Saturday, June 25, 2022

नलिनी सुरेश अग्रवाल नागपुर महाराष्ट्र

 ''मा''

हमें तुम देवदूत सी,

हमारी शक्ति का निर्विकार एहसास कराती हो...

कामयाब संकट मोचक हो,

सब पीड़ा हर लेती हो...

 

हमने कभी नहीं पूछा

संध्या समय तुम्हारे

थके बुझे चेहरे का कारण,

फिर भी मुस्कुरा कर

अपनी थकान की पीड़ा

खुद ही हर लेती हो...

 

हमारी आहट कैसे पहचान लेती हो,

हमारे रूठने पर बार-बार मनाती हो...

 

हमें हमारी शक्ति का एहसास कराती हो..

 

"मा "

 

नलिनी सुरेश अग्रवाल

नागपुर

किरण मखारिया नागपुर

मां को शब्दों में बयां नहीं कर सकते,

फिर भी सभी शब्दो को एक माला में पिरोकर एक छोटी सी कोशिश...

 

मां के रहते कोई गम नहीं होता,

दुनिया में कोई साथ न दे,

पर मां का साथ एक क्षण नहीं छूटता...

 

तुम हो तो मैं हूॅं,

तुम से ही है वजूद मेरा..

 

तुम ही हो पहचान मेरी,

मां तुमसे दुनिया सारी..

 

तुम हो कितनी प्यारी,

मां के चरणों में है स्वर्ग..

 

मां का आशीर्वाद जो मिल जाए,

तो घर बैठे हो जाए चारो धाम...

 

किरण मखारिया

नागपुर

संगीता मंत्री नागपुर महाराष्ट्र

 

माँ

 " मेरी प्रथम गुरु "

 

 चरणों में वन्दौ करूँ

 माँ ही मेरी प्रथम गुरु

 

पहला कदम रखा धरती पर,

दौड़ पड़ी सम्भाला आकर..

 

पहला शब्द कहा तुतलाकर,

न्यौछावर तू हुई थी मुझ पर..

 

प्रथम पाठशाला का दिन था,

मचल गई थी जाना न था..

 

उठा गोद में गले लगाया,

स्पर्श कभी वो भूल न पाया..

 

ज्यों-ज्यों उम्र का कदम बढ़ाया,

संस्कारों का तूने पाठ पढ़ाया..

 

ठोकर लगी तो हौसला बढ़ाया,

कठिनायों से लङना सिखाया..

 

कहाँ थी तू ज्यादा शिक्षित,

हर गुण था तुझमें परिलक्षित..

 

हर समस्या का तू ही थी हल,

ज़िन्दगी हो जाती थी सुफल..

 

आत्मसम्मान से बढ़ना आगे,

संयम से जीना सीखा तुझसे..

 

मुस्कुराहट तेरी न भूल पाई हूँ,

हर हार से तभी जीत पाई हूँ..

 

जीवन में जब जब असफलता मिली,

तेरे अनुभव के पाठ्यक्रम से पास हुई..

 

तेरे होने का प्रतिपल अह्सास होता है,

माँ आज भी सर पे तेरा हाथ होता है..

 

संगीता मंत्री

नागपुर

सोनिया अग्रवाल नागपुर महाराष्ट्र

 

मां


तपती धूप में छांव का एहसास है मां ....

बच्चे के दिल की धड़कन को,

ख़ुद में महसूस करती है मां....

 

जिंदगी के सफर में कई रिश्ते बनते-बिगडते,

पर हर पल बाहें फैलाए मिलती है मां.....

 

समुद्र सा गहरा प्यार, मोती की तरह अनमोल,

 हमारे जीवन को संवारती है मां.....

 

काम पर बाहर हम जाते,

पर दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी रहती है मां.....

 

ख़ुद की परवाह न कर, हमेशा हमारी चिंता मे घिरी रहती है मां....

 

खरोंच मुझे लगे तो तड़प उठती है,

जल्दी ठीक हो उसके लिए सारा आसमान सर पर उठा लेती है मां.....

 

निशब्द हूं उसकी ममता को पैमाने (शब्दों) में बताने के लिए,

बस इतना कहूंगी,

इस धरती पर स्वयं भगवान का रूप है मां......

 

सोनिया अग्रवाल

नागपुर.

स्वाती अग्रवाल नागपुर महाराष्ट्र

 

मेरी मां के लिए मेरी छोटी सी कविता  

 

मां आपके लिए क्या-क्या लिखूं,

भाव बहुत हैं पर शब्द नहीं हैं..

क्या लिखूं,    

 

 प्रेम मूरत आपकी मन में बसी,

 पर क्या लिखूं,   

 

आप बस आप हो,

 जो धर्म है जो कर्म है जो मर्म  है जो परम है..

मां क्या लिखूं ,     

 

 मां तो बस मां है,

 जो गुरु भी है सखा भी है, जो ईश्वर भी है मां...

क्या लिखूं ,    

 

 मां क्या क्या लिखूं क्या क्या लिखूं...

 

स्वाती अग्रवाल

नागपुर

सुनीता डालमिया नागपुर

भारतीय  ससंकृति में 

माँ सदा पूजनीय है। माता पिता का आदर एक दिन,

नहीं सदा किया जाता है इसलिये तो कहतें हैं...

 

माँ से बढ़ कर कुछ नहीं, क्या पैसा क्या नाम ।

चरण छुए और हो गये, तीरथ  चारों धाम।

 

हम तो सोये थे चैन से पल पल देखे ख्वाब।

माँ कितना सोई जगी इसका नहीं हिसाब।

 

इनकी बाँहो में बसा, स्वर्ग सरीखा गाँव।

बाबू जी इक पेड़ हैं, अम्मा जिसकी छाँव।

 

सभी  माताओंको  समर्पित

 

सुनीता डालमिया

नागपुर

सौ.संगिता भुरट, लोनावाला शाखा महाराष्ट्र

 मैं नारी नदी सी, मेरे दो किनारे

 

मै नारी नदी सी मेरे दो किनारे।

एक किनारे ससुरालदूजी ओर मायका

 

दोनों मेरे अपने फिर भी अलग दोनों का जायका।

 

एक तरफ मां जिसकी कोख का मैं हिस्सा ।

दूजी ओर सास जिनके लाल संग  जुड़ा मेरे

 जीवन भर का किस्सा

 

एक तरफ पिता  , जिनसे है अपनत्व की धाक।

दूजी ओर ससुरजी जिनकी हैं सम्मान की साख।

 

मायके का आँगन मेरे जन्म की किलकारी

ससुराल का आँगन  मेरे बच्चों की चिलकारी

 

मायके में मेरी बहने , मेरी हमजोली

ससुराल में मेरी ननदे है, शक्कर सी मीठी गोली।

 

मायके में मामा, काका है पिता सी मुस्कान

ससुराल के देवर जेठ हैं तीखे में मिष्टान।

 

मायके में भाभी है

ममता के खजाने की चाबी,*

ससुराल में देवरानी जेठानी

हैं मेरी तरह ही बहती नदी का पानी।

 

मायके में मेरा भईया

एक आस जो बनेगा दुख में मेरी नय्या

ससुराल में मेरे प्राणप्रिय स…

सौ.संगिता भुरट, लोनावाला शाखा महाराष्ट्र

नीलकमल टाक महाराष्ट्र

 

हरा पीपल, घना बरगद ,सुनो तुलसी है मेरी मां,

मेरा आंचल, कभी दर्पण ,बनी बदली है मेरी मां।

 

 

मैं फल हूं मां की मन्नत का, जो दुर्गा मां ने बक्शा है,

मिटाऊं ज़ुल्म दुनियां से, सदा कहती है मेरी मां।

 

 

सदा धरती गगन से बेटी, पल-पल अपना रिश्ता रख,

यहीं इक बात शिद्दत से, मुझे कहती है मेरी मां।

 

बहोत ढूंढा ,बहोत देखा, बहोत जांचा, बहोत परखा,

नहीं दुनियां में कोई शै, तेरे जैसी है मेरी मां।

 

नहीं है पास लेकिन रूह में ,मेरी समाई है,

मेरे भीतर सभी कहते हैं, के दिखती है मेरी मां।

 

 तेरा सर गोद में रख - रख के, आ तेरी बलाए लूं,

"प्रीत" अन्दर तेरी ममता, उभर आई है मेरी मां।

                     

आपकी बेटी

                       

नीलकमल टाक

दीप्ति अग्रवाल महाराष्ट्र,

 

मॉं

याद नहीं मॉं जब पहली बार दुनिया में आयी

दोनों हथेलियों के पलने में पलती चली गई।

स्नेह से जब तुम थामती थी मेरा हाथ

लगता जैसे सारा जहॉं है मेरे साथ।

तुझे देखते देखते भागने लगा डर

करने लगी धमाचौकड़ी होकर नीडर।

साथ में रहता था थोड़ा पढ़ाई का टेंशन

और मॉं तुम्हारा स्नेह भरा अनुशासन ।

लगता था तब  तो वह बड़ा ही आतंकी

करनी पड़तीं थी रात-दिन पढ़ाई की नौटंकी ।

धीरे-धीरे चढ़ती गई सीढ़ी दर सीढ़ी

तेरी छाया में तैयार होने लगी नई पीढ़ी।

हम भाई बहन देखने लगे नये नये सपने

व्यस्त रहने लगे,खोये रहने लगे काम में अपने ।

यह था मेरे जीवन का अमूल्य कालखंड

जिसमें था तेरी ममता का झरना अखंड।

भूल ना पाएँगे मॉं उन स्वर्णिम पलों को

कभी हंसना कभी रोनाभाई बहनों कीं तकरारों को।

कहते है नींव मज़बूत हो तो इमारत बुलंद होती हैं

संघर्षों में तपकर मिट्टी सोना और कुंदन होती है ।

मॉं तुमने मुझे वही मज़बूत नींव  दी है

आसमान में उड़ान भरने की उम्मीद दी है।

ऋणी हूँ ,हमेशा ऋण में रहना चाहती हूँ  

तू सदा स्वस्थ रहे, मस्त रहे यही कामना करती हूँ ।।


दीप्ति अग्रवाल