रों पर

तुम थोड़ा सा रंग आज भरो

1989 में कश्मीरी पंडितों संग हुआ था

जो घिनौना कर्म

भविष्य में ऐसा ना हो

इसलिए अपना लो राष्ट्र धर्म ।।"


प्रीति गोयनका, बेतिया शाखा, बिहार प्रदेश, 9473333922

विधा-गीत

फूल बिछा दो राहों में बस,काँटे सारे तुम चुन लो।

नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा अब बुन लो।।


जन्म मिला जब मानव का है, कर्म करो मानव जैसे।

लिप्त सदा क्यों पशुता में हो,बने स्वयं दानव जैसे।।

छुपा मुखौटे के पीछे मुख, दुनिया को धोखा देते।

ले डूबेगा अहंकार ये,अभी नहीं यदि तुम चेते।।

बुरे भाव को बाहर रखकर,रूई के सम तुम धुन लो।

नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा अब बुन लो।।


जाति-पाँति से ऊपर उठ कर,अलख जगाओ प्रेम भरी।

भाईचारे के आगे तो,बैर-भावना सदा डरी।।


शांति अहिंसा के रक्षक बन,जीवन का उद्धार करो।

नई चेतना हृदयों में भर,ऊर्जा का संचार करो।।


अंतर्मन जो कहता तुमको,बात तनिक उसकी सुन लो।

नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा तुम बुन लो।।


फूल बिछा दो राहों में बस,काँटे सारे तुम चुन लो।

नया सबेरा हो जीवन का,स्वप्न सुनहरा अब बुन लो।।


-शकुन अग्रवाल, राउरकेला शाखा, उड़ीसा


स्वधर्म

सम्प्रदाय न धर्म है, धर्म न जातिवाद

प्रज्ञा, शील का निर्मल आधार, धर्म न तर्क विवाद! 

धर्म न हिन्दू मुस्लिम है, बौद्ध, सिख न जैन 

परहित करुणा का भाव ये, आल्हादित हृदय का चैन! 

धर्म न मिथ्या रूढ़ीवाद, नहीं ये अंध-विश्वास 

सत-चित्त-आनंद ये,ये तो है स्वयं-प्रकाश! 

तन -मन-कर्म व वाणी से सुधारे जो व्यवहार 

धारण करे सत्य-अहिंसा को, धर्म का वो अवतार! 

आचरण में शुद्धता लाए,दे दूसरों को सुख-चैन 

सच्ची मानवता वही है, परदुख से भीगे जो नैन! 

विचारों से अनासक्त हो, रखे समता का भाव 

सैद्धान्तिक समरसता के, साधना में लिप्त होय! 

यही तो मानव धर्म है, इसीमें जगकल्याण 

निर्वाण का भय ना रहे, जीवन हो मुक्तिधाम!"


मंजू बूंदिया,  झारसुगला, ओड़िसा  

शिवरात्रि

भक्त बहुत देखे हमने

पर ऐसे भक्त देखे नहीं,

भोले के भक्त भी भोले ऐसा पाया हमने यहीं।

ऐसी शक्ति शिवलिंग की

आज यहाँ हमने देखी है,

बातें करते भक्तों को शिव से

यहीं हमने सुनी और जानी है।

भक्तों की भक्ति देखी हमने,

भक्ति की शक्ति देखी हमने।

आज हम यहाँ प्रण करेंगे,

ऊ नमः शिवाय जाप करेंगे।

क्योंकि-----

सत्य ही शिव है।

शिव ही सुंदर है।

शिव से ही हमने जाना,

अंत में रमशान है जाना।

जीना है अगर हमें तो,

ज़हर होगा पीना।

इसी जाप से होगा इक दिन तन मन का कल्याण हमारा,

इसी मंत्र से होगा झ्क दिन जीवन का सुधार हमारा।

इस जाप को कोई न कार सकता नहीं ,

इस जाप के बिना मृत्यु से कोई लड़ सकता नही।

तो------

आईऐ हम जपें सदा-----

ऊँ नमः शिवाय ' ऊ नमः शिवाय----


पुष्पा बुकलसरिया प्रीत मासी, डिब्रूगढ़, असम 


जलाए दीप मानवता का

क्या सच में मानवता मर गयी है? 

माना की मिट्टी का तन है मिट्टी मे ही मिल जाना है,

इसका मतलब ये नही की आप किसी की जान लो।

वो भी इस तरह से की आसमां रो पड़े धरती काँप उठे,मानवता कराह उठे।

जिस तरह से लोगों की संवेदना मर रही है उससे तो ऐसा लग रहा है 

मानो इंसान नही हैवानों ने पृथ्वी पर अपना अस्तित्व कायम कर लिया। 

मानो हैवानियत नंगा नाच कर रही हो।

किसलिए और क्यूँ?सिर्फ जमीन को अपने कब्जे में करने के लिये।

इसमे आम इंसानों क्या कसूर है,उनके साथ क्यूँ एसी बर्बरता?

सामुहिक 400 लोगो का कत्ल,सडकों पर बिखरी लाशें,जलिल होती महिलायें,

सरेआम महिलाओं का शारीरिक शोषण,

लाशों के हाथ बन्धे हुए,सर पर गोली के निशान, 

ऐसा कोई नही होगा जिसकी आँखों मे ये भयानक मंजर देख कर आंसू ना आये होगें।

बन्द करो ये सब,क्या होगा इन सब से,

ईश्वर ने इंसानो को दिमाग दिया है।

उनका सही उपयोग करने के लिये ना की मानवता को शर्मसार करने के लिये। 

प्रेम से जग जीता जा सकता है,

फिर क्यूँ हम युध्द करें, इंसान इंसान को मार रहा है,

जानवरों को क्यूँ बदनाम करें, परिणाम का क्या तुझे खौफ नहीं

अपने कर्मों का खौफ नहीं, इंसान नहीं , ना ही इंसानियत बाकी

मजहब नहीं,दीन नहीं, धर्म नहीं,ईमान भी नहीं 

खुन भी अब पानी हुआ मानव अब दानव हुआ,

क्यूँ हृदय उसका पाषाण हुआ? अब बस भी करो, 

कुछ तो इंसानियत रखो बाकी ।

जो राह भटक गए हैं, आओ मिलकर राह दिखाये।

कुछ नहीं रखा इस मार काट में, मन में प्रेम का अलख जगाये।

ये जीवन दिया है ईश्वर ने तो इसको मानवता के हित में लगाये।

सबके मन में आओ फिर से मानवता का दिया जलाए

मानवता का दिया जलाए।


सीमा भावसिहका, कोलकाता शाखा, पश्चिम बंगाल


Saturday, April 9, 2022

थम जा अब इन्सान

भरा आकाश और नव मंडल

बारूद और धुएं की बौछार है

सिसक रही मानवता

यह कैसा नरसंहार है

जहां थी तारों की लड़ियां

वहां बमों की भरमार है

कांप रहा नभ मंडल सारा

यह कैसा अत्याचार है

खोज ली बेटी ने जीवन बचाने की औषधि

पर क्यों पिता का युद्ध व्यापार है

बेबस बच्चे भूखे प्यासे

मां बाप भी लाचार हैं

क्यों चली गई इंसानियत

क्यों हैवानियत का ही राज है

बातें से कर सकते थे सुलह जहां

बेकार ही किए संहार है

नर कंकालों से भर गई धरती

पर फिर भी ना बदला उनका व्यवहार है


*पूनम सराफ*

*सचिव*

*रानीगंज शाखा*"


कविता खेतान भवानी पटना उड़ीसा

 क्यों हमने खो दिया अपनी मानवता का सुंदर रंग,

लूट, खसोट, बेईमानी, का हमेशा मन में भरा अदम,


अच्छे विचारों की शरण लो, बुरे कर्म तुम छोड़ दो,

मानवता ही सद्धर्म हैं,ये नारा तुम बोल दो।


मोह माया को छोड़ कर थोड़ा दान पुण्य भी करके देख,

दान पुण्य, सत्कर्म, मदद ये तो मानवता के भूषण अनेक।


क्या इसी भाव से पैदा हुए थे,अपनी मां की कोख से ?

मानवता का गला घोट कर उनको ही हम दोष दे ।


मां के पालन पोषण का हमने दिया उनको ये परिणाम,

हम मानव ही इसके दोषी चलो फिर से करे एक निर्माण।


चलो फिर से अपने कर्मो को चमकाते है,

और मानवता का धर्म अपनाते है।


जय हिंद 🙏

जय अग्रसेन महाराज🙏


कविता खेतान भवानी पटना उड़ीसा 

रंगो की मौजूदगी

फागुन के मस्त महीने में जब रंगो से बादल सजता है ,

उम्मीद नयी ले आता है मन को अच्छा सा लगता है ।


पिचकारी की तेज धार से मानो मन का मैल सभी धूल जाता है ,

लाल ,हरे ,नीले ,पीले रंगो से मन का कालूस भी छिप जाता है ।


रंगो की मौजूदगी से मेरा स्वभाव बदलने लगता है ,

होली के रंगो से मन में प्यार का फूल सा खिलने लगता है ।


दिवाली पर आँगन में ,जब रंगोली सजने लगती है ,

आँगन पर बिखरे रंगो में, माँ लक्ष्मी के चरणो की परछाई दिखने लगती है ।


उम्मीद नयी बंध जाती है ,आशा की किरणे मन में जगती है ,

दियों की जगमग से रिश्तों में रोशनी नयी दिखने लगती है ,

रंगोली की ख़ूबसूरती देख ,तन में फुर्ती सी जगने लगती है ।

रंगो की मोजूदगी मेरा स्वभाव बदलने लगती है ……….


बॉर्डर पर तैनात सिपाही जो मेरे देश की रक्षा करता है ,

दुश्मनों के सामने ,निडर बैखोफ ,सीना तान खड़ा जो रहता है ।


हम सब को बचाने की ख़ातिर, अपनी जान निछावर करता है ,

उस वीर का लाल लहू जब माटी से जाकर मिलता है ,

भारत माँ की आँखो से भी ,सच मानो , आँसू  टपकने लगता है ।


तिरंगे के रंगो में लिपटा देख ,उस सपूत को 

मेरा स्वभाव बदलने लगता है ………..


मेरे मन के अंदर बैठा ,चण्डी का रूप भी जगने लगता है 

मन करता है तलवार पकड़ हाथों में , 

दुश्मन का सर धड़ से अलग कर दूँ ।


भारत माँ के वीर सपूत की शहादत का बदला ,

अपने हाथों से में ख़ुद ले लू ……

अपने हाथों से में ख़ुद ले लू …….


अम्बिका हेड़ा अजमेर राजस्थान

जय भारत - जय हिन्द🙏

आज जब गूगल खोली !काव्यजली का विषय पढ़ी

कुछ विषय मन को भाया,

संस्कार शब्द दिमाग़ में आया,

कुछ जाना पहचाना सा था,

भूला बिसरा खोया सा था,

माँ ने शायद कुछ बतलाया था,

बड़ो का सम्मान सिखाया था,

जल्दी उठने का फ़र्ज़ समझाया था

पूजापाठ का एक जगह बताया था,

दानधर्म भी हाथों से करवाया था,

सेवा भाव की आदत भी डाली थी,

त्याग की भावना से नहलाया था,

ज़िंदगी का यही है पूर्ण ज्ञान पढाया था,

सारी बातें आँखों के सामने आया था,

ज़िन्दगी की आप धापी में जिसको भुलाया था,

आज अपने अंदर कहराते हुए पाया था,

इस बगिया को फिर से सीचने को मन ललचाया है

अब संस्कार शब्द पुरे वजूद में छाया है!!!!

कविता पोदार, पटना सिटी बिहार 


"


पहली बेटी

दूसरी बार गर्भवती थी मे|

पहली बेटी को जन्म दिया था मैंने,

इस बार बेटे की आने की खुशी मुझ पर भारी थी। 


मन ही मन मुस्कुराती थी मे, 

सोच के बेटा खुश हो जाति थी मे। 

पर मेरे गर्व मे पल रही थी बेटी,

जांच से पता लगाया था मैंने।

फिर क्या था, डॉक्टर ने पूछा,करना है क्या इसका कोई उपाय, 

काप उठी मैं, सिहर उठी मे, नहीं होगा मुझसे यह खोर अन्याय, 

लाऊंगी इसको दुनिया मै,

खुशियां दुंगी इसे हज़ार,

ममता का हक है इसका भी, 

जाऊंगी वारी इसपर भी।

खुसी से मन भर आया, 

हाथो मै जब नन्ही परी

 तेरा हाथ आया।"


"*हमारे प्रिय प्रधानमंत्री*

संस्कार और संस्कृति का मेल है मोदी।

मानवता, स्वछता का पाठ पढ़ाते मोदी। 

पर्यावरण की चिंतन करते,

गंगा किनारे निर्मल धारा को बहते मोदी। 

राष्ट्र चेतना का घर घर संदेशा देते मोदी।

देश पर आई जब भी कोई आंच, नही रुकी बंदूक की गोली,

हमारी सेना को तैयार करते मोदी।

सादा सा जीवन जीते और सबको सिखाते राम मंदिर हो,

या हो गुरुद्वारा, या फिर हो मस्जिद मै चादर चढ़ाते मोदी। 

अपने जन्मदिन पर कभी नहीं भूले, मां का आशीष लेते मोदी। 




रिया गोयल, सृजन शाखा कटक, उड़ीसा. 

Friday, April 8, 2022

मैं भारत की बेटी हूं

 



संस्कारों में पली-बढ़ी,

हमेशा मां की आंखों से डरी,

दुलार अपार था आंचल में,

मगर अनुशासित ही वह बड़ी,

कहती थी ना झुकना अन्याय के आगे,

सहना पड़े भले ही कितने अत्याचार और ताने,

क्या पूर्वजों ने नहीं सही तकलीफ, आजादी के लिए,

वह भी तो मौज में रह सकते थे, खुद की अय्याशी के लिए।

देशहित था केवल उनका लक्ष्य,

 तभी तो आज का भारत है मस्त,

स्वाभिमान संस्कार और उसूलों में पली हूं, 

मैं भारत की बेटी हूं ,मैं भारत की बेटी हूं।।


 "रौशनी की किरण"


सुना था घोर कलयुग आएगा

 नहीं सोचा था ऐसा मंजर दिखाएगा।


इंसान लहुलुहान है,जाने का ना कोई मुकाम है।

आबरू सरे आम लुट रही, आंखों की शर्म भी नहीं रही


जिद और अहं का पलड़ा भारी है

क्यों मानवता इस संहार की अधिकारी है,


ये खेल जिन्होंने रचाए हैं,खुद को भगवान समझके आए हैं।

जाग जा ऐ मानव मार सब अहंकार के दानव


नहीं तो यह सबको निगल जाएगा

बुचा क्या पूरे विश्व को तड़पाएगा।


अलख आध्यात्म की जगानी है,शांति की वैक्सीन लगानी है

साहसी बच्चा बच्चा होगा,जब प्रेम और ईमान सच्चा होगा।


घोर कलयुग का अंत होगा,जब मन वैरागी और मलंग होगा।

रावण का अंत अवश्य होगा,मन में जब राम का अंश होगा।


फरियाद की झड़ी लगाते हैं,अध्यात्म की हवा चलाते हैं

चलो हम सब मिलकर उस खुदा को जमीन पर लाते हैं।


बिंदु भगत

सिटी सेंटर शाखा

पश्चिम बंगाल

हे कृष्ण

बचाई क्यूँ लाज द्रोपदी की 

चलाया क्यूँ ना सुदर्शन चक्र

अगर,कटा होता होता दु:शाशन,दुर्योधन का अंग

 पैदा ही ना होते वे डर से कभी,

वस्त्र बढ़ाने की जगह 

दे दिया होता हथियार

सारी सभा रह जाती स्तब्ध

महाभारत शुरू ही नहीं होता

दुर्गा चंडी बन वहीँ प्यास बुझा लेती

क्यूँ नही तुमने द्रौपदी को 

अबला से सबला बना दिया 

धीरज का पाठ पढ़ा 

क्यूँ महाभारत रचा दिया 

क्यूँ महाभारत रचा दिया!"


बिनीता अग्रवाल, कलकत्ता शाखा, पश्चिम बंगाल

शादी - एक अस्तित्व

सात जन्मो का बंधन है ये अटूट रिश्ता। 

रस्मो, वचनो और प्रेम से बंधा अनोखा रिश्ता ।। 

संस्कारो और विश्वास से जन्मा सुंदर रूप है पाया।

साथ साथ रहने की कसम से दो लोगो ने घर बसाया।। 


आडंबर और दिखावे ने इसे बीगाङ डाला। 

दहेज जैसी कुरीति ने खिलवाड ही कर डाला।। 

प्रीवेडींग और लीव इन ने सब खत्म ही कर डाला।

अहम के कारण तो तलाक अपनी पहचान मे आ गया।। 


युवाओ से कर रही है शादी बस एक ही पुकार।

मुझे बचाओ मुझे संभालो शादी की यही पुकार ।। 

शादी रिश्ते से ही बना हुआ है ये समाज।

इसके साथ सब खङा हुआ हमारा संसार।। 


गिरते हुये लोगो को युवा ही खङे कर सकते है।

साथ रहकर ही दोनो सब कुछ संवार सकते है।। 

एक एक कदम साथ मिलाकर आगे बढ़ना होगा ।

एक दुसरे के साथ मिलकर अपना संसार बसाना होगा।।

      अनामिका संजय अग्रवाल

      खरसिया छत्तीसगढ़"

मानवता

हे मानव तू मानव है,

मानवता को यूँ शर्मशार न कर।।

अपने ही अपनो के दुश्मन है,

देश मे फैली ये कैसी उलझन है।।

अपनो ने अपनो को लूटा है।।

चारो तरफ घोर अँधेरा है।।

अब न रहा बुजुर्गों का बसेरा है।।

अपनी ही बहु-बटियाँ अपनो के बीच पराई है,

इस दुनिया मे ये कैसी अनहोनी आई है।।

ये मानव तू बेटे-बेटियों में फर्क ना कर,

आज की इस दुनिया में अपनी सोच  बदला।।

बेटियाँ आसमान में परचम लहराई हैं,

यही नही अपने पिता की अर्थी भी उठाई है।।

हे मानव कुछ तो शर्म कर,

यूँ मानव को शर्मशार न कर।।"


रश्मि बंका, बेतिया, बिहार 

शीश झुकाए कर रहा है, उड़ाकू लड़ाकू जांबाजों को नमन

चौड़ा सीना है हर हिन्दोस्तानी का, हो रहा इन वीरों के शौर्य पर गर्व । 


अभिमन्यु के साहस को आज भी सराहा जाता हैं 

गर्भ में सीखा था रणनीति वो

गुण से परिपूर्ण एसा वीर था वो ।


बड़े बड़े महारथी द्रोणाचार्य, कर्ण , दुर्योधन जैसे उसे घेर खड़े थे।

तनिक भी घबराया नहीं, वीरों की भाँति लड रहा था कदम उसने उठाया नहीं ।


झाँसी की रानी थी वो लक्ष्मी बाई भी क्या खूब लड़ी थी,

अंग्रेजों के छक्के छुड़ाये मर्दानी क्या खूब जमीं थी ।


आज भी वारों में कुछ बदला नहीं हैं 

वीरों के जीवन में 

त्याग और बलिदान की जीवित मूर्ति है अपने इस संसार में । 


जान हथेलियों पे लेकर लड़ते 

हमारी भारत माता के आन के लिये,

सर्वस्व समर्पित कर देते जनता के

सुकून के लिये ।


जय हिंद 🙏🙏🙏


 "“फ़ैशन और संस्कार”

फ़ैशन के साथ संस्कारों का भी तालमेल खूब बैठा सकते है

जींस टॉप पहन कर स्मार्ट लगने के साथ पार्टी में कभी साड़ी पहन सकते हैं 

ऑफिस पे हैलो बोलना हैं तो परिवार दोस्तों में जय श्री कृष्णा को जगह दे सकते हैं 

पिज़्ज़ा बर्गर कभी खायें तो दिल खोल कर घर के खाने को भी जगह दें सकते हैं 

जमाने के साथ कदम से कदम मिलाना ज़रूरी है तो आँखों में शर्म और सम्मान को रख सकते हैं 

जैसा चाहो वैसा जियो रोका किसने है 

लेकिन वृद्धाश्रम की बढ़ती संख्या को रोक तो सकते हैं 


रीना अग्रवाल 

सोहेला, उड़ीसा 


रीना अग्रवाल, सोहेला, उड़ीसा"

Tuesday, April 5, 2022

डॉ. निशा नंदिनी भारतीय, तिनसुकिया, असम

शीर्षक- मां के आंचल से ही बनती है मां 


आंचल से ढके सिर से निहारती है आकाश को

पकड़ कर एक हाथ बेटी का दिखा रही है चंदा मामा

सिलेट पोंछती आंचल से सिखा रही है सारेगामा।

 

आंचल से आंखों को ढके धूप से बचकर, निहारे एकटक बेटे का पथ, 

अतिथि के आने पर पल्लू से बुहारती आसन को

मेवे मिष्ठान की थाली को आंचल से पोंछ कर परोसती तत्पर।


मां का आंचल याद दिलाता है अनेक कहानियां

आंचल से ढकी मां लगती है देवी की प्रतिमा

आंचल में अन्न लिए देती फकीर को

पकड़कर आंचल का कोना देती आशीर्वाद सबको।


मां का आंचल नहीं जादुई चिराग है

ढक लिया एक बार आंचल से तो जिंदगी बहार है। 

चुटकियों में हो जाता है हर काम मां के आंचल से

मां के आंचल पर जीवन निसार है। 


मंदिर में बैठी एक देवी, 

देवी से लगा रही गुहार।

करना तुम मेरे परिवार की रक्षा

मेरे हृदय की यही सच्ची पुकार।


"शीर्षक- भूदेवी को बचा लो

रे मानव ! हो सके तो 

इस पृथ्वी को बचा लो। 

इसके गुणों को पहचानो

कण-कण को निहारो।


पंच तत्वों से निर्मित काया

सांसों में तेरा भाव समाया।

अन्न-जल तू सबको देती

भेदभाव तनिक ना करती सहनशक्ति की तू देवी

सरलता-धैर्य धारण करती। 


जड़-चेतन सबको अपनाती

खुशियों से झोली भर जाती।

मात-पिता दोनों का रूप

तेरा आंचल तेरी धूप।

हौंसला तेरा हुआ ना कम  

पृथ्वी माँ शत-शत नमन।


लज्जा हीन बेहाल होकर

लालच घट को धारण कर।

निर्वस्त्र करे मानव तुझको

अंग-अंग को काट कर।

तेरी चीख-पुकार सुने ना

अंध गलियों में दौड़ रहा। 


हवस का शिकार होकर 

घर-द्वार अपने भर रहा। 

अंत तेरा क्या होगा

मूर्ख मानव ! तू ना जाने।

यह बचेगी तू बचेगा

एहसानों इसके दबेगा।


डॉ.निशा नंदिनी भारतीय तिनसुकिया,असम 


कण-कण मेरे देश का

मन-मन मुझे लुभाता है।

सपनीले गहरे नयनों को

आनंदमय कर जाता है।

स्वर्ण माटी की महक भीनी

अंतर्मन अभिभूत है।

उज्जवल-उज्जवल गंगा जल

शांति द्योतक दूत है।

प्रहरी रक्षक खड़ा हिमालय

खड़ा-खड़ा सो जाता है।

आंच ना आने देता हिंद पर

शत्रुओं से टकराता है।

कण-कण मेरे देश का

मन-मन मुझे लुभाता है।

सपनीले गहरे नयनों को

आनंदमय कर जाता है।

हरे भरे सुंदर खेतों का

जादू मन पर चढ़ता है।

बौराये आमों को देख

भाव-विभोर हो जाता है।

निरंतर बहता नदियों का जल

गीत सुहाने गाता है।

प्रसन्न मन निरपेक्ष भाव से

प्राणवायु दे जाता है।

कण-कण मेरे देश का

मन-मन मुझे लुभाता है।

सपनीले गहरे नयनों को

आनंदमय कर जाता है।


शीर्षक- आओ अमृत महोत्सव मनाएं

आओ अमृत महोत्सव मनाएं

हम सीखें दुनिया को सिखाएं।

बुनकर संस्कृति ताना-बाना

सुंदर भारत आदर्श दिखाएं।

निद्रा से जागे सर्वप्रथम

औरों को जागृत किया।

दूर भगाकर अंधियारे को

पवित्र प्रकाश पर्व किया।

लेकर ज्ञान ज्योति ज्वाला

हर घर की चौखट पर जाएं।

चार वेद, अट्ठारह पुराण

रामायण, गीता का ज्ञान।

हर बालिका माँ का रूप

हर बालक में रमते राम।

कर्म पूजा के मंत्र को

कोने-कोने तक फैलाएं।

आओ अमृत महोत्सव मनाएं

हम सीखें दुनिया को सिखाएं।

बुनकर संस्कृति ताना-बाना

सुंदर भारत आदर्श दिखाएं।

भारत प्यारा देश हमारा

वारे इस पर तन-मन अपना।

आंच न आए कभी किसी पर

पर सेवा का मंत्र उचारे।

रक्षा में तत्पर रहकर इसकी

आजादी का महत्व बताएं।

भारतीय संस्कृति भाषा रूप

देववाणी की उज्जवल धूप।

गंगा मैया का शीतल जल

नीम ,आंवला, पीपल फल।

चरखा, करघा, मिट्टी,मोम

स्व उद्योग का महत्व बताएं।

आओ अमृत महोत्सव मनाएं

हम सीखें दुनिया को सिखाएं।

बुनकर संस्कृति ताना-बाना

सुंदर भारत आदर्श दिखाएं।


शीर्षक - रेत के जंगल

नदी, हो सके तो

छुपा लो अपने आपको

ढूंढ रहे हैं रेत के जंगल तुम्हें।

लग गई है नजर

तुम्हारी खूबसूरती को

जाकर मां से नज़र का

टोटका करवा लो।

करके कब्जा तुम्हारे अर्धांग पर  पनप रहा है साम्राज्य

कंकरीट के जंगलों का

हर कोई तुम्हें काटने पर तुला है

हवस बढ़ रही है चहुँ ओर

लूटपाट का महल खड़ा है।

नदी, हो सके तो

छुपा लो अपने आपको

ढूंढ रहे हैं रेत के जंगल तुम्हें।

दिन-दिन आदमी की लालसा

बढ़ती जा रही है

रहता था पहले एक कमरे में

पूरा का पूरा परिवार

अब आठ कमरों के घर में

सिर्फ एक आदमी रहता है।

आदमी के रहने को

धरती छोटी पड़ रही है

नदी,हो सके तो

छुपा लो अपने आपको

ढूंढ रहे हैं रेत के जंगल तुम्हें।


शीर्षक-कफन तिरंगा दे जाओ

चाह नहीं प्रभु

महलों की तुम सैर कराओ।

चाह नहीं प्रभु

पुष्प रथ पर तुम चढ़ाओ।

चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी

कफन तिरंगा दे जाओ।

मैं तो लघुकण इस धरती का

दुर्लभ जीवन पाया है।

कर्ज बहुत बड़ा धरा का

असीम सुख पाया है।

आ सकूं प्रभु इसके काम

ऐसा कुछ करवा जाओ

चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी

कफन तिरंगा दे जाओ।

बोझ बड़ा भारी है सिर पर

कर्मबोध न जानूँ मैं।

भारत माँ के ध्यान में

मत्स्य सम डुबूँ-तैरु मैं।

हरेक कतरा लहू का

इसपे न्यौछावर करवा जाओ

चाह प्रभु सिर्फ इतनी मेरी

कफन तिरंगा दे जाओ।


शीर्षक- सुकर्म की गाड़ी हांको

है अगर हिम्मत तो

सुकर्म की गाड़ी हांको

दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे

देख कर चलो।

प्रेम के बस्ते में

आनंद के फल भरो

कुकर्म से बचो

और बचाओ सबको।

मत पूछो किसी से

अपनी मंजिल का पता

मंजिल खुद तुम्हारा

पता ढूंढती है।

चाहे जितना बहला

फुसला लो उसको

तुम्हारे कर्मों के आगे

वो चलती है।

भाग्य से कर्म को

बनाया नहीं जाता

कर्म का लिखा

मिटाया नहीं जाता।

आदि से अंत तक

विवेक से चलो

सुकर्म की कलम से

भाग्य को लिखो।


शीर्षक- पिता का दुख 


देकर हर सुख बेटे को

पाल-पोस कर बड़ा किया 

सींच अपने खून पसीने से 

पढ़ा-लिखा कर खड़ा किया। 

हाथ मेरा थामे रहता था 

जब वो स्कूल जाता था

पापा तुम जल्दी आ जाना

रो-रो कर वो कहता था। 

नहीं चाहिए मुझे खिलौने 

बस पापा तुम आ जाना 

गोदी में अपनी लेकर के 

प्यार मुझे तुम कर लेना। 


बड़ा हो गया बेटा मेरा

हाथ मेरा अब छोड़ गया 

रोते-बिलखते पापा से 

रिश्ता अपना तोड़ गया।

उठा न सका वो भरी बोझ 

अपने अपाहिज पापा का

व्हील चेयर में बैठाकर 

वृद्धाश्रम की ओर गया।

अजनबियों के बीच में 

आज मुझे वो छोड़ गया 

जिम्मेदारी से घबरा कर 

अनाथ मुझे वो कर गया। 


आशीर्वाद देता है दिल

बेटा मेरा खुश रहे 

उसकी झोली के सारे दुख

मेरी झोली में पड़े रहे।

डॉ. निशा नंदिनी भारतीय, तिनसुकिया, असम

रंजना गोयल बिहार प्रदेश बेतिया शाखा

रूसी सेना राजधानी कीव के

बूचा शहर पर कत्लेआम मचाया

ले निर्दोषों की जान लासों का जाल बिछाया

क्या मासूमों का खून बहा कर ,होगा समस्या का समाधान

सड़कों पर बिखरे पड़े लाशों के ढेर

यातनाएं दे देकर तब्दील हुआ शहर बूचा मरघट में


रूसी सेना राजधानी कीव के

बूचा शहर पर कत्लेआम मचाया

रूसी सेना ने टैंकों से कुचल कुचल नरसंहार किया

कर बदसलूकी ले ली इज्जत महिलाओं की

ऐसा नरसंहार किया -ऐसा नरसंहार किया

ऐ रूसी-युक्रेन भूमि का टुकड़ा लेकर करोगे क्या

क्या खौफ नहीं अल्लाह का

जहां तुमने बच्चों महिलाओं जन जन का लहू बहाया

क्या खुदा बक्से का तुम्हें ,सोचो जरा सोचो


रूसी सेना राजधानी कीव के

बूचा शहर पर कत्लेआम मचाया

खोदा 45 फिट लंबा कब्रगाह

सैकड़ों लोगों को दफनाया-सैकड़ों लोगों को दफनाया

क्यों कर रहे 42 दिनों से नरसंहार

अब तो हो जाओ होशियार


रूसी सेना राजधानी कीव के

बूचा शहर पर कत्लेआम मचाया-कत्लेआम मचाया।"


पर्यावरण- पर्यावरण बचाना है


पर्यावरण बचाना है -पर्यावरण बचाना है


धरा स्वच्छ बना- पर्यावरण बचाना है


हाथ से हाथ मिला वादा यह करते हैं


प्रदूषण दूर कर -पर्यावरण बचाना है


पर्यावरण से मिलती हमें सासें


आओ मिलकर पेड़ लगाएं


नदियों झीलों को करे स्वच्छ- मिलता निर्मल नीर है


पर्यावरण बचाना है- पर्यावरण बचाना है


वाहनों का करे कम उपयोग, वायुमंडल स्वच्छ बनाना है


तेजल धानी पर लगाकर विराम, ध्वनि प्रदूषण से बचाना है


पर्यावरण बचाना है -सबको स्वस्थ्य बनाना है


पर्यावरण बचाना है पर्यावरण बचाना है


           


 रंजना गोयल


बिहार प्रदेश बेतिया शाखा

सम्पादकीय



अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन के राष्ट्रीय साहित्य सेवा : काव्यांजली कि तरफ से इस ब्लॉग पर  स्व लिखित रचना भेजने वाली सभी प्रान्त की साहित्य प्रेमी बहनों का हृदय से आभार !

बहनों ! आप सबके दिल के उदगार वास्तव में बहुत ही सराहनीय हैं. मैं जब जब आपके द्वारा रचित काव्य को पद्धति हूँ मन गदगद हो जाता है. 
आप अपना प्रयास जारी रखें. आप सभी बहनें बहुत जानकार हैं फिर भी मैं यहाँ कविता लिखने के विषय में कुछ बातें लिख रही हूँ. आपको ठीक लगे तो अवश्य अनुशरण करें!

एक अच्छी कविता में क्या क्या गुण होने चाहिए?
  1. कविता ऐसी होनी चाहिए जो अन्तर्मन को छू जाये ।
  2. कविता का विषय पाठक के हृदय तक पहुंचना चाहिए ।
  3. कविता एक लय में होनी चाहिए ।
  4. कविता में प्रवाह होना चाहिए ।
  5. कविता में शब्दों की गिनती से ज्यादा महत्व रखता है कविता की आत्मा, उसकी संवेदना 
सहयोग के बहुत बहुत धन्यवाद!

पुष्प बजाज 
राष्ट्रीय साहित्य सेवा प्रमुख 
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन