पर्यावरण
तपते सूरज की प्रखर किरणें,
जिनसे झुलस रही धरती !
लाल हो गया सिन्दूरी गोला,
त्राहि त्राहि कर रही प्रकृति !
प्रकृति से की छेड़खानी,
वायुमंडल हो गया दूषित !
गुस्से से सूर्य तमतमा उठा,
हो गया संसार पे कुपित !
हमारी गलती की सजा,
हम खुद ही भुगत रहे !
पेङ पौधों से विहीन धरा,
ऑक्सीजन को तरस रहे !
हे इंसान अब भी संभल जाओ,
प्लास्टिक का बहिष्कार करो !
स्वच्छ सुंदर देश बनाओ,
नदियों को न दूषित करो !
संकल्प करें हम सब मिलकर,
एक नया पेड़ लगाएँगे हम !
धरा हमारी निर्मल होगी,
सुख से जी पाएंगे हम !
- श्रीमती संतोष मोदी, जोरहाट शाखा, असम प्रांत
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