Saturday, February 17, 2024

महाराष्ट्र : काव्यांजली

 दर्द भरी जिंदगी l

 

आज के दौर की यह हालत है,

 अपने ही अपनों से पराए हो जाते हैंl

फिर

 भी हमें भरोसा है ये,

की आंधियों में भी  चिराग जल सकते हैं।

 

 टूटकर शीशा यह दिल बिखर जाएगा,

 कोई मेरा हमसफ़र या

 जिगर का टुकड़ा छीन जाएगा ।

 

हम बात क्या करें जिसे,

 हमारी कोई खबर ही ना हो ।

वह दुआ भी क्या करें,

 जिसका कोई असर ही ना हो।

 

 वह जिंदगी भी क्या अजीब हो गई है,

 जिसके जीने में कोई सबब ही ना हो ।

 

अब तो मुझसे बोझसी

 लगती है यह जिंदगी,

 फिर भी एक उम्मीद सी लगती है यह जिंदगी।

 

 बुझते हुए चिराग मेंभी

 उजाला नजर आता है,

 आज के दौर में भी कभी कहीं इंसानियत नजर आती है।

 

 क्या वह हमसे दूर है,

 या फिर हम ही रास्ता भटक गए हैं,

 कुछ समझ नहीं आता,

 यह दर्द भरी जिंदगी हमें ही बस रुलाती है।

 बस रुलाती है।

 

 हंसी तो बस मुस्कुराहट बन के रह जाती है।

 दिल रोता है ,आंसू टपक पड़ते हैं।

 

 खुश रहने की कोशिश करते हैं ।

पर ना जाने क्यों ,

यह दर्द भरी जिंदगी,

 हमें फिर रुला देती है।

 

 यादें रह जाती हैखुशियां बीत जाती है। बस मेरी वीरान सी जिंदगी,

 जीने की वजह ढूंढती है ।

 

क्या कहे  खुदसे हमक्यों हमें जिंदगी दर्द भरी लगती है।

 

 खुशियों के किरण नजर नहीं आतेआंधियां हर वक्त हवा दे जाती।

 फिर चमकती जहां बिजली,

रोशन दुनिया हो जाती।

 बस रात और दिन की तरह ,

यह जिंदगी निकल जाती।

 

 बस बढ़ती ही जाती

 बस बढ़ती ही जाती ।

 

 यही तो है जिंदगी।

  यही तो है जिंदगी।

 

श्रीमती वंदना सुभाष कगलिवाल

शाखा हिंगोली

महाराष्ट्र

🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴


मै हूँ किसान


   

मैं हूँ भारत की शान

मानसून की बाट जोहता किसान

कभी मुआवजे के इन्तजार में गरीब इंसान

तो राजनीति में एक वोट बैंक का नाम

हां जी मैं हूँ एक किसान

 

बताते मुझे मैं हूँ अन्नदाता

पशुखेतफसल से मेरा नाता

सारा जहाँ मेरी मेहनत से खाता

क्योंकि मैं हूँ अन्नदाता

 

पर मेरा अपना रोना है

उम्मीद से उठना निराशा संग सोना है

मानसून द्वारा मेरी मेहनत को धोना है

सरकार के लिए मेरा जीवन खिलौना है

यही मेरा रोना है

बस यहीं मेरी तकदीर ख़राब है

मेरे हाल चाल में नेताओं का हिसाब है

किसान के अन्न में छिपा सरकारी लाभ है

मेरी खुशहाली एक राजनीतिक किताब है

बस यहीं सबकुछ बेहिसाब है।

 

मैं किसान हल जोतना पहचान

किन्तु बना हूँ सत्ता की दूकान

पार्टियां चाहे मुझ से अपनी अपनी मुस्कान

बदनाम कर मुझे कमाना चाहे अपना नाम

मैं हूँ एक आसान शिकारी इंसान

क्योंकि मैं हूँ एक किसान🙏🏻

 

सौ राखी अग्रवाल

शाखा रिसोड (महाराष्ट्र प्रदेश)



संस्कार

 *अच्छी बातें अपनाने को

 कहते हैं संस्कार,*

 ये भावी सुन्दर जीवन के

 बनते हैं आधार।

 होते हैं संस्कार वृक्ष की

 जैसे शीतल छाँव,

 जहाँ पहुँचकर मिलती हमको

 सच्चे सुख की ठाँव।

 

 आज मचा है दुनिया भर में

 भीषण हाहाकार,

 *इसका कारण है हम अपने

 भूल गए संस्कार।*

पु्श्तों की देन है संस्कार हमारे

ये दिए नही है जाते

ये तो मिलते है परिवारों से

न कि समाज के ठेकेदारों से।

संस्कारों की जगह ले ली है मोबाइलों ने

होती है अपने ही रिश्तेदारों की पहचान फेसबुक पे

दोस्तीशादी और तलाक तक होती आज मोबाइलों से

संस्कार मेहंगे और रिचार्ज सस्ते हो रहे है मोबाइलों के।।

देती है मीडिया ही हमें संस्कारों का ज्ञान

यही कराती है तीज त्यौहारों से पहचान

कर देता है हर परेशानियों को आसान

इसलिए यही है नई पीढी युवा के भगवान।

पुराने जमाने में मां भर देती है

अपनी बेटी में इतना हूनर

कि मिले उसे ससुराल में बेहद प्यार

नई पीढी की मांए होती है इतनी दिलदार

ममता की बेडियां रख देती है उनके बच्चों को बिगाड कर

लाना होगा अपने बच्चों के व्यवहार में बदलाव

वक्त रहते आ जाए उनमे अच्छे संस्कार

तो होगा परिवार का ही गुणगान

और बढ़ेगा माता-पिता का अभिमान।

 

ज्ञान विज्ञान जीने का सलीका है सिखाता

संस्कार हमें अपनों से जोडना है सिखाता।

रामायण ने सिखाया कैसे निभाना है वचन

और महाभारत ने सिखाया कैसे मिलती है सजा

जब होता है मर्यादाओं का उल्लंघन।✍🏻✍🏻

 

सौ निकीता अग्रवाल

 


पिताजी*

कडी धूप में खड़ा होकर देता है ठंडी छाया,☁️🌧️

ओ शख्स और नही वह है पिता का साया।

सोचा नहीं खुद के लिए कभी,हर पल बच्चों को आगे बढ़ाया,

यही है पिता की छत्रछाया।🙌🏻

माँ की ममता थो सभी समझेंपिता का प्यार ना समज आया।

रात दिन घर से बाहर रहकर पैसा खूब कमाया,

उन पैसो को  बच्चो पर लुटाया,फिर भी कहे बेटा बस इतना हि कर पाया।

ऐसा जिगर पिता ने कहा से लाया❤️

किस्मत वाले है वो जिनके घर है पिता का साया।🙌🏻

 

सौ हेमा गट्टानी

 



वसुंधरा🌎

पृथ्वी  रूप हैं वसुंधरा

जिससे जीवन हराभरा

करती हूं सभी का लालन पोषण,,,,

चंद भौतिक सुखों के खतिर

मेरे लाल क्यों कर रहे हो मेरा पतन।,,,,

मेरे ही गर्भ से तुम्हे मिले नीर

अगणित धातु ओर हीर,,,

पेड़ पौधे पशु पक्षी ओर मानव,,

सभी को मिलता मुझसे जीवन,,,

पर मेरे लाल क्या,, कर्ज चुका रहा है तू ,,,कर के मेरा पतन,,,

राष्ट्र -राष्ट्र के शत्रुत्व में

शस्त्र-अस्त्रो का तुम मुझ पर करते हो प्रहार,,,

कई घाव देकर नष्ट कर देते हो मेरा साज श्रृंगार,,,

आज यह माँ करती है अपने बच्चों से गुहार,,,

मत काटो पेड़ पौधों को,,,

ना नष्ट करो खेत खलियान,,,

मेरे ही गर्भ से मिला तुम्हे जीवन,,,वैसे ही मेरे पतन से निश्चित है तुम्हारा भी पतन,,,,

एक दिन के वसुंधरा दिन से ,,,क्या मिल जायेगा मुझे मेरा साज श्रृंगार,,???

पर यह निश्चित कहती हूं में,,,

एक पेड़ लगाकर,जल ऊर्जा की बचत कर,,स्वच्छ ता को अपनाकर ,,,

सेंद्रिय खेती कर,,,,मुझसे करोंगे हर पल प्यार,,,

फिरसे महकूँगी में कर साज श्रृंगार,,, 

फिर यह वसुंधरा हमेशा रहेंगी सुजलाम सुफलाम,,,,

(22 अप्रैल वसुंधरा दिवस निमित्त यह शब्द भाव वसुंधरा के लिए)

✒️सौ संगीता संजय चौधरी

महाराष्ट्र हिंगोली

 


धरती का इठलाता आंगनक्यों फैलाया यहां प्रदूषण।

 

धरती का इठलाता आंगनक्यों फैलाया यहां प्रदूषण।

शस्य श्यामला था जो यौवन,छेड़छाड़ किया पर्यावरण।

 

वृक्ष काट वन खूब जलाएंखनिज खननपर्वत भी काटे।

क्यों प्रकृति विकृत किया मनु तू , क्यों बेदर्द जलाशय पाटे।

 

हो सपूत यदि धरती मां के,इसकी लाज बचाना होगा।

प्रदूषण हीन रहे भू माताइसलिए  वृक्ष लगाना होगा

 

चलो हमारी धरती मां कोफिर उसकी नव निधि लौटायें।

पेड़ कोई कटने ना पाए  ,  जंगल भी घटने ना पाए।

 

कहीं धरा मरु नहीं बन जाये,पेड़ लगाएं और लगवायें,

फिर आने वाली पीढ़ी को,अक्षय धरारिद्धि सिद्धि लौटायें।

 

वीणा खंडेलवाल

तुमसर  महाराष्ट्र



 ''मा''

हमें तुम देवदूत सी,

हमारी शक्ति का निर्विकार एहसास कराती हो...

कामयाब संकट मोचक हो,

सब पीड़ा हर लेती हो...

 

हमने कभी नहीं पूछा

संध्या समय तुम्हारे

थके बुझे चेहरे का कारण,

फिर भी मुस्कुरा कर

अपनी थकान की पीड़ा

खुद ही हर लेती हो...

 

हमारी आहट कैसे पहचान लेती हो,

हमारे रूठने पर बार-बार मनाती हो...

 

हमें हमारी शक्ति का एहसास कराती हो..


नलिनी सुरेश अग्रवाल

नागपुर


मां को शब्दों में बयां नहीं कर सकते

फिर भी सभी शब्दो को एक माला में पिरोकर एक छोटी सी कोशिश...

 

मां के रहते कोई गम नहीं होता,

दुनिया में कोई साथ न दे,

पर मां का साथ एक क्षण नहीं छूटता...

 

तुम हो तो मैं हूॅं,

तुम से ही है वजूद मेरा..

 

तुम ही हो पहचान मेरी,

मां तुमसे दुनिया सारी..

 

तुम हो कितनी प्यारी,

मां के चरणों में है स्वर्ग..

 

मां का आशीर्वाद जो मिल जाए,

तो घर बैठे हो जाए चारो धाम...

 

किरण मखारिया

नागपुर

 


माँ

 " मेरी प्रथम गुरु "

 

 चरणों में वन्दौ करूँ

 माँ ही मेरी प्रथम गुरु

 

पहला कदम रखा धरती पर,

दौड़ पड़ी सम्भाला आकर..

 

पहला शब्द कहा तुतलाकर,

न्यौछावर तू हुई थी मुझ पर..

 

प्रथम पाठशाला का दिन था,

मचल गई थी जाना न था..

 

उठा गोद में गले लगाया,

स्पर्श कभी वो भूल न पाया..

 

ज्यों-ज्यों उम्र का कदम बढ़ाया,

संस्कारों का तूने पाठ पढ़ाया..

 

ठोकर लगी तो हौसला बढ़ाया,

कठिनायों से लङना सिखाया..

 

कहाँ थी तू ज्यादा शिक्षित,

हर गुण था तुझमें परिलक्षित..

 

हर समस्या का तू ही थी हल,

ज़िन्दगी हो जाती थी सुफल..

 

आत्मसम्मान से बढ़ना आगे,

संयम से जीना सीखा तुझसे..

 

मुस्कुराहट तेरी न भूल पाई हूँ,

हर हार से तभी जीत पाई हूँ..

 

जीवन में जब जब असफलता मिली,

तेरे अनुभव के पाठ्यक्रम से पास हुई..

 

तेरे होने का प्रतिपल अह्सास होता है,

माँ आज भी सर पे तेरा हाथ होता है..

 

संगीता मंत्री

नागपुर

 

मां

 

तपती धूप में छांव का एहसास है मां ....

बच्चे के दिल की धड़कन को,

ख़ुद में महसूस करती है मां....

 

जिंदगी के सफर में कई रिश्ते बनते-बिगडते,

पर हर पल बाहें फैलाए मिलती है मां.....

 

समुद्र सा गहरा प्यारमोती की तरह अनमोल,

 हमारे जीवन को संवारती है मां.....

 

काम पर बाहर हम जाते,

पर दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी रहती है मां.....

 

ख़ुद की परवाह न करहमेशा हमारी चिंता मे घिरी रहती है मां....

 

खरोंच मुझे लगे तो तड़प उठती है,

जल्दी ठीक हो उसके लिए सारा आसमान सर पर उठा लेती है मां.....

 

निशब्द हूं उसकी ममता को पैमाने (शब्दों) में बताने के लिए,

बस इतना कहूंगी,

इस धरती पर स्वयं भगवान का रूप है मां......

 

सोनिया अग्रवाल

नागपुर.

 

मेरी मां के लिए मेरी छोटी सी कविता  

 

मां आपके लिए क्या-क्या लिखूं,

भाव बहुत हैं पर शब्द नहीं हैं..

क्या लिखूं,    

 

 प्रेम मूरत आपकी मन में बसी,

 पर क्या लिखूं,   

 

आप बस आप हो,

 जो धर्म है जो कर्म है जो मर्म  है जो परम है..

मां क्या लिखूं ,     

 

 मां तो बस मां है,

 जो गुरु भी है सखा भी हैजो ईश्वर भी है मां...

क्या लिखूं ,    

 

 मां क्या क्या लिखूं क्या क्या लिखूं...

 

स्वाती अग्रवाल

नागपुर


भारतीय  ससंकृति में 

माँ सदा पूजनीय है। माता पिता का आदर एक दिन,

नहीं सदा किया जाता है इसलिये तो कहतें हैं...

 

माँ से बढ़ कर कुछ नहींक्या पैसा क्या नाम ।

चरण छुए और हो गयेतीरथ  चारों धाम।

 

हम तो सोये थे चैन से पल पल देखे ख्वाब।

माँ कितना सोई जगी इसका नहीं हिसाब।

 

इनकी बाँहो में बसास्वर्ग सरीखा गाँव।

बाबू जी इक पेड़ हैंअम्मा जिसकी छाँव।

 

सभी  माताओंको  समर्पित

 

सुनीता डालमिया

नागपुर



 मैं नारी नदी सीमेरे दो किनारे

 

मै नारी नदी सी मेरे दो किनारे।

एक किनारे ससुराल,  दूजी ओर मायका

 

दोनों मेरे अपने फिर भी अलग दोनों का जायका।

 

एक तरफ मां जिसकी कोख का मैं हिस्सा ।

दूजी ओर सास जिनके लाल संग  जुड़ा मेरे

 जीवन भर का किस्सा

 

एक तरफ पिता  , जिनसे है अपनत्व की धाक।

दूजी ओर ससुरजी जिनकी हैं सम्मान की साख।

 

मायके का आँगन मेरे जन्म की किलकारी

ससुराल का आँगन  मेरे बच्चों की चिलकारी

 

मायके में मेरी बहने , मेरी हमजोली

ससुराल में मेरी ननदे हैशक्कर सी मीठी गोली।

 

मायके में मामाकाका है पिता सी मुस्कान

ससुराल के देवर जेठ हैं तीखे में मिष्टान।

 

मायके में भाभी है

ममता के खजाने की चाबी,*

ससुराल में देवरानी जेठानी

हैं मेरी तरह ही बहती नदी का पानी।

 

मायके में मेरा भईया

एक आस जो बनेगा दुख में मेरी नय्या

ससुराल में मेरे प्राणप्रिय स…

सौ.संगिता भुरट, लोनावाला शाखा महाराष्ट्र

 


हरा पीपलघना बरगद ,सुनो तुलसी है मेरी मां,

मेरा आंचलकभी दर्पण ,बनी बदली है मेरी मां।

 

 

मैं फल हूं मां की मन्नत काजो दुर्गा मां ने बक्शा है,

मिटाऊं ज़ुल्म दुनियां सेसदा कहती है मेरी मां।

 

 

सदा धरती गगन से बेटीपल-पल अपना रिश्ता रख,

यहीं इक बात शिद्दत सेमुझे कहती है मेरी मां।

 

बहोत ढूंढा ,बहोत देखाबहोत जांचाबहोत परखा,

नहीं दुनियां में कोई शैतेरे जैसी है मेरी मां।

 

नहीं है पास लेकिन रूह में ,मेरी समाई है,

मेरे भीतर सभी कहते हैंके दिखती है मेरी मां।

 

 तेरा सर गोद में रख - रख केआ तेरी बलाए लूं,

"प्रीत" अन्दर तेरी ममताउभर आई है मेरी मां।

                     

आपकी बेटी

                       

नीलकमल टाक

 

मॉं

याद नहीं मॉं जब पहली बार दुनिया में आयी

दोनों हथेलियों के पलने में पलती चली गई।

स्नेह से जब तुम थामती थी मेरा हाथ

लगता जैसे सारा जहॉं है मेरे साथ।

तुझे देखते देखते भागने लगा डर

करने लगी धमाचौकड़ी होकर नीडर।

साथ में रहता था थोड़ा पढ़ाई का टेंशन

और मॉं तुम्हारा स्नेह भरा अनुशासन ।

लगता था तब  तो वह बड़ा ही आतंकी

करनी पड़तीं थी रात-दिन पढ़ाई की नौटंकी ।

धीरे-धीरे चढ़ती गई सीढ़ी दर सीढ़ी

तेरी छाया में तैयार होने लगी नई पीढ़ी।

हम भाई बहन देखने लगे नये नये सपने

व्यस्त रहने लगे,खोये रहने लगे काम में अपने ।

यह था मेरे जीवन का अमूल्य कालखंड

जिसमें था तेरी ममता का झरना अखंड।

भूल ना पाएँगे मॉं उन स्वर्णिम पलों को

कभी हंसना कभी रोनाभाई बहनों कीं तकरारों को।

कहते है नींव मज़बूत हो तो इमारत बुलंद होती हैं

संघर्षों में तपकर मिट्टी सोना और कुंदन होती है ।

मॉं तुमने मुझे वही मज़बूत नींव  दी है

आसमान में उड़ान भरने की उम्मीद दी है।

ऋणी हूँ ,हमेशा ऋण में रहना चाहती हूँ  

तू सदा स्वस्थ रहेमस्त रहे यही कामना करती हूँ ।।

 

दीप्ति अग्रवाल

 तपोवन की पावन भूमि सी माँ

सहृदय सुशीला है बड़ी प्यारी है माँ

कोख मैं अपनी देती तुम पनाह

रहमत से तुम्हारी देखते है जहाँ

आग़ोश मैं तुम्हारे ममता का अहसास

दिल मैं रहता सदा प्यार का वास

स्पर्श से तुम्हारे मिलता सुकून

चेहरे पे रहती मीठी मुस्कान

व्यक्तित्व मैं है आत्मसम्मान

यही है तुम्हारी अपनी पहचान

प्रार्थना मैं तुम्हारी संतान का सुख

दुआ मैं करती ख़ुशी की कामना

तुम ही ने दिया हमें खुला आसमान

कोई ना तुमसा

तुम तो हो माँ

देवी प्रतिमा सद्रशय तुम्हारी है छवि

नाज़ है हमको हम तुम्हारी है कृति

नतमस्तक है हम तुम्हारे समक्ष

प्रतिपल करते है तुमको नमन । 

 

-सुनीता दमानी



मां

मां शब्द है सबसे ऊंचा,

   इसके जैसा नहीं कोई दूजा,

 कितना प्यारा था वह पल ,

    सुहाना लगता था बालों को सहलाना।

 

ढेरों आशीष  देकर तेरा मुस्कुराना,

        नामुमकिन है उन क्षणों को भूल पाना।

         मुश्किलों मेंसुख दुख में राह बताना ।

 

अपने आंचल की छांव  फैलाना। 

 याद आता है वह जमाना

   केसे अदा करुं मां तेरा शुकराना।

 

                चंचल तापड़िया🙏



 "पाती"

उफजितना भुलाती हूं मां को उतना ही ज्यादा याद "आती" ~~~

थाम कलम मै बैठ गई हूं लिखने को पाती~~

 

मां के पावन प्रेम सेअखियां भर भर आती। होकर स्नेह विभोर मैं लिखने बैठी पाती।

 

गौरव महसूस करती हूं चरणों में शीश झुका कर

 

मन मयूर बन नाच उठा है,

स्नेहाशीष को पाकर।

 

जीवन के हर क्षण के बीच

खुशी की नई

कई ~~

कडी जुड़ जाती।

 

मां आपसे ही अपनापन पाया

अपना मन उसमें ही है समाया

बनो प्रेरणा साथ रहो *तुम जैसे हो मेरी छाया

बस सोच रही हूं केवल इतना

 क्या प्रण पूरा कर पाएंगी ?

मेरी दर्द भरी पाती!

 

तारा अग्रवाल

औरंगाबाद सिडको



 माँ”

माँ के लिए कुछ भी कहना

कहाँ सेशुरु करूँ

कहाँ पर ख़त्म करूँ

अनादि से शुरु हो कर

अनन्त तक चलने वाला

 “माँ “शब्द तो  किसी शब्दों की मोहताज नहीं

माँ तो ईश्वर का भेजा वह तोहफ़ा है

 

जो हमें हमारे वजूद की पहचान  देता है

जो हमें हमारे ख़ुद के होने का अहसास कराता है

 

 “माँ”

माँ के लिए कुछ भी कहना

कहाँ सेशुरु करूँ

कहाँ पर ख़त्म करूँ

अनादि से शुरु हो कर

अनन्त तक चलने वाला

 “माँ “शब्द तो  किसी शब्दों की मोहताज नहीं

माँ तो ईश्वर का भेजा वह तोहफ़ा है

जो हमें हमारे वजूद की पहचान  देता है

जो हमें हमारे ख़ुद के होने का अहसास कराता है

आभा बोहरा

अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन

शाखा - नागपुर 

आभा बोहरा

नागपुर



 माँ  का  आँचल

माँतुम्हारा आँचल जैसे मेरे लिए मेरी खुशियो का बादल

नन्ही सी कली को अपनी तुमने इस मे ही सहेजा

मेरी हर किलकारी और खुशियों को इसमें ही समेटा

नन्हे नन्हे कदम तुम्हारे पीछे चल पड़े

ममता के आंचल को हौले से पकड़े

पसीने से तरबतर खेलकूद जब मैं आती

तुम्हारे ही आँचल को अपना तौलिया थी बनाती

मिट्टी से पैर जब कभी सन जाते

चढ़कर तुम्हारी गोद मे साफ हो जाते

कभी ढोल देती मैं  कुछ खाते खाते

बड़े प्यार से तुम आँचल अपना थमा देती हाथ मेरे

भरी दोपहरी तपती धूप हो कभी भी

तुम्हारा ही आँचल मेरी छांव होती

बाहर कभी जाते बारिश जो होती तुम्हारा वो आँचल मेरी छतरी होती

जो गुस्सा कभी हुई बुआ और चाची

आँचल के पीछे तुम्हारे ही छिपती

उसी आँचल को तरसती है अब भी

तुम्हारी सयानी सी ये बिटिया रानी

मुझे तुम बुला लो ,गले से लगा लोममता के आंचल में फिर से छिपा लो.....

छोड़ कर के अकेले जबसे तुम हो गई...

खाली खाली सी सारी दुनिया हो गई...

न आते है आंसू न आती है हिचकी....

तरसती है ये बेटी सिसकती है ये आंखे...…

 

निधि भट्टड़ 

स्वलिखित 

जलगांव शाखा


🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎🌎

पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

धरा के नीचे पानी है,

हमने सुनी कहानी है।

सच है येनहीं कोई कहानी,

वैज्ञानिकों की खोज पुरानी।

कल तक जो हरी भरी थी पृथ्वी,

आज सूखकर हो गई बंजर।

मानव ने अपने ही हाथों,

घोंप दिया है इसमें खंजर।

दुर उपयोग किया प्रकृति का,

कभी ना इसका मान किया।

पर्यावरण को किया प्रदूषित,

हरदम ही अपमान किया।

आज नतीजा भुगत रहे हम,

हरियाली सब खो गई है।

धरती मां भी हमसे जैसे,

रूठ के नींद में सो गई है।

धरती मां को यदि जगाना है,

सबको पेड़ लगाना है।

हरियाली फैलाना है,

हरियाली फैलाना है।🌿🌳

हेमा अग्रवा, तुमसर (महाराष्ट्र)

 

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