Friday, April 15, 2022

स्वधर्म

सम्प्रदाय न धर्म है, धर्म न जातिवाद

प्रज्ञा, शील का निर्मल आधार, धर्म न तर्क विवाद! 

धर्म न हिन्दू मुस्लिम है, बौद्ध, सिख न जैन 

परहित करुणा का भाव ये, आल्हादित हृदय का चैन! 

धर्म न मिथ्या रूढ़ीवाद, नहीं ये अंध-विश्वास 

सत-चित्त-आनंद ये,ये तो है स्वयं-प्रकाश! 

तन -मन-कर्म व वाणी से सुधारे जो व्यवहार 

धारण करे सत्य-अहिंसा को, धर्म का वो अवतार! 

आचरण में शुद्धता लाए,दे दूसरों को सुख-चैन 

सच्ची मानवता वही है, परदुख से भीगे जो नैन! 

विचारों से अनासक्त हो, रखे समता का भाव 

सैद्धान्तिक समरसता के, साधना में लिप्त होय! 

यही तो मानव धर्म है, इसीमें जगकल्याण 

निर्वाण का भय ना रहे, जीवन हो मुक्तिधाम!"


मंजू बूंदिया,  झारसुगला, ओड़िसा  

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