संस्कारों में पली-बढ़ी,
हमेशा मां की आंखों से डरी,
दुलार अपार था आंचल में,
मगर अनुशासित ही वह बड़ी,
कहती थी ना झुकना अन्याय के आगे,
सहना पड़े भले ही कितने अत्याचार और ताने,
क्या पूर्वजों ने नहीं सही तकलीफ, आजादी के लिए,
वह भी तो मौज में रह सकते थे, खुद की अय्याशी के लिए।
देशहित था केवल उनका लक्ष्य,
तभी तो आज का भारत है मस्त,
स्वाभिमान संस्कार और उसूलों में पली हूं,
मैं भारत की बेटी हूं ,मैं भारत की बेटी हूं।।
"रौशनी की किरण"
सुना था घोर कलयुग आएगा
नहीं सोचा था ऐसा मंजर दिखाएगा।
इंसान लहुलुहान है,जाने का ना कोई मुकाम है।
आबरू सरे आम लुट रही, आंखों की शर्म भी नहीं रही
जिद और अहं का पलड़ा भारी है
क्यों मानवता इस संहार की अधिकारी है,
ये खेल जिन्होंने रचाए हैं,खुद को भगवान समझके आए हैं।
जाग जा ऐ मानव मार सब अहंकार के दानव
नहीं तो यह सबको निगल जाएगा
बुचा क्या पूरे विश्व को तड़पाएगा।
अलख आध्यात्म की जगानी है,शांति की वैक्सीन लगानी है
साहसी बच्चा बच्चा होगा,जब प्रेम और ईमान सच्चा होगा।
घोर कलयुग का अंत होगा,जब मन वैरागी और मलंग होगा।
रावण का अंत अवश्य होगा,मन में जब राम का अंश होगा।
फरियाद की झड़ी लगाते हैं,अध्यात्म की हवा चलाते हैं
चलो हम सब मिलकर उस खुदा को जमीन पर लाते हैं।
बिंदु भगत
सिटी सेंटर शाखा
पश्चिम बंगाल
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