Friday, April 15, 2022

जलाए दीप मानवता का

क्या सच में मानवता मर गयी है? 

माना की मिट्टी का तन है मिट्टी मे ही मिल जाना है,

इसका मतलब ये नही की आप किसी की जान लो।

वो भी इस तरह से की आसमां रो पड़े धरती काँप उठे,मानवता कराह उठे।

जिस तरह से लोगों की संवेदना मर रही है उससे तो ऐसा लग रहा है 

मानो इंसान नही हैवानों ने पृथ्वी पर अपना अस्तित्व कायम कर लिया। 

मानो हैवानियत नंगा नाच कर रही हो।

किसलिए और क्यूँ?सिर्फ जमीन को अपने कब्जे में करने के लिये।

इसमे आम इंसानों क्या कसूर है,उनके साथ क्यूँ एसी बर्बरता?

सामुहिक 400 लोगो का कत्ल,सडकों पर बिखरी लाशें,जलिल होती महिलायें,

सरेआम महिलाओं का शारीरिक शोषण,

लाशों के हाथ बन्धे हुए,सर पर गोली के निशान, 

ऐसा कोई नही होगा जिसकी आँखों मे ये भयानक मंजर देख कर आंसू ना आये होगें।

बन्द करो ये सब,क्या होगा इन सब से,

ईश्वर ने इंसानो को दिमाग दिया है।

उनका सही उपयोग करने के लिये ना की मानवता को शर्मसार करने के लिये। 

प्रेम से जग जीता जा सकता है,

फिर क्यूँ हम युध्द करें, इंसान इंसान को मार रहा है,

जानवरों को क्यूँ बदनाम करें, परिणाम का क्या तुझे खौफ नहीं

अपने कर्मों का खौफ नहीं, इंसान नहीं , ना ही इंसानियत बाकी

मजहब नहीं,दीन नहीं, धर्म नहीं,ईमान भी नहीं 

खुन भी अब पानी हुआ मानव अब दानव हुआ,

क्यूँ हृदय उसका पाषाण हुआ? अब बस भी करो, 

कुछ तो इंसानियत रखो बाकी ।

जो राह भटक गए हैं, आओ मिलकर राह दिखाये।

कुछ नहीं रखा इस मार काट में, मन में प्रेम का अलख जगाये।

ये जीवन दिया है ईश्वर ने तो इसको मानवता के हित में लगाये।

सबके मन में आओ फिर से मानवता का दिया जलाए

मानवता का दिया जलाए।


सीमा भावसिहका, कोलकाता शाखा, पश्चिम बंगाल


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