दर्द भरी जिंदगी l
आज के दौर की यह हालत है,
अपने ही अपनों से पराए हो
जाते हैंl
फिर
भी हमें भरोसा है ये,
की आंधियों में भी चिराग जल
सकते हैं।
टूटकर शीशा यह दिल बिखर
जाएगा,
कोई मेरा हमसफ़र या
जिगर का टुकड़ा छीन जाएगा ।
हम बात क्या करें जिसे,
हमारी कोई खबर ही ना हो ।
वह दुआ भी क्या करें,
जिसका कोई असर ही ना हो।
वह जिंदगी भी क्या अजीब हो
गई है,
जिसके जीने में कोई सबब ही
ना हो ।
अब तो मुझसे बोझसी
लगती है यह जिंदगी,
फिर भी एक उम्मीद सी लगती
है यह जिंदगी।
बुझते हुए चिराग मेंभी
उजाला नजर आता है,
आज के दौर में भी कभी कहीं
इंसानियत नजर आती है।
क्या वह हमसे दूर है,
या फिर हम ही रास्ता भटक गए
हैं,
कुछ समझ नहीं आता,
यह दर्द भरी जिंदगी हमें ही
बस रुलाती है।
बस रुलाती है।
हंसी तो बस मुस्कुराहट बन
के रह जाती है।
दिल रोता है ,आंसू टपक पड़ते हैं।
खुश रहने की कोशिश करते हैं
।
पर ना जाने क्यों ,
यह दर्द भरी जिंदगी,
हमें फिर रुला देती है।
यादें रह जाती है, खुशियां बीत जाती है। बस
मेरी वीरान सी जिंदगी,
जीने की वजह ढूंढती है ।
क्या कहे खुदसे हम, क्यों हमें जिंदगी दर्द भरी
लगती है।
खुशियों के किरण नजर नहीं
आते, आंधियां
हर वक्त हवा दे जाती।
फिर चमकती जहां बिजली,
रोशन दुनिया हो जाती।
बस रात और दिन की तरह ,
यह जिंदगी निकल जाती।
बस बढ़ती ही जाती
बस बढ़ती ही जाती ।
यही तो है जिंदगी।
यही तो
है जिंदगी।
श्रीमती वंदना सुभाष कगलिवाल
शाखा हिंगोली
महाराष्ट्र
🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴
मै हूँ किसान
मैं हूँ भारत की शान
मानसून की बाट जोहता किसान
कभी मुआवजे के इन्तजार में गरीब इंसान
तो राजनीति में एक वोट बैंक का नाम
हां जी मैं हूँ एक किसान
बताते मुझे मैं हूँ अन्नदाता
पशु, खेत, फसल से मेरा नाता
सारा जहाँ मेरी मेहनत से खाता
क्योंकि मैं हूँ अन्नदाता
पर मेरा अपना रोना है
उम्मीद से उठना निराशा संग सोना है
मानसून द्वारा मेरी मेहनत को धोना है
सरकार के लिए मेरा जीवन खिलौना है
यही मेरा रोना है
बस यहीं मेरी तकदीर ख़राब है
मेरे हाल चाल में नेताओं का हिसाब है
किसान के अन्न में छिपा सरकारी लाभ है
मेरी खुशहाली एक राजनीतिक किताब है
बस यहीं सबकुछ बेहिसाब है।
मैं किसान हल जोतना पहचान
किन्तु बना हूँ सत्ता की दूकान
पार्टियां चाहे मुझ से अपनी अपनी मुस्कान
बदनाम कर मुझे कमाना चाहे अपना नाम
मैं हूँ एक आसान शिकारी इंसान
क्योंकि मैं हूँ एक किसान🙏🏻
सौ राखी अग्रवाल
शाखा रिसोड (महाराष्ट्र प्रदेश)
संस्कार
*अच्छी बातें अपनाने
को
कहते हैं संस्कार,*
ये भावी सुन्दर जीवन
के
बनते हैं आधार।
होते हैं संस्कार
वृक्ष की
जैसे शीतल छाँव,
जहाँ पहुँचकर मिलती
हमको
सच्चे सुख की ठाँव।
आज मचा है दुनिया भर
में
भीषण हाहाकार,
*इसका कारण है हम अपने
भूल गए संस्कार।*
पु्श्तों की देन है संस्कार हमारे
ये दिए नही है जाते
ये तो मिलते है परिवारों से
न कि समाज के ठेकेदारों से।
संस्कारों की जगह ले ली है मोबाइलों ने
होती है अपने ही रिश्तेदारों की पहचान फेसबुक पे
दोस्ती, शादी और तलाक तक होती
आज मोबाइलों से
संस्कार मेहंगे और रिचार्ज सस्ते हो रहे है मोबाइलों के।।
देती है मीडिया ही हमें संस्कारों का ज्ञान
यही कराती है तीज त्यौहारों से पहचान
कर देता है हर परेशानियों को आसान
इसलिए यही है नई पीढी युवा के भगवान।
पुराने जमाने में मां भर देती है
अपनी बेटी में इतना हूनर
कि मिले उसे ससुराल में बेहद प्यार
नई पीढी की मांए होती है इतनी दिलदार
ममता की बेडियां रख देती है उनके बच्चों को बिगाड कर
लाना होगा अपने बच्चों के व्यवहार में बदलाव
वक्त रहते आ जाए उनमे अच्छे संस्कार
तो होगा परिवार का ही गुणगान
और बढ़ेगा माता-पिता का अभिमान।
ज्ञान विज्ञान जीने का सलीका है सिखाता
संस्कार हमें अपनों से जोडना है सिखाता।
रामायण ने सिखाया कैसे निभाना है वचन
और महाभारत ने सिखाया कैसे मिलती है सजा
जब होता है मर्यादाओं का उल्लंघन।✍🏻✍🏻
सौ निकीता अग्रवाल
पिताजी*
कडी धूप में खड़ा होकर देता है ठंडी छाया,☁️🌧️
ओ शख्स और नही वह है पिता का साया।
सोचा नहीं खुद के लिए कभी,हर पल बच्चों को आगे
बढ़ाया,
यही है पिता की छत्रछाया।🙌🏻
माँ की ममता थो सभी समझें, पिता का प्यार ना समज
आया।
रात दिन घर से बाहर रहकर पैसा खूब कमाया,
उन पैसो को बच्चो पर लुटाया,फिर भी कहे बेटा बस इतना हि कर पाया।
ऐसा जिगर पिता ने कहा से लाया❤️
किस्मत वाले है वो जिनके घर है पिता का साया।🙌🏻
सौ हेमा गट्टानी
वसुंधरा🌎
पृथ्वी रूप हैं
वसुंधरा
जिससे जीवन हराभरा
करती हूं सभी का लालन पोषण,,,,
चंद भौतिक सुखों के खतिर
मेरे लाल क्यों कर रहे हो मेरा पतन।,,,,
मेरे ही गर्भ से तुम्हे मिले नीर
अगणित धातु ओर हीर,,,
पेड़ पौधे पशु पक्षी ओर मानव,,
सभी को मिलता मुझसे जीवन,,,
पर मेरे लाल क्या,, कर्ज
चुका रहा है तू ,,,कर के
मेरा पतन,,,
राष्ट्र -राष्ट्र के शत्रुत्व में
शस्त्र-अस्त्रो का तुम मुझ पर करते हो प्रहार,,,
कई घाव देकर नष्ट कर देते हो मेरा साज श्रृंगार,,,
आज यह माँ करती है अपने बच्चों से गुहार,,,
मत काटो पेड़ पौधों को,,,
ना नष्ट करो खेत खलियान,,,
मेरे ही गर्भ से मिला तुम्हे जीवन,,,वैसे ही मेरे पतन से निश्चित है तुम्हारा भी पतन,,,,
एक दिन के वसुंधरा दिन से ,,,क्या मिल जायेगा मुझे मेरा साज श्रृंगार,,???
पर यह निश्चित कहती हूं में,,,
एक पेड़ लगाकर,जल ऊर्जा
की बचत कर,,स्वच्छ
ता को अपनाकर ,,,
सेंद्रिय खेती कर,,,,मुझसे
करोंगे हर पल प्यार,,,
फिरसे महकूँगी में कर साज श्रृंगार,,,
फिर यह वसुंधरा हमेशा रहेंगी सुजलाम सुफलाम,,,,
(22 अप्रैल वसुंधरा दिवस निमित्त यह शब्द भाव वसुंधरा के लिए)
✒️सौ संगीता संजय चौधरी
महाराष्ट्र हिंगोली
धरती का
इठलाता आंगन, क्यों
फैलाया यहां प्रदूषण।
धरती का इठलाता आंगन, क्यों फैलाया यहां प्रदूषण।
शस्य श्यामला था जो यौवन,छेड़छाड़ किया पर्यावरण।
वृक्ष काट वन खूब जलाएं, खनिज खनन, पर्वत भी काटे।
क्यों प्रकृति विकृत किया मनु तू , क्यों बेदर्द जलाशय पाटे।
हो सपूत यदि धरती मां के,इसकी लाज बचाना होगा।
प्रदूषण हीन रहे भू माता, इसलिए वृक्ष लगाना होगा
चलो हमारी धरती मां को, फिर उसकी नव निधि लौटायें।
पेड़ कोई कटने ना पाए , जंगल भी घटने ना पाए।
कहीं धरा मरु नहीं बन जाये,पेड़ लगाएं और लगवायें,
फिर आने वाली पीढ़ी को,अक्षय धरा, रिद्धि
सिद्धि लौटायें।
वीणा खंडेलवाल
तुमसर महाराष्ट्र
''मा''
हमें तुम देवदूत सी,
हमारी शक्ति का निर्विकार एहसास कराती हो...
कामयाब संकट मोचक हो,
सब पीड़ा हर लेती हो...
हमने कभी नहीं पूछा
संध्या समय तुम्हारे
थके बुझे चेहरे का कारण,
फिर भी मुस्कुरा कर
अपनी थकान की पीड़ा
खुद ही हर लेती हो...
हमारी आहट कैसे पहचान लेती हो,
हमारे रूठने पर बार-बार मनाती हो...
हमें हमारी शक्ति का एहसास कराती हो..
नलिनी सुरेश अग्रवाल
नागपुर
मां को शब्दों में बयां नहीं कर सकते
फिर भी सभी शब्दो को एक माला में पिरोकर एक छोटी सी कोशिश...
मां के रहते कोई गम नहीं होता,
दुनिया में कोई साथ न दे,
पर मां का साथ एक क्षण नहीं छूटता...
तुम हो तो मैं हूॅं,
तुम से ही है वजूद मेरा..
तुम ही हो पहचान मेरी,
मां तुमसे दुनिया सारी..
तुम हो कितनी प्यारी,
मां के चरणों में है स्वर्ग..
मां का आशीर्वाद जो मिल जाए,
तो घर बैठे हो जाए चारो धाम...
किरण मखारिया
नागपुर
माँ
" मेरी प्रथम गुरु "
चरणों में वन्दौ करूँ
माँ ही मेरी प्रथम गुरु
पहला कदम रखा धरती पर,
दौड़ पड़ी सम्भाला आकर..
पहला शब्द कहा तुतलाकर,
न्यौछावर तू हुई थी मुझ पर..
प्रथम पाठशाला का दिन था,
मचल गई थी जाना न था..
उठा गोद में गले लगाया,
स्पर्श कभी वो भूल न पाया..
ज्यों-ज्यों उम्र का कदम बढ़ाया,
संस्कारों का तूने पाठ पढ़ाया..
ठोकर लगी तो हौसला बढ़ाया,
कठिनायों से लङना सिखाया..
कहाँ थी तू ज्यादा शिक्षित,
हर गुण था तुझमें परिलक्षित..
हर समस्या का तू ही थी हल,
ज़िन्दगी हो जाती थी सुफल..
आत्मसम्मान से बढ़ना आगे,
संयम से जीना सीखा तुझसे..
मुस्कुराहट तेरी न भूल पाई हूँ,
हर हार से तभी जीत पाई हूँ..
जीवन में जब जब असफलता मिली,
तेरे अनुभव के पाठ्यक्रम से पास हुई..
तेरे होने का प्रतिपल अह्सास होता है,
माँ आज भी सर पे तेरा हाथ होता है..
संगीता मंत्री
नागपुर
मां
तपती धूप में छांव का एहसास है मां ....
बच्चे के दिल की धड़कन को,
ख़ुद में महसूस करती है मां....
जिंदगी के सफर में कई रिश्ते बनते-बिगडते,
पर हर पल बाहें फैलाए मिलती है मां.....
समुद्र सा गहरा प्यार, मोती की तरह अनमोल,
हमारे जीवन को संवारती है
मां.....
काम पर बाहर हम जाते,
पर दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी रहती है मां.....
ख़ुद की परवाह न कर, हमेशा
हमारी चिंता मे घिरी रहती है मां....
खरोंच मुझे लगे तो तड़प उठती है,
जल्दी ठीक हो उसके लिए सारा आसमान सर पर उठा लेती है मां.....
निशब्द हूं उसकी ममता को पैमाने (शब्दों) में बताने के लिए,
बस इतना कहूंगी,
इस धरती पर स्वयं भगवान का रूप है मां......
सोनिया अग्रवाल
नागपुर.
मेरी मां के लिए मेरी छोटी सी कविता
मां आपके लिए क्या-क्या लिखूं,
भाव बहुत हैं पर शब्द नहीं हैं..
क्या लिखूं,
प्रेम मूरत आपकी मन में बसी,
पर क्या लिखूं,
आप बस आप हो,
जो धर्म है जो कर्म है जो
मर्म है जो
परम है..
मां क्या लिखूं ,
मां तो बस मां है,
जो गुरु भी है सखा भी है, जो ईश्वर भी है मां...
क्या लिखूं ,
मां क्या क्या लिखूं क्या
क्या लिखूं...
स्वाती अग्रवाल
नागपुर
भारतीय ससंकृति में
माँ सदा पूजनीय है। माता पिता का आदर एक दिन,
नहीं सदा किया जाता है इसलिये तो कहतें हैं...
माँ से बढ़ कर कुछ नहीं, क्या पैसा क्या नाम ।
चरण छुए और हो गये, तीरथ चारों धाम।
हम तो सोये थे चैन से पल पल देखे ख्वाब।
माँ कितना सोई जगी इसका नहीं हिसाब।
इनकी बाँहो में बसा, स्वर्ग
सरीखा गाँव।
बाबू जी इक पेड़ हैं, अम्मा जिसकी छाँव।
सभी माताओंको समर्पित
सुनीता डालमिया
नागपुर
मैं नारी नदी सी, मेरे दो किनारे
मै नारी नदी सी मेरे दो किनारे।
एक किनारे ससुराल, दूजी ओर
मायका
दोनों मेरे अपने फिर भी अलग दोनों का जायका।
एक तरफ मां जिसकी कोख का मैं हिस्सा ।
दूजी ओर सास जिनके लाल संग जुड़ा मेरे
जीवन भर का किस्सा
एक तरफ पिता , जिनसे है
अपनत्व की धाक।
दूजी ओर ससुरजी जिनकी हैं सम्मान की साख।
मायके का आँगन मेरे जन्म की किलकारी
ससुराल का आँगन
मेरे बच्चों की चिलकारी
मायके में मेरी बहने , मेरी हमजोली
ससुराल में मेरी ननदे है, शक्कर सी मीठी गोली।
मायके में मामा, काका है
पिता सी मुस्कान
ससुराल के देवर जेठ हैं तीखे में मिष्टान।
मायके में भाभी है
ममता के खजाने की चाबी,*
ससुराल में देवरानी जेठानी
हैं मेरी तरह ही बहती नदी का पानी।
मायके में मेरा भईया
एक आस जो बनेगा दुख में मेरी नय्या
ससुराल में मेरे प्राणप्रिय स…
सौ.संगिता भुरट, लोनावाला
शाखा महाराष्ट्र
हरा पीपल, घना बरगद ,सुनो तुलसी है मेरी मां,
मेरा आंचल, कभी
दर्पण ,बनी बदली
है मेरी मां।
मैं फल हूं मां की मन्नत का, जो दुर्गा मां ने बक्शा है,
मिटाऊं ज़ुल्म दुनियां से, सदा कहती है मेरी मां।
सदा धरती गगन से बेटी, पल-पल अपना रिश्ता रख,
यहीं इक बात शिद्दत से, मुझे कहती है मेरी मां।
बहोत ढूंढा ,बहोत देखा, बहोत जांचा, बहोत परखा,
नहीं दुनियां में कोई शै, तेरे जैसी है मेरी मां।